जर्मनी जाने की उत्सुकता – 14 मई 2014

यात्रा

आखिर आज हम आश्रम छोड़कर दिल्ली की ओर रवाना होंगे। हम सीधे विमान-तल का रुख करेंगे, जहां से हमें जर्मनी के लिए हवाई जहाज़ पकड़ना है!

मैं अपरा के साथ उसके जीवन में दूसरी बार जर्मनी जाने का बेसब्री के साथ इंतज़ार कर रहा हूँ। अगर हमारे कार्यक्रम के मुताबिक सब कुछ हुआ होता तो हम दो हफ्ते पहले ही जर्मनी पहुँच चुके होते। लेकिन मेरे लिगामेंट की शल्यक्रिया के चलते मुझे अपनी उड़ान दो हफ्तों के लिए मुल्तवी करनी पड़ी। मैं कह सकता हूँ कि हमारे लिए उस वक़्त लिया गया यह निर्णय बहुत अच्छा रहा!

स्वाभाविक ही, अभी मैं पूरी तरह स्वस्थ नहीं हूँ। घुटने को स्थिर और पैर को सीधा रखने के लिए मैं अभी भी ब्रेस (पट्टा) पहनता हूँ और बहुत धीरे-धीरे एक छड़ी के सहारे ही चल पाता हूँ। मैं छड़ी के बगैर चल तो सकता हूँ मगर यदि मैं वैसा करने की कोशिश करूँ तो हवाई जहाज़ के उड़ने के कई घंटे बाद ही मैं प्रस्थान द्वार तक पहुँच पाऊँगा! लेकिन: मैं चल सकता हूँ, बैठ सकता हूँ और अपने पैर को मोड़ भी सकता हूँ। निश्चय ही मैं शल्यक्रिया से पहले से अधिक अच्छा महसूस कर रहा हूँ। मेरे अंदर यह विश्वास पैदा हो गया है कि मैं पूरी यात्रा अच्छी तरह पूरी कर पाऊँगा। मैं जानता हूँ कि यह यात्रा मेरे पैर के लिए काफी कष्टकारी होगी मगर अपने पैर की स्थिति को लगातार बदलते हुए, बीच-बीच में खड़े होकर और अपरा अगर सो नहीं जाती तो उसका मनोरंजन करने में अपने आपको व्यस्त रखते हुए उसे सहनीय बनाने में सफल रहूँगा।

जर्मनी के लिए उड़ान भरते हुए मेरी खुशी का एक और कारण यह है कि यहाँ, वृंदावन में दिन-ब-दिन गर्मी काफी बढ़ती जा रही है। दरअसल अधिक गर्मी मुझे पसंद नहीं है और हालांकि यहाँ, आश्रम में पंखे और एयर-कंडीशनर लगे हुए हैं फिर भी साल का यह समय मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। वास्तव में मुझे एयर–कंडीशनर ही पसंद नहीं हैं! इसलिए मैं जल्द से जल्द जर्मनी के मौसम का आनंद लेना चाहता हूँ। मुझे पता है कि जर्मनी में साल के इस समय भी काफी ठंड होगी मगर खुद को गरम रखने और छींकों और सर्दी से अपने आपको बचाए रखने के लिए वहाँ तमाम तरह की संभावनाएँ मौजूद हैं!

और फिर वहाँ शांति भी है! मैं वाकई कभी-कभी इस जर्मन खामोशी को बहुत मिस करता हूँ। यहाँ भारत में आप यह शान्ति कभी नहीं पा सकते, बशर्ते हिमालय के पहाड़ी इलाकों या दूरस्थ गावों को छोड़कर भारत में आपको यह खामोशी कहीं नहीं मिलेगी। हालांकि वृन्दावन में भी हमारा आश्रम शहर के बाहरी इलाके में है, जो एक अच्छी स्थिति कही जा सकती है मगर फिर भी मंदिरों के घंटों की आवाज़ों से आप कहाँ तक बच सकते हैं, विशेषकर जब वे उन्हें आसपास के सारे इलाकों में लाउडस्पीकर पर प्रसारित करना शुरू कर देते हैं! तो इस तरह एक बार फिर जर्मनी के निस्तब्ध वातावरण में पहुँचना एक बहुत अच्छी बात होगी।

इन सबसे ऊपर और सबसे बढ़कर, मैं अपने सभी मित्रों और अपने जर्मन परिवार से मिलने की राह देख रहा हूँ। उनके साथ बैठना चाहता हूँ, बातचीत करना और उनके साथ समय बिताने का आनंद लेना चाहता हूँ। और निश्चय ही, अवकाश के बाद अपने काम पर लगते हुए अपने लंबित कामों को पूरा करना चाहता हूँ।

जर्मनी मेरा दूसरा घर है और भारत में रहते हुए कई बार मैं उसे मिस करता हूँ। तो अब कुछ अंतिम तैयारियां और फिर जर्मनी की ओर उड़ान! कल मैं अपना ब्लॉग भी जर्मनी से ही लिखूंगा-बेहद लज़ीज़, ताज़े ब्रेडरोल का नाश्ता करने के बाद!

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