अपने भारतीय पाठकों के लिए मैं अंधविश्वासियों की एक और किस्म की चर्चा कर रहा हूं। ये हमारे खिलाड़ी हैं जो लाखों भारतीय युवाओं के आदर्श हैं और मेरा मानना है कि इसी वजह से इन्हें किसी प्रकार के अंधविश्वास में यकीन नहीं करना चाहिए।
अंधविश्वासी क्रिकेट खिलाड़ी
अंधविश्वासी व्यवसायी के बारे में लिखते हुए मैंने कहा था कि उसे अपने कौशल और मेहनत पर पूरा भरोसा नहीं होता, इसलिए वह अपनी सफलता का पूरा श्रेय किसी अदृश्य शक्ति को देता है। यही बात भारत के क्रिकेट व अन्य खेलों के खिलाड़ियों पर भी लागू होती है। बहुत से खिलाड़ी बड़े अंधविश्वासी होते हैं। उनके पास धन – दौलत है, बहुत सारे रिकॉर्ड्स इनके नाम हैं लेकिन इसके बावजूद वे मानते हैं कि यह उनकी प्रतिभा, मेहनत और अभ्यास का फल नहीं है कि उन्हें कामयाबी मिली है।
भारत की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के कुछ खिलाड़ी अपनी जन्मतिथि के नंबर वाली जर्सी पहनकर खेलते हैं और यह विश्वास करते हैं की यह उनके लिए भाग्यशाली होगा। मिसाल के तौर पर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की का नम्बर 7 छपा होता है क्योंकि उनकी जन्मतिथि है 7 जुलाई। इसी तरह युवराज सिंह जिनकी जन्मतिथि 12 दिसम्बर है, उनकी जर्सी का नम्बर 12 होता है।
बहुत से खिलाड़ी अपनी पतलून की बाईं जेब में रूमाल रखते हैं, कईयों के रुमाल का रंग लाल होता है जबकि कई पीले रुमाल में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि यदि वे ग़लत रंग का रुमाल रखेंगें या रुमाल को ग़लत जेब में रखेंगें तो जीत हासिल नहीं होगी। युवराज सिंह और विराट कोहली रुमालों में तो यकीन नहीं रखते लेकिन कलाई पर काले रंग का बैंड बुरी नज़र से उनकी रक्षा करता है।
भारत के सफलतम क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर हमेशा पहले बाएं पैर पर पैड बांधते हैं और उसके बाद दाएं पर। वह इस बात का खास ध्यान रखते हैं ताकि उनके खेल पर बुरा प्रभाव न पड़े। इस बात में कोई अचरज नहीं है कि जादूगर स्वर्गीय सत्य सांईबाबा उनके गुरु थे। ये वही पाखंडी सांई बाबा थे जो हवा में सोना पैदा करके अपने भक्तों का बेवकूफ बनाते थे। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि बड़े बड़े रिकॉर्ड बनाने वाले सचिन ऐसे ढोंगी बाबा के भक्त थे।
मैंने पढ़ा है कि ये महान खिलाड़ी टीम की बस में भी अपनी सौभाग्यप्रदाता सीटों पर ही बैठते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि अग़र 'अपनी' सीट पर नहीं बैठेंगें तो उस दिन उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहेगा और इसीलिए बस मे बैठने की व्यवस्था में कभी कोई बदलाव नहीं होता। एक और क्रिकेटर है श्रीसंत। चाहे कुछ भी हो जाए वह सबसे आखिर में बस से उतरते हैं। शायद उनका विश्वास है कि ऐसा करने से वह सबसे आखिर में आउट होंगें।
एक बहुत ही प्रचलित अंधविश्वास है 'सौभाग्यसूचक आइटम' का। यदि आप कोई खास कैप, रुमाल, दस्ताना, जूता या अन्य कोई आइटम पहनकर बहुत अच्छा खेलें हैं या जीत हासिल की है तो अगली बार खेलने जाते वक़्त आप उस आइटम को साथ ले जाना नहीं भूलते हैं। हद तो तब हो गई जब भारत के अधिकारिक क्रिकेट संगठन BCCI ने सितम्बर 2012 में राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को नई डिजाइन की हुई जर्सियां न पहनने की सलाह दी क्योंकि आम जनता के सामने वे जर्सियां पहले ही प्रदर्शित हो चुकी थीं। उनसे कहा गया कि वे सब अपनी वही जर्सियां पहनें जिन्हें पहनकर उन्होंने पिछले साल विश्व कप जीता था।
खेलों में, विशेषकर क्रिकेट में अंधविश्वास का बोलबाला है। यह सब कोरी बक़वास है और एक मनोवैज्ञानिक भ्रमजाल है जो खिलाड़ियों ने अपने लिए रच रखा है। वे अपनी क्षमताओं में विश्वास रखने की अपेक्षा स्वयं को रुमाल जैसी चीजों का दास बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वे अपनी प्रतिभा के बल पर नहीं बल्कि बस में मिली मनचाही सीट के बल पर जीत हासिल करते हैं। उन्होंने सही मौके पर गेंद को लपक लिया इसकए लिए वे अपनी पैनी नज़र और ट्रेनिंग को इसका श्रेय देने के बजाए भाग्यशाली दस्ताने का शुक्रिया अदा करते हैं।
क्या खिलाड़ी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि गुरु, धर्मशास्त्र और अन्य अंधविश्वासी लोग सही है और वैज्ञानिक तथा नास्तिक ग़लत। ये खिलाड़ी हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। उन्हें चाहिए कि वे आचरण के ऊंचे मानदंड स्थापित करें और ऐसी बेहूदा बातों में यकीन करना बंद करें।
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