क्या वास्तव में आप काल्पनिक संसार को वास्तविक संसार से अधिक वरीयता देते हैं? 18 सितम्बर 2014

तकनीक

कल मैंने कुछ कारण बताए थे कि क्यों आपको टीवी नहीं देखना चाहिए। मेरी नजर में टीवी देखना समय बिताने का इतना बुरा तरीका है कि जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। टीवी देखने के विरोध में कुछ और कारणों को सूचिबद्ध करते हुए आज मैं इस विषय का समापन करूँगा:

4) वह विज्ञापनों के हमले का ऐसा ज़रिया है, जिसके प्रभाव से आप मुक़ाबला नहीं रह सकते!

किसी भी टीवी सीरियल या टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्म के बीच ब्रेक लेते हुए लगातार अनेकों विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं। आप आधा घंटा भी लगातार किसी मनोरंजन का या समाचार या किसी जानकारी का या उसे समझने का लाभ नहीं उठा पाते। उन विज्ञापनों में से कुछ तो आप तक पहुँचते ही हैं और जितनी खूबसूरती, चतुराई और मक्कारी के साथ उन्हें तैयार किया गया है उसी अनुपात में वे आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं और अपने लक्ष्य में सफल हो जाते हैं! आपको उन वस्तुओं के विज्ञापन इतनी बार देखने पड़ते हैं कि न सिर्फ आप उन्हें अच्छी तरह जानने लगते हैं बल्कि उन पर भरोसा भी करने लगते हैं। सिर्फ बार-बार उन्हें देखते रहने के कारण। इसी तरह ये विज्ञापन आपके अवचेतन में यह एहसास पैदा कर देते हैं कि उन चीजों का आपके पास होना बहुत ज़रूरी हैं भले ही आपके लिए वे कितनी भी अनुपयोगी क्यों न हों। कोई इलेक्ट्रोनिक सामान, खाने-पीने की वस्तुएँ या बीमा पॉलिसियाँ, कुछ भी!

सच यह है कि ये विज्ञापन बेहद असरदार होते हैं। यह अपनी बात मनवाने का, दिमाग को लुंज-पुंज करके उसमें अपनी बात स्थापित करने का बहुत ही नर्मो नाज़ुक और सूक्ष्म मगर बेहद पुरअसर तरीका है, जिसके सामने आप निरुपाय हो जाते हैं! अगर आप नहीं चाहते कि आपके साथ ऐसा हो तो टीवी बंद कर दीजिए!

5) टीवी देखकर आप काल्पनिक दुनिया में खो जाते हैं और फिर जीवन के यथार्थ आपको आवसाद से भर देते हैं!

यह मुद्दा आखिरी मगर कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस पर मैं अधिक जोर भी नहीं दे पाऊँगा क्योंकि यह ऎसी बात है जिसे आप अक्सर समझ ही नहीं पाते, विशेषकर यदि आप बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं: वे टीवी सीरियल और फ़िल्में आपको इस तरह बाँध लेती हैं कि आप उसी में डूब जाते हैं, दूसरी बातों पर सोच ही नहीं पाते। वे महज किस्से-कहानियाँ होती हैं मगर इतनी अच्छी तरह पेश की जाती हैं, उनका निर्देशन इतना यथार्थवादी होता है कि नतीजतन आप इस तरह उनके मुख्य चरित्रों के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं कि उनकी भावनाएँ आपके साथ एकरूप हो जाती हैं! आप उनके साथ दुखी होते हैं, उनका सुख आपका सुख बन जाता है! सवाल यह है कि इसमें समस्या क्या है?

धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से आपका संपर्क कम होता जाता है। आप सोच रहे होंगे कि यह कुछ अतिवादी सोच है मगर ऐसा नहीं है! यह प्रक्रिया जो आपको काल्पनिक दुनिया में खींच ले जाती है, बहुत धीमी गति से काम करती है। इसकी शुरुआत इससे होती है कि आप कल्पना करने लग जाते हैं कि यह एक वास्तविक दुनिया है। आप रुपहले पर्दे की उस दुनिया की तुलना अपने जीवन से करते हैं तो पाते हैं कि आपकी वास्तविक दुनिया उस दुनिया से कभी भी बेहतर नहीं हो सकती!

पहली बात तो यह कि वास्तविक दुनिया कभी भी टीवी और फिल्मों की दुनिया की तरह रोमांचक, रुपहली और उत्तेजक घटनाओं से परिपूर्ण नहीं हो सकती! उसमें पूरे जीवन की कहानी दो घंटों में पेश कर दी जाती है और आपको महसूस होता है कुछ छूट रहा है! टीवी सीरियल्स में हर हफ्ते कोई न कोई मरता है, शादी करता है, किसी न किसी के साथ धोखा होता है, कोई दुर्घटना हो जाती है और बचा लिया जाता है या उसके प्रेमी के साथ उसका मिलन हो जाता है! अगर यह जीवन के बहुत करीब होगा या उससे मिलता-जुलता होगा तो वह बड़ा उबाऊ हो जाएगा और उसे देखना कोई पसंद नहीं करेगा-आखिर आप अपने जैसे किसी साधारण व्यक्ति को क्यों देखना चाहेंगे? आपने गौर किया होगा कि 'बिग ब्रदर' जैसे रियलिटी शो भी ऐसे लोगों को ही चुनते हैं जो अपने जीवन में सामान्य, साधारण लोगों से कुछ अलग होते हैं, जिससे उसे ज़्यादा से ज़्यादा 'असाधारण' और रोचक बनाया जा सके!

टीवी देखने की आदत का आखिर नतीजा क्या होता है? नतीजा यह होता है कि अपने जीवन से जिन लोगों की अयथार्थवादी और गैर मामूली उम्मीदें होती हैं वे निराश हो जाते हैं।

टीवी के पर्दे से दूर रहिए, अपने बच्चों को प्रकृति के नजदीक ले जाइए, वास्तविक दुनिया का आनंद लीजिए!

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