जर्मन ट्रेनों में भारतीय तरीके से सफर – 22 जुलाई 2014

यात्रा

ट्रेन में बैठे-बैठे, इस बार वीसबाडन से ल्युनेबर्ग के बीच कहीं, हम अपनी पिछली जर्मन यात्रा के बारे में चर्चा करने लगे और एक बार फिर खूब हँसे। वह वास्तव में एक दिलचस्प और यादगार सफ़र था-और मुझे लगता है आपको भी उसके बारे में पढ़कर मज़ा आएगा।

एक बार जब हम सबेरे-सबेरे अपने सफ़र पर निकले तो हमने टिकिट पर ध्यान से नज़र दौड़ाई और पाया कि गंतव्य तक पहुँचने के लिए हमें कई जगह ट्रेनें बदलनी हैं और ऐसा करने के लिए हमें बहुत कम समय मिलने वाला है-पाँच ट्रेनें और हर बार बस, कुछ मिनट ही! लेकिन क्या किया जा सकता था, सोचा थोड़ी भागदौड़ होगी, चलो, इस रोमांच का भी मज़ा लिया जाए!

एक-दो घंटे में ही हमें हँसने के बहुत से कारण मिले क्योंकि बार-बार हम टिकिट को देखते फिर यात्रा-कार्यक्रम के बारे में सोचते, फिर पता चलता, स्टेशन आ गया है, उतरकर दूसरी ट्रेन पकड़ना है और फिर घड़ी की तरफ नज़र चली जाती। इस यात्रा के कुछ हिस्सों का सफर आधे घंटे से भी कम का रहा और एक बार तो सिर्फ तीन मिनट का! हर बार स्टेशन पर हम लोग भाग-दौड़ करते हुए दूसरे प्लेटफोर्म पर पहुँचते और अगली ट्रेन पकड़ते।

लेकिन एक स्टेशन पर, जो किसी गाँव का बहुत छोटा सा स्टेशन था, हमें प्लेटफॉर्म तो बदलना था मगर उस पार जाने के लिए कोई फ़्लाइओवर या सबवे नहीं था और बैरियर लाँघकर उस पार जाना था और बैरियर नीचे गिरा हुआ था! हमारे साथ चार जर्मन भी थे, जो बैरियर के सामने जाकर खड़े हो गए कि अब क्या करें, कैसे उस पार जाएँ! दरअसल यहाँ भारतीय जोश की ज़रूरत थी! पल भर की हिचकिचाहट के बाद यशेंदु और मैंने बैरियर को निखालिस भारतीय तरीके से पार करने का निर्णय किया-रेल लाइन के किनारे-किनारे थोड़ा चलकर रेल लाइन पार कर ली जाए! जैसे ही हमे अवरोध की बगल से रेल लाइन की ओर चले, सभी ने हमारा अनुसरण किया और हम अंततः ट्रेन पकड़ने में कामयाब हो गए। हम ऐसा न करते तो उस दिन हमारी ट्रेन अवश्य छूट जाती!

खैर, जब सबसे तेज़ ट्रेन की बारी आई, जिसमें हमें दो घंटे का लम्बा सफ़र तय करना था, हम लोग कुछ आश्वस्त और स्थिर हुए। तब हमने सबसे पहला काम किया कि अपना नाश्ता खोलकर बैठ गए-और जैसे ही हमने अपने डिब्बे खोले, आसपास बैठे लोगों की विस्फारित आँखें हमें ताकने लगीं, हम लोग अवश्य ही उन्हें काफी मनोरंजक लगे होंगे!

हमारे सबसे करीब वाली सीटों पर दो बुज़ुर्ग महिलाएँ बैठी थीं और आपस में बातें कर रही थीं: ‘ये लोग जहाँ के रहने वाले हैं वहाँ सिर्फ सूरज की किरणों से बचने के लिए कपड़ों की ज़रुरत पड़ती है, ठण्ड से बचने के लिए नहीं!’, ‘लगता है, बहुत भूखे हैं!’ आदि आदि। और जब भरपेट नाश्ता करने के बाद हमें थोड़ी झपकी आने लगी तब उनमें से एक ने कहा: ‘सब के सब सो गए हैं, सिर्फ वह छोटी सी बच्ची बीच-बीच में उन्हें जगा देती है; बड़ी चंचल है, उसे नींद नहीं आ रही है!’ पूरे सफ़र में दोनों महिलाएँ हमारे बारे में बातें करती रहीं और बीच-बीच में मुस्कुराती जातीं। और इधर हम उनका मज़ा ले रहे थे कि कैसे पूरे सफर में हम उनके आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

लेकिन सबसे मज़ेदार बात हुई जब हम फ्रेंकफर्ट पहुँचे, जहाँ हमें आखिरी बार वीसबाडन जाने के लिए ट्रेन बदलनी थी। जब ट्रेन रुकने को हुई, सब लोग उठकर दरवाज़ों की ओर बढ़ने लगे। हम लोग उठने वाले आखिरी लोग थे और जैसे ही हम खड़े हुए, हममें से किसी ने वह काम किया, जिसके बारे में जर्मनी के लोग बताते हैं कि वे कभी नहीं करते: गर्जना के साथ एक ज़ोरदार पादने की आवाज़ सारी ट्रेन में गूँज उठी!

लोगों की प्रतिक्रिया बहुत मज़ेदार थी! वे दो बुज़ुर्ग महिलाएँ, जो हमारे सामने बैठी थीं और पिछले दो घंटे से हम पर नज़र रखे हुए थीं और लगातार हम पर आपस में फब्तियां कसे जा रही थीं, अचानक सकुचा गईं और उन्होंने बड़ी शालीनता के साथ नज़रें फेर लीं और उनके आसपास के दूसरे लोग भी नम्रतापूर्वक अपनी हँसी रोकने की कोशिश करने लगे। जबकि यह देखकर हमारी हँसी काबू में न रही! हम लोगों ने एक साथ ठहाका लगाया और फिर बिना रुके लगातार हँसते ही चले गए! इसके कारण आसपास और अफरा-तफरी मच गई! हम नीचे भी उतर गए मगर हमारी हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी!

वह बेहद रोमांचक अनुभव था-और अभी इस वक़्त एक दूसरे रोमांचक अनुभव से हम गुज़र रहे हैं-हमारी ट्रेन दो घंटा देर से आने वाली है!

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