समय आपके सारे दुख-दर्द हर लेगा, उसे अवसर दीजिए – 4 जनवरी 13

समय

कुछ दिनों के भीतर अम्माजी को गुज़रे हुए एक महीना हो जाएगा। मैंने पहले ही बताया है कि यह पूरा महीना हमारे लिए बहुत तनावपूर्ण रहा है और इस दौरान जब मैं अपने आप को और अपनी संवेदनाओं, भावनाओं को क़रीब से देख रहा था, मैंने एक बार फिर यह महसूस किया कि जीवन में समय की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है और बीत रहा हर पल हमारी भावनाओं पर कितना असर डालता है। मैं मानता हूं कि समय वास्तव में दुख से उबारता है – और आप यह भरोसा कर सकते हैं कि समय अवश्य आपको आपकी भावनाओं से निपटने में सहायता करेगा।

बिल्कुल प्रारंभ में, अम्माजी के गुज़रने के पहले कुछ घंटों में मैं सदमें में था। कोई आंसू नहीं थे। और मैं ऐसा महसूस कर रहा था जैसे अभी वास्तव में वे गई नहीं हैं। मस्तिष्क वहीं था, यह सोचता हुआ कि अम्माजी जा चुकी हैं, बब्बाजी और नानीजी को उनकी पीड़ा में देखता हुआ लेकिन भावनाएं सत्य के उस बिंदु पर तब तक नहीं पहुंची थीं। यह सत्य मुझ तक तब जाकर पहुंचा जब हम यमुना पर थे। जब मैं उस शुरुआती सदमे से निकला तब जाकर आंखों से आंसू बहने लगे और उनके गुज़र जाने का सत्य और उससे जुड़ी भावनाएं मेरे दिल तक पहुंच सकी।

उनकी मृत्यु के बाद कई दिनों तक जब कभी हम उनके बारे में बात करते, हम सब रोने लगते। कोई भी बात जो उनसे किसी भी तरह जुड़ी थी, जिनमें उनकी याद शामिल थी, हमारा गला अवरुद्ध कर देती, हमारी आंखों से आंसू बहने लगते। हमने उनके बारे में बहुत बातें की और मैंने उन बातों को, उन ख़्यालों को यहां आपके साथ इस डायरी में साझा भी किया। उनका ख़्याल हमेशा आता रहा. सब कुछ किसी न किसी तरह उनसे जुड़ा होता और अगर कुछ ऐसा हो जिसका वास्तव में उनसे कोई संबंध न हो तब भी हम कह देते, “उनका इससे कोई लेना-देना नहीं था!” हम उनकी चप्पल देखते, उनका बगीचा देखते, जहां वो हमेशा बैठा करती थीं वो ख़ाली जगह देखते। हम बात करते और रोते।

कुछ दिनों के बाद, हमने सब कुछ कह लिया था। अम्माजी से जुड़ी हर छोटी और बड़ी चीज़ के बारे में हमने बातें कर ली थीं, रो लिया था। फिर एक समय ऐसा आया जब कहने को बहुत कुछ बचा नहीं क्योंकि सारी बातें कही जा चुकी थीं। हालांकि फिर भी उनका ख़्याल आता और मुझे उदास कर देता। सारे ख़्याल मुझे रुलाते नहीं थे लेकिन कभी-कभी रोना भी आ जाता। उन सत्यों को स्वीकार करना धीरे-धीरे आने लगा था जिन्हें आप बदल नहीं सकते।

आज भी हालांकि, सुबह का सबसे पहला ख़्याल अम्माजी से जुड़ा होता है। वह दृश्य जब वे हमें छोड़ गईं, हमारे साथ बिताए उनके आख़िरी पल, सब कुछ मस्तिष्क में बिल्कुल स्पष्ट है और मेरी आंखों के आगे वह दृश्य अक्सर घूमता रहता है। कल मैंने अपरा को जिसे सर्दी लग गई थी, अपनी बांहों में लिया हुआ था, और मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं जब छोटा था, अपनी मां की बाहों में रहना चाहता था। स्मृतियां हैं और हमेशा रहेंगी. लेकिन समय के साथ भावनाओं का उबाल और उनसे उपजा तनाव कम हुआ है लेकिन हम उन्हें याद तो हमेशा ही करेंगे।

खुद को वक़्त दीजिए। यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है, समय आपके दुखों को धीरे-धीरे हर लेता है। समय के इस खेल पर मैं एक बार फिर मोहित हो गया हूं। यह ज़रूरी है कि समय को अपना काम करने दीजिए, न कि सहिये, बर्द्दाश्त कीजिए, रोने का मन करे तो रो लीजिए, खुद को रोकिए मत क्योंकि यह समय उसके लिए सही है। दुबारा हंसने का समय भी आएगा लेकिन अपने दुखों को भी जगह दीजिए ताकि समय आपको उनसे उबार सके।

Leave a Comment