अंधविश्वासी लोग अपनी नौकरी छोड़ देंगे मगर अपना अंधविश्वास नहीं छोड़ सकते- 7 अक्तूबर 2013

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि अपरा को चेचक निकल आई है-अब वह लगभग पूरी तरह सामान्य हो गई है, थोड़े से लाल निशान रह गए हैं, जो कुछ खुजलाते हैं। अधिकतर छाले पूरी तरह ठीक हो गए हैं। बच्चों की प्रतिरोध क्षमता क्या कमाल दिखाती है, आश्चर्य होता है! मैं आपको आश्रम के कुछ दूसरे लोगों के विषय में बताना चाहता था, जिन्हें चेचक हो गई थी और इस बीमारी के कारण जो दिलचस्प वाकए यहाँ पेश आए, उनके बारे में भी।

एक छोटी बच्ची को चेचक हो जाए यह उसके परिवार के लिए जीवन भर में घटने वाली एक सामान्य सी बात है। किसी किंडरगार्टेन या स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए यह लगभग असंभव सी बात है कि उसे कभी न कभी चेचक न निकल आए। स्कूल इस बीमारी के विषाणुओं के प्रजनन केंद्र होते हैं, जहां वे एक साथ इतने सारे कोमल शरीरों के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। वे एक के बाद दूसरे पर इतने बेआवाज कूदते-फाँदते रहते हैं कि पता ही नहीं चलता कब, किसको यह बीमारी हो गई। ऐसा ही, जब प्रांशु का इलाज चल रहा था तो पवन और जय सिंह के साथ हुआ और वे अपने-अपने बिस्तरों पर बुखार और सारे शरीर पर उठे दानों और छालों के साथ पड़े थे। हमने बहुत कोशिश की कि अपरा को उनसे दूर रखा जाए और यहाँ तक कि उन बच्चों को हर संभव अलग-थलग कर दिया, जिससे आश्रम परिवार के असंख्य लोग संक्रमित होने से बचे रह सकें।

लेकिन, जैसा कि आप जानते हैं, अपने प्रयास में हम सफल नहीं हुए और मुझे लगता है कि यह विषाणु बेहद अदृश्य और शातिर है, जो किसी दूसरे पर तभी अपना कोई निशान छोड़ता है जब पहले वाला लगभग पूरी तरह संक्रामण मुक्त हो जाता है। वह कैसे काम करता है, मैं नहीं जानता मगर उसने सिर्फ हमारे बच्चे को ही संक्रमित नहीं किया बल्कि 25 और 35 साल के हमारे दो कर्मचारी भी इस बीमारी से ग्रसित हो गए।

किसी के शरीर पर लाल छालों जैसा कुछ देखने पर और उसे बुखार में कंपकंपाते देखकर जैसा तर्कसंगत व्यवहार कोई भी आम व्यक्ति करेगा वैसा ही हमने किया: हमने उन्हें डॉक्टर के पास भेज दिया। हमने डॉक्टर के इलाज की फीस अदा की और उनके लिए दवाइयाँ खरीदीं-आखिर हम चाहते थे कि वे जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ और आश्रम के उनके दूसरे सहकर्मी भी स्वस्थ रहे आएँ।

आश्रम के अधिकांश कर्मचारियों की तरह वे लोग भी हमारे आश्रम में ही रह रहे थे और उन्होंने फोन करके अपनी बीमारी के विषय में अपने परिवार वालों को बताया। दूसरे दिन उनके परिवार के कुछ लोग आश्रम आ गए और हमसे बात करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने हमसे कहा कि हमारी (अंग्रेज़ी) दवाइयाँ वे लोग नहीं लेंगे और उसकी जगह कुछ कर्मकांड किए जाएंगे। उनकी नज़र में, यह देवी का गुस्सा था जो छालों की शक्ल में उन बीमारों के शरीर पर उभर आया था। इसका सिर्फ एक ही इलाज था: देवी को प्रसन्न करना और वह पूर्ण श्रद्धा, पूजा-पाठ और प्रसाद-समर्पण से ही संभव था!

यहाँ, भारत में यह एक सामान्य मगर मूर्खतापूर्ण अंधविश्वास है कि चेचक का कोई इलाज नहीं है। मैंने इसके बारे में, 2010 में, लिखा था और दुर्भाग्य से उसमें अभी भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। लोग सोचते हैं कि कोई इलाज नहीं है, बीमारी अपने आप गायब हो जाएगी और कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए। इसके विपरीत-अगर आप दवाइयों लेते हैं या चेचक के छालों पर मरहम लगाते हैं तो आप देवी के और भी भीषण प्रकोप के भागी बनते हैं क्योंकि आपने उसकी सज़ा को श्रद्धा के साथ स्वीकार नहीं किया है!

हमने उन कर्मचारियों को उन बच्चों के उदाहरण देकर समझाने की कोशिश की जो डॉक्टर के इलाज से हफ्ते भर में ठीक हो गए थे-लेकिन वे कोई तर्क सुनना ही नहीं चाहते थे। कीमती दवाइयाँ फेंकनी पड़ीं और वे अपने परिवार वालों के साथ आश्रम छोड़कर चले गए। वापस जाते हुए गेट के पास पहुँचकर उन्होंने पूछा कि क्या वे ठीक होकर काम पर आ सकते हैं तो हमने उन्हें मना कर दिया। वे अपना काम छोड़ने के लिए तैयार थे मगर दवाइयाँ खाने के लिए नहीं।

जब यह सब चल ही रहा था मैंने इसका हाल सोशल नेटवर्क पर साझा किया था और कई मज़ेदार और कुछ विचलित कर देने वाले फीडबैक मुझे मिले, जिन्हें कल मैं आपके साथ साझा करूंगा।

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