महिलाओं को उनकी माहवारी के दौरान अपवित्र समझने का बेहूदा तर्क – 22 अप्रैल 2013

अन्धविश्वास

पिछले हफ्ते नवरात्रि उत्सव अपने चरम पर था। धार्मिक हिन्दू लगातार नौ दिनों तक नौ देवियों का उत्सव मनाते हैं। ईश्वर के इस नारीत्व की उपासना के बारे में सोचते हुए मेरे भीतर कुछ विचार पैदा हुए जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

नवरात्रि के इन नौ दिनों के दौरान धार्मिक परिवार छोटी लड़कियों को ईश्वर के प्रतीक के रूप में देखते हैं और उन्हें अपने घर बुलाकर खाना खिलते हैं। वे उन्हें बढ़िया भोजन कराते हैं और कुछ उपहार भी देते हैं। मगर 'छोटी लड़कियां' होने की कसौटी आखिर क्या है? वह है: वे लड़कियां जो अभी रजस्वला नहीं हुई हैं। जैसे ही माहवारी शुरू हुई ये लड़कियां देवी नहीं मानी जाएंगी। वैसे तो कई लड़के और बड़ी लड़कियां भी भोजन करने आ जाती हैं मगर सिर्फ और सिर्फ वही लड़कियां देवी मानी जाती हैं और पूजी जाती हैं जिनकी माहवारी अभी शुरू नहीं हुई हैं।

उस पहली बार के बाद एक लड़की यह सीखती है कि माहवारी होना कोई ऐसी बात है जो उसे अशुभ बनाती है। वह सीखती है कि इस दौरान वह अपवित्र होती है। वह रसोई में प्रवेश नहीं कर सकती और वह खाने-पीने के समान को छू भी नहीं सकती क्योंकि जिसे भी वह छू देगी वह दूसरों के लिए अपवित्र, अखाद्य हो जाएगा। विवाह के पश्चात भी वह माहवारी के दौरान कपड़े नहीं धो पाएगी क्योंकि कपड़े भी उसके स्पर्श से अपवित्र हो जाएंगे, भले ही वह कपड़ों को बहुत सारा साबुन लगाकर घंटों रगड़ती रहे और कई बाल्टी पानी उन्हें धोने में खर्च कर डाले! वह मंदिर नहीं जा सकती और अपने घर के भगवान के पास भी नहीं जा सकती। उसे बिल्कुल अलग-थलग बैठकर अपना भोजन करना होगा। अर्थात माहवारी उसे देवी के पद से गिराकर एक परित्यक्त, मनहूस व्यक्ति बना देती है।

तो मुझे अपने कुछ धार्मिक फेसबुक मित्रों से निवेदन करना पड़ा कि वे अपनी देवी के बारे में मेरी इन जिज्ञासाओं पर कुछ विस्तार से प्रकाश डालें: क्या देवी को माहवारी नहीं आती? वह इंसान की तरह ही लगती हैं तो क्या वे भी रजस्वला हैं? अगर हैं तो क्या वे भी अपवित्र होती हैं? क्या आपने किसी को यह कहते सुना है, "यह देवी का माहवारी का समय है इसलिए हम कुछ दिन उनकी उपासना नहीं करेंगे?"

मुझे एक धार्मिक व्यक्ति से बहुत गंभीर उत्तर प्राप्त हुआ, जिसमें उन्होंने समझाया: "माहवारी के वक़्त महिलाओं के शरीर से ऋणात्मक (नेगेटिव) विद्युत प्रवाह निसृत होता है इसलिए अगर एक स्त्री माहवारी के समय कपड़े या भोजन को छूएगी तो ये वस्तुएं भी ऋणात्मक (नेगेटिव) रूप से प्रभावित हो जाएंगे। इन परंपराओं का यही कारण है."

यह व्यक्ति इस बेहूदी बात पर पूरी ईमानदारी के साथ यकीन करता है। धर्म लोगों को इतना अंधा बना देता है कि वे उसमें प्रचारित अंधविश्वासों को सही सिद्ध करने के लिए ऐसे-ऐसे 'वैज्ञानिक' तर्क प्रस्तुत करते हैं कि आश्चर्य होता है। मैंने उनसे पूछा कि आपने माहवारी के दिनों में किसी महिला द्वारा निसृत विद्युत तरंगों का किस प्रयोगशाला में अवलोकन किया है और क्या उसकी तीव्रता को नापा भी है?

ऐसे बेवकूफी से भरे विश्वास ही देश में महिलाओं की बुरी हालत के लिए ज़िम्मेदार हैं और धर्म इन विश्वासों का आधार है। महिलाओं को माहवारी के समय अलग-थलग रखने की प्रथा सारे भारत में सामान्य रूप से विद्यमान है। शरीर के प्राकृतिक चक्र के कारण, जो उसे माँ बनने की शक्ति प्रदान करता है, कैसे कोई महिला अस्पृश्य हो सकती है? मैं यह प्रविष्टि मेरी एक महिला मित्र की इस बात से समाप्त करना चाहूँगा जिसमें उसने मुझसे कहा: ज़रा उन महानुभाव से पूछें कि क्या उन्हें उनकी माँ ने माहवारी के समय अपना दूध पिलाया था? अगर हाँ, तो वह स्वयं भी अस्पृश्य माना जाना चाहिए और उसे भी बहिष्कृत किया जाना चाहिए। लेकिन हम सब जानते हैं कि धर्म अपने ही नियमों और परंपराओं के बारे में एकरूप और एकनिष्ठ नहीं है।

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