आभासी पर्दे के लिए वास्तविक इंसान को अनदेखा न करें – 17 दिसंबर 2015

तकनीक

जबकि मैं पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया के बारे में लिखता रहा हूँ और कल मैंने बताया था कि वास्तव में मैं भी उसे पसंद करता हूँ, आज मैं आपको एक ऐसी बात बताना चाहता हूँ, जिसे मैं सख्त नापसंद करता हूँ, हालांकि वह सोशल मीडिया से संबंधित नहीं है बल्कि मोबाइल फोनों, टेबलेट जैसी चीजों से संबंधित है: मैं ऐसे व्यक्ति से बात करना पसंद नहीं करता जिसका ध्यान चर्चा के दौरान अपने हाथ में पड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर केंद्रित होता है!

मैं जानता हूँ कि आधुनिक तकनीकी उपकरणों ने हजारों किलोमीटर दूर मौजूद लोगों से संवाद को इतना सहज बना दिया है कि विश्वास नहीं होता। यह कितनी अच्छी बात है कि आप अभी किसी को संदेश भेजें और एक सेकंड के बाद उसका जवाब भी पा लें। यह भी ठीक है कि ये छोटे-छोटे उपकरण आजकल मनोरंजन का साधन भी बन चुके हैं, जिन पर आप घंटों कोई खेल खेल सकते हैं या कोई फिल्म या मनोरंजक वीडियो देख सकते हैं। लेकिन जैसा कि कल अपने ब्लॉग में मैंने लिखा था, वास्तविक दुनिया हर हाल में बेहतर होती है! यथार्थ जीवन अधिक महत्वपूर्ण है! कृपा करके अपने हाथ में पड़े निर्जीव मोबाइल पर्दे के पीछे अपने सामने बैठे वास्तविक, जीते-जागते इंसान की उपेक्षा न करें!

समस्या यह है कि इन उपकरणों के और उनके साथ आने वाले सॉफ्टवेयर और एप्लिकेशन्स के निर्माता ठीक यही चाहते हैं: वे चाहते हैं कि आप उनमें इतना लिप्त हो जाएँ कि पर्दे पर टकटकी लगाए बैठे रहने के अलावा दूसरा कोई काम कर ही न पाएँ। आपमें उस उपकरण को खुद से अलग न करने की तीव्र आतंरिक इच्छा पैदा हो जाए। ऐसा होने में ही उनकी विजय निहित है। अब जो भी वे बेचेंगे, वही आप खरीदेंगे और क्रमशः अपने वास्तविक जीवन का एक हिस्सा खो देंगे क्योंकि अपने आसपास के लोगों के स्थान पर आपने अपने आपको उनके उपकरणों और उनकी नई-नई खोजों में बुरी तरह लिप्त कर लिया है।

बहुत पहले एक चर्चा में यह बात सामने आई थी कि वीडियो गेम्स बच्चों में उनकी लत पैदा कर देते हैं। लेकिन ठहरिए, सिर्फ बच्चों में ही नहीं, बड़ों में भी! मैं शुरू से बच्चों को वीडियो गेम्स से दूर रखने के पक्ष में रहा हूँ जिससे वे उसके आदी न हो जाएँ-क्योंकि भविष्य में उनके वयस्क जीवन पर भी उसका नकारात्मक असर पड़ सकता है!

लेकिन आजकल युवाओं के लिए मोबाइल प्राप्त करना सामान्य बात है। यह स्मार्टफोन होता है, जिससे वे सोशल नेटवर्क का उपयोग भी कर सकते हैं। स्मार्टफोन से उन्हें स्वतः ही अनगिनत एप्लिकेशन्स उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे दिन भर वे बिना किसी टोका-टाकी के कोई भी उपलब्ध एलेक्ट्रोनिक खेल खेल सकते हैं! गेमिंग, संदेश भेजना, फोटो साझा करना, फोटो लेना और न जाने क्या क्या मनोरंजन के साधन-और वह भी सारा दिन।

गलत अंग-मुद्राओं के कारण होने वाली परेशानियों, लगातार मोबाइल से चिपके रहने के कारण आँखों पर होने वाले नकारात्मक असर और गतिविधियों में कमी के चलते सामान्य स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक असर के अलावा यथार्थ से संपर्क टूटने की बहुत बड़ी समस्या भी पेश आती है। यही होता है, जब आप किसी से बात कर रहे होते हैं और एक बार भी उसकी आँखों में झाँककर नहीं देखते क्योंकि उसी वक़्त आप मोबाइल पर आने वाले संदेश पढ़ रहे होते हैं या उनके जवाब दे रहे होते हैं या उससे भी बुरी बात, कोई खेल खेल रहे होते हैं।

यथार्थ में लौटिए, वास्तविक बनिए, वास्तविक जीवन का उपभोग कीजिए और दूसरों के साथ वास्तविक, जीवंत संपर्क बनाइए!

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