अंधविश्वासियों की किस्में – 2: आम मध्यमवर्गीय आदमी – 12 मार्च 13

अन्धविश्वास

दूसरी किस्म का अंधविश्वासी आदमी जिसके बारे में मैं बात करना चाहूंगा वह भारत में हर जगह मौजूद है।

ग्रामीण अंधविश्वासी से भिन्न आम मध्यमवर्गीय व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि वह इस बात को नहीं जानता कि अंधविश्वास कोरी बक़वास है। वह स्कूल गया है और इतनी शिक्षा उसने पाई है कि वह अंधविश्वास की सत्यता की जांच कर सके। इसके बावजूद वह इस बक़वास में विश्वास करता है।

वह अपने माता – पिता को डराना या निराश करना नहीं चाहता और न ही उनकी बात को नकार कर उनके प्रति अनादर प्रदर्शित करना चाहता है। कम से कम उस हर व्यक्ति को तो वह यही स्पष्टीकरण देता है जो उसके साथ इस बारे में बहस करता है या उसके सामने यह प्रमाण प्रस्तुत करता है कि अंधविश्वास नहीं करना चाहिए। सच तो यह है कि खुद उसके भीतर से यह आवाज़ आती रहती है 'क्या होगा यदि यह सच हुआ तो …..।' यही कारण है कि उसके लिए अंधविश्वास को छोड़ पाना मुश्किल होता है।

सभी प्रकार के अंधविश्वासियों में यह मध्यमवर्गीय आदमी सबसे ज्यादा भीरू किस्म का अंधविश्वासी होता है और हमेशा एक तरह की असुरक्षा की भावना उसे घेरे रहती है। निम्नवर्गीय व्यक्ति के पास खोने के लिए कुछ होता ही नहीं, अतः उसे कुछ खोने की चिंता नहीं होती। उच्चवर्गीय व्यक्ति को यदि कुछ खोना भी पड़े तो वह यह खतरा उठा सकता है। अतः उसे भी चिंता करने की जरूरत नहीं होती। मध्यमवर्गीय आदमी के साथ दिक्कत यह है कि उसके पास खोने लायक तो है ही, लेकिन उसके पास इतना अधिक भी नहीं होता कि खोने के बाद उसे कोई फर्क ही न पड़े। यही स्थिति उसके भय को पुख्ता करती है और इसी कारण मध्यमवर्ग के लोग अंधविश्वास में ज्यादा पड़े रहते हैं।

जब किसी परिस्थितिवश वे अंधविश्वास का सहारा लेते हैं और ऐसे में कोई उन्हें समझाता है कि यह सब बक़वास है तो उनका जवाब होता है 'इससे कोई नुकसान थोड़े ही होता है, इसे मानने में हर्ज ही क्या है?' यदि मुझे कोई नुकसान नहीं हो रहा है तो मैं क्यों न इसे मानूं – हो सकता है अंत में यह सच प्रमाणित हो जाए। वास्तव में उनकी यह सोच इतनी उलझनें पैदा करती है कि नुकसानदेह होने के बाद भी वे अपने अंधविश्वास को मानना बंद नहीं करते। मिसाल के तौर पर यदि आपको गुरुवार को अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है, तो भी आप अपने अंधविश्वास के चलते एक दिन और वहां रुकने का निश्चय करते हैं। जबकि यह आपकी जेब पर भारी पड़ रहा है। पैसे का नुकसान हुआ। लेकिन आप इस कदर घबराए हुए थे कि कहीं अंधविश्वास सच साबित न हो जाए और इसके लिए आप पैसे का नुकसान उठाने के लिए भी तैयार हो गए। इससे एक बात तो साबित होती है कि आप अपने अंधविश्वास की खातिर नफा – नुकसान उठाने के लिए भी तैयार रहते हैं।

मैं केवल पैसे की बात नहीं कर रहा हूं। मुझे लगता है कि ये लोग काफी हद तक अपनी आजादी भी खो देते हैं। ये कोई भी निर्णय ले पाने में असमर्थ रहते हैं और इनका दिमाग हमेशा अंधविश्वास की गिरफ्त में रहता है। मुझे बड़ा दुख होता है कि इन्होंने अपनी बुद्धि को अंधविश्वास की भेंट चढ़ा दिया है। मैं मानता हूं कि अंधविश्वास के बिना इनकी ज़िंदगी ज्यादा खुशनुमा होती।

अंधविश्वास इनके संपूर्ण जीवन पर छाया रहता है। यदि आप इनकी दिनचर्या और आदतों पर गौर फरमाएं तो इनके अंधविश्वासों की गिनती करना मुश्किल हो जाए। मजेदार बात तो यह है कि इन्हें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं होती कि अंधविश्वास में यकीन न रखने वाले लोग इन्हें बेवकूफ मानते हैं।

ऐसा ही एक मज़ेदार किस्सा मैं आपको सुनाता हूं: जब मेरे श्वसुर पहली बार भारत आए तो हमने एक ड्राइवर को उन्हें एयरपोर्ट से लिवा लाने के लिए भेजा। उसे हमने नया नया काम पर रखा था। वह बड़ा धार्मिक और अंधविश्वासी था। अन्य अंधविश्वासियों की तरह उसकी भी एक आदत थी कि रास्ते में जो भी मंदिर दिख जाता वह उसे प्रणाम करता, अपना हाथ छाती से छुआकर माथे से लगाता और फिर मंदिर से संबंधित भगवान का स्तोत्र पढ़ता। जब यशेंदु ने लौटकर नए ड्राइवर की इस आदत के बारे में बताया तो हम सब कल्पना करने लगे कि मेरे श्वसुर सोच रहे होंगें कि शायद यह ड्राइवर मानसिक तौर पर बीमार है और इसे डॉक्टरी सलाह की जरूरत है। हो सकता है कि मेरे श्वसुर अपने आसपास के माहौल का नज़ारा देखने में इतने व्यस्त थे कि ड्राइवर की इस आदत की तरफ उनका ध्यान ही न गया हो या फिर शालीनतावश उन्होंने इस बारे में कोई बात नहीं की। मैं इतना ज़रूर जानता हूं कि इस ब्लॉग को पढ़ते वक़्त वह जरूर हंस रहे होंगें। यह बात सच है कि धार्मिक लोग इस तरह की अजीबोग़रीब हरकतें करते हैं और उन्हें इस बात का कतई अहसास नहीं होता।

धार्मिक होना एक सामान्य बात है। भारत ही नहीं दुनियाभर में नास्तिकों के मुकाबले धार्मिकों की संख्या कहीं ज्यादा है और इन धार्मिक लोगों के अपने अपने अंधविश्वास हैं। आप यह आपत्ति कर सकते हैं कि मैंने चर्चा का रुख अंधवि्श्वास से हटाकर धर्म की तरफ मोड़ दिया है तो मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति अंधविश्वासी होता है क्योंकि अंधविश्वास का नाम ही धर्म है। आप ऐसा नहीं कह सकते 'मैं धार्मिक हूं मग़र अंधविश्वासी नहीं।'

यही वजह है कि मैं मानता हूं कि आम मध्यमवर्गीय धार्मिक व्यक्ति कहीं अधिक खुशहाल हो सकता है यदि वह धर्म और अंधविश्वास का साथ छोड़कर जीवन जीना प्रारंभ कर दे।

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