अंधविश्वासियों की किस्में – 1: भोले भाले, अनपढ़ ग्रामीण – 11 मार्च 13

अन्धविश्वास

पिछले सप्ताह मैंने अंधविश्वास और अंधविश्वासियों के बारे में बहुत कुछ लिखा। मैंने यह प्रश्न भी किया था कि क्या ये अंधविश्वासी लोग वाकई इस बक़वास में यकीन रखते हैं। जवाब नहीं में था। वे डरते हैं कि क्या होगा अग़र यह अंधविश्वास सच हुआ तो! या फिर उनमें इतना साहस नहीं है कि अपने बुजुर्गों की कही बात को न मानें। मुझे लगा कि एक अंधविश्वासी व्यक्ति की मानसिकता को समझने के लिए थोड़ा और आगे जाना होगा। मेरा मानना है कि अग़र बात भारत देश की करें तो हमारे यहां मोटे तौर पर पांच किस्म के अंधविश्वासी पाए जाते हैं। आइए, पहली किस्म के अन्धविश्वासियों की बात करते है|:

ग्रामीण अंधविश्वासी

इस किस्म के व्यक्ति को मैं अंधविश्वासी होने का दोषी नहीं ठहराता क्योंकि वह इस बात से बिल्कुल बेखबर होता है कि अंधविश्वास कोरी बक़वास है। आज भी भारत में कई स्थान ऐसे हैं जहां शिक्षा की सुविधा का अभाव है। शिक्षा के अभाव में
वहां के लोगों को विज्ञान की जानकारी नहीं हो पाती जिसके जरिए यह पता चल सके कि चीज़ें क्यों और कैसे होती है। शिक्षा की गुणवत्ता की तो बात ही छोड़िए, लोगों ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है। वे पूर्णतया निरक्षर हैं और अपनी ज़िंदगी में जितनी पुस्तकें उन्होंने देखी हैं, वे उनकी गिनती अंगुलियों पर कर सकते हैं। वे अपनी गुजर – बसर के लिए खेतीबाड़ी करना और पेड़ पौधे उगाना जानते हैं लेकिन वे यह नहीं जानते कि कैसे पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है, पानी भाप बनकर कैसे उड़ता है या बीमारियां कैसे फैलती हैं।

मेरा मानना है कि वे आज भी उस युग में जी रहे हैं जब अंधविश्वास और धर्म ने अपनी जड़ें जमाना शुरु किया था। सूरज को ग्रहण लगा, अचानक चारों ओर अंधेरा छा गया और बेचारे ग्रामवासी घबरा गए। ऐसे में एक पंडित / ब्राह्मण आता है और शास्त्रों को पढ़कर बताता है कि ईश्वर ने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि पृथ्वी पर पाप बहुत बढ़ गया है और वह मनुष्य को इसकी सज़ा देना चाहता है या फिर एक असुर ने सूर्यदेव को ग्रस लिया है। वह पंडित कहता है कि पापों का प्रायश्चित करने के लिए कुछ कर्मकांड करने होंगें, प्रार्थना करनी होगी, तभी यह अंधकार दूर हो सकता है।

इसी प्रकार गांवों के लोग यह मानते हैं कि चेचक की बीमारी देवी के प्रकोप के फलस्वरूप होती है और दवा इत्यादि से इसका इलाज नहीं किया जा सकता। देवी का क्रोध शांत करने के लिए प्रार्थना व पूजा इत्यादि करनी होगी।

यदि वे ऐसा करते हैं तो कुछ ग़लत नहीं करते हैं क्योंकि जो बातें उनकी समझ से परे हैं वे उनसे भयभीत रहते हैं। और धर्म यह बात अच्छी तरह जानता है कि इस अज्ञान का फायदा कैसे उठाया जा सकता है । इस प्रकार हर समस्या के निदान के लिए लोग धर्म पर आश्रित हो जाते हैं। धर्म लोगों का यह कहकर बेवकूफ बनाता है कि पूजा – पाठ और कर्मकांडों से प्राकृतिक आपदाओं का भी निवारण किया जा सकता है।

ये लोग कूपमंडूक होते हैं। उनके लिए कुआं ही उनका संसार होता है। वे इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं कि कुएं के बाहर भी एक बहुत बड़ी दुनिया है। वे ऐसा इसलिए मानते हैं कि उनके माता – पिता ऐसा मानते थे, जो उनकी तरह ही अनपढ़ थे। उन्हें माता पिता की बात सोलह आने सही लगती है। जब वे पंडित का उपदेश सुनते हैं तो बात और भी स्पष्ट हो जाती है और वे उसका अनुकरण करने लगते हैं।

वे सुनी सुनाई बातों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं और जब जैसी जरूरत होती है तब नए अंधविश्वासों को गढ़ लेते हैं। यदि उनके जीवन में कुछ अशुभ घटित होता है तो वे इसके पीछे कोई अंधविश्वासपूर्ण कारण ढूंढने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर काली बिल्ली को ही लीजिए। जिस क्षण वे काली बिल्ली को देखते हैं, उसी क्षण से वे अनहोनी की आशंका से घिर जाते हैं। वे ऐसी घटनाओं और बातों से घबराते हैं जिनको ज्ञान – विज्ञान के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। ये लोग अपने अंधविश्वासों में पूरी निष्ठा रखते हैं और उनके लिए वही सत्य है।

इसी कारण मैं कहता हूं कि अंधविश्वासी होने के लिए इन पर दोषारोपण नहीं किया जाना चाहिए। इसकी दोषी तो सरकार है जिसने गांवों में शिक्षा का प्रसार करने का प्रयास नहीं किया। या दोषी हैं वे धर्मगुरु और पुजारी जो ऐसे अंधविश्वासों को बढ़ावा देते हैं। आप इन लोगों को दोष न दें बल्कि जब भी अवसर मिले इन्हें जागरूक करने की कोशिश करें।

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