हिमालय यात्रा की शुरुआत – 28 मार्च 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

होली-पार्टी की थकान मिटाने हेतु छोटा सा अवकाश लेने के बाद हमारे मेहमानों का दल हिमालय की ओर निकल गया! जी हाँ। सबेरे सबेरे यशेंदु और दूसरे सात लोग अपने बैग, सूटकेस, जूते, योग की चटाइयाँ वगैरह लेकर नीचे मुख्य कक्ष में आए। एक छोटी बस में उन्होंने सारा समान लादा-बहुत सा पानी और नाश्ते का सामान पहले ही रखा जा चुका था-हम लोगों से ‘गुडबाय’ कहा और बस में बैठ गए। हिमालय यात्रा, जिसे लेकर वे बहुत समय से बड़े उत्साहित थे, आखिर आज शुरू हो गई।

जब भी हम ऐसी यात्राएं आयोजित करते हैं, हर बार उसमें कुछ न कुछ खास होता ही है। पिछले साल सहभागी यात्रियों को अपरा के जन्मोत्सव में शामिल होने का अवसर मिला था और इस साल वे ऐसे मौके पर पधारे थे कि होली की मस्ती का पूरा आनंद उन्हें प्राप्त हो सका।

होली पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ मनाने के बाद वे अब ऋषिकेश जा रहे हैं, जिसे ‘हिमालय का प्रवेश-द्वार’ भी कहा जाता है। पिछले यात्री समूह के दो व्यक्तियों से भी वे आगे मिलेंगे और इस तरह कुल दस यात्री हो जाएंगे। वे आज रात को गंगा के तट पर होंगे और अपने चारों तरफ हिमालय की वादियों का नज़ारा करेंगे।

कल उनके पास न सिर्फ ऋषिकेश शहर और गंगा नदी पर बने पुलों और सारे शहर में फैले योग-व्यापार को देखने का मौका होगा बल्कि उसके आसपास की प्राकृतिक छटाओं, गुफाओं, जंगली रास्तों को आँखों में भर लेने का मौका भी होगा, बशर्ते वे आसपास बिखरे दर्शनीय स्थानों के जानकार किसी स्थानीय व्यक्ति को साथ लेकर शहर से ज़रा बाहर निकलें।

उसके बाद वे सब ऋषिकेश से आगे के लिए प्रस्थान करेंगे और पहाड़ चढ़ते हुए, सैलानियों के लिए आम तौर पर अनजानी जगहों, जैसे, भटवारी, बारसु वगैरह में अपना डेरा जमाएँगे जहां प्रकृति की गोद और शानदार भूदृश्य होंगे। यहाँ से वे अपनी पहली लंबी पदयात्रा की शुरुआत करेंगे, जो उन्हें एक सुंदर झील तक ले आएगी जिसके किनारे वे आज पिकनिक करेंगे और हो सकता है संगीत और नाच-गाने का आनंद भी उठाएँ।

शायद वे लोग ऐसे प्राकृतिक वातावरण में थोड़ा-बहुत योग करना भी पसंद करें और उसके बाद आगे गंगाजी के उद्गम-स्थल, गंगोत्री की ओर अपनी चढ़ाई प्रारंभ करेंगे। इन सहभागियों में से कुछ हमारे साथ पिछले साल वहाँ की यात्रा कर चुके हैं मगर दोबारा गंगा के तट पर विश्राम करने की, गंगा के साफ, स्वच्छ पानी में पैर डाले, उसकी शक्तिशाली लहरों के थपेड़ों का आनंद उठाने की लालसा लिए हुए हैं। अगर रास्ता खुला मिला तो वे गौमुख, जहां गंगा का मूल स्रोत, ग्लेशियर स्थित है, तक ट्रैकिंग कर पाने की जुगत भी भिड़ाएँगे।

वापस उतरते हुए मनेरी में हमारे सहभागियों का पड़ाव मनेरी झील के किनारे होगा, जहां वे पहाड़ की वादियों में फिर एक बार एकांत और शांति का सुख उठाएँगे और उसके बाद वापस नीचे की ओर ऋषिकेश के लिए प्रस्थान करेंगे जो उनकी यात्रा का प्रथम पड़ाव भी था और अब अंतिम पड़ाव भी होगा।

हमारे इस बार के यात्रियों के लिए यह एक अनोखा आश्चर्य होगा कि ऋषिकेश से मथुरा तक की यात्रा वे छोटी-मोटी बस से नहीं बल्कि रेल से पूरी करेंगे! यह उनकी सबसे लंबी यात्रा होगी और अब वे रेल की खिड़की से पीछे छूटते भूदृश्यों का अवलोकन करते हुए, थोड़ी बहुत चहलकदमी कर सकेंगे और चढ़ाई की थकान भी मिटा सकेंगे।

अंत में वे सब वृंदावन पहुंचेंगे। यहाँ आश्रम में हम सब उनके मुख से इस अभियान का विवरण सुनने के लिए आतुर हैं और उनके स्वागत के लिए आंखे बिछाए बैठे हैं।