शिक्षित आधुनिक अन्धविश्वासी का अंतर्द्वंद – 1 जुलाई 2013

अन्धविश्वास

मेरे एक मित्र ने बताया कि एक बार वह अपने दो मित्रों के साथ अंधेरे में पैदल एक मीटिंग में शामिल होने जा रहा था। वे एक सामान्य भारतीय सड़क पर, आप जानते ही हैं कि भारतीय सड़कें कैसी होती हैं, चले जा रहे थे कि मेरे मित्र के पैरों में जोर का दर्द हुआ और वह चिल्ला उठा। दूसरों ने उसकी ओर देखा और टॉर्च जलाकर देखने लगे कि उसे क्या हो गया।

मेरा मित्र घबराहट में चिल्ला रहा था कि उसे किसी साँप-वांप ने काट खाया है और यह देखकर कि वह अपना पाँव पकड़कर बैठा है, उसके मित्र टॉर्च की रोशनी उसके पैरों पर डालकर देखने लगे। उसके पैर के पास ही उन्हें एक बिच्छू दिखाई दिया जिसकी पूंछ पर ऊंचा उठा हुआ डंक अभी भी चमक रहा था। मेरे मित्र को बिच्छू ने काट लिया था।

इतनी वेदना में भी सबसे पहला काम जो मेरे मित्र ने किया वह था उस बिच्छू को जान से मार देना। मेरे ख्याल से सभी, यह सोचकर कि किसी और को न काटे, यही करते। लेकिन मेरे मित्र ने उसे मारने का जो कारण बताया वह दूसरा था। उसका कहना था कि मारना ज़रूरी इसलिए था कि बिच्छू का जहर उसके शरीर में न फैले! निश्चय ही यह एक अंधविश्वास है क्योंकि जहर तो उसके शरीर में पहुँच चुका था और बिच्छू उससे दूर था। लेकिन यह भी एक बहुत छोटा सा अंधविश्वास है।

असली अंधविश्वास तो मैंने बाद में देखा जब मेरे उस मित्र ने बताया कि वे सीधे पास के गाँव में रहने वाले एक साधु के पास गए जो इतना पहुंचा हुआ था कि मंत्रोच्चार से बिच्छू का जहर उतारने की हिकमत जानता था।

जी हाँ, वे उस साधु के पास गए जिसने कुछ दक्षिणा लेकर मेरे मित्र पर अपना जादू आजमाया। उसने एक कपड़ा मित्र की जांघ में कसकर बांध दिया और कुछ तिनके इकट्ठा करके उन्हें झाड़ू की शक्ल में बांधकर मंत्र पढ़ते हुए ब्रश की तरह मित्र के पैर पर चलाने लगा। यह नाटक इसलिए किया गया कि ऐसा करने से न सिर्फ बिच्छू का जहर उसके शरीर में फैलना बंद हो जाएगा बल्कि वह बाहर निकल जाएगा। और वाकई मेरे मित्र ने जहर को धीरे-धीरे नीचे की ओर उतरते हुए महसूस किया। लेकिन वापस कार में बैठते ही उसके विचारों में आपसी कलह शुरू हो गया: वह एक पढ़ा-लिखा, विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त व्यक्ति था और किताबों में उसने पढ़ा था, विद्वानों के मुख से भी सुना था कि बिच्छू के काटने पर डॉक्टर को अवश्य दिखाना चाहिए। उसे इस पर भी भरोसा था कि साधु ने जहर उतार दिया है। फिर वह डॉक्टर के पास क्यों जाना चाहता था? लेकिन वह गया, दवाइयाँ खरीदीं और शायद इंजेक्शन भी लगवाया। वह बिच्छू के काटने के हादसे से पूरी तरह निपटना चाहता था: उसकी नज़र में वह दुगना सुरक्षित हो गया था; धार्मिक मंत्र भी पढ़वा लिए और वैज्ञानिक इलाज भी करवा लिया।

मैं इस वाकये के बारे में इसलिए लिख रहा हूँ कि आप देखें कि अंधविश्वास अच्छे-खासे, पढे-लिखे समझदार व्यक्ति को कहाँ पहुंचा देता है! उसे लगता है कि उसके विश्वास और उस अटूट विश्वास के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण साधु के मंत्रों ने अपना काम किया होगा। मैं जानता हूँ कि सिर्फ डॉक्टर के इलाज से ही बिच्छू के जहर से उसे छुटकारा मिला था।

इस व्यक्ति के सामने बहुत बड़ी समस्या है। वह दुविधा में है कि विज्ञान पर भरोसा करे या अपने अंधविश्वास पर। वास्तव में वह पूरी तरह दोनों में से किसी पर भी विश्वास नहीं करता! उसे यह विश्वास नहीं है कि सिर्फ साधु के मंत्र जहर उतार सकते हैं और डॉक्टर पर भी विश्वास नहीं है कि सिर्फ उसकी दवाइयाँ उसे जहर से मुक्त कर सकती हैं। पहले वह उसके पास जाएगा जो उसका इलाज ईश्वरीय शक्ति से करेगा और फिर डॉक्टर के पास भी जाएगा जो फीस लेकर उसका वैज्ञानिक इलाज करेगा!

यह एक दिमागी बीमारी है जो इस व्यक्ति को पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ किसी एक पर भरोसा करने और उसके अनुसार निर्णय लेने से रोकती है। वह हमेशा बीच का रास्ता चुनेगा और दोनों पर विश्वास करेगा, दोनों विश्वासों के आधार पर निर्णय लेगा और इस तरह अपना समय और पैसा बर्बाद करता रहेगा! आशा ही कर सकता हूँ कि कभी न कभी ऐसी परिस्थितियों में उलझे लोग वास्तविकता को समझेंगे कि अंधविश्वास किसी की रक्षा नहीं कर सकता।

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