जब मैं धार्मिक लोगों और उनके अंधविश्वासों के बारे में लिखता हूँ कि धर्म कैसे उनके बीच मूर्खतापूर्ण और भय पैदा करने वाले विचारों का प्रचार-प्रसार करता है तो अकसर मुझसे यह कहा जाता है कि "मैं धार्मिक तो हूँ मगर अन्धविश्वासी नहीं हूँ!" मुझे विश्वास है कि आपने भी इस तरह की बात सुनी होगी। मगर मैं समझता हूँ कि ऐसा संभव ही नहीं है। इसके बावजूद मैं उनके इस सोच को भी एक सकारात्मक बात मानता हूँ। मैं अपनी बात समझाकर कहता हूँ।
सबसे पहले यह कि मैं क्यों कहता हूँ कि आप धार्मिक होते हुए अंधविश्वासों से अलग नहीं रह सकते। यह थोड़ा सा "धार्मिक" की परिभाषा पर भी निर्भर करता है लेकिन अगर आप वास्तव में, यानी उसकी स्थापित परिभाषा के अनुसार धार्मिक हैं तो इसका मतलब है कि आप किसी संगठित धर्म के धर्मग्रंथों पर भरोसा करते हैं। और ये धर्मग्रंथ अंधविश्वासों से भरे पड़े हैं। अब तक तो मैंने कोई धर्म नहीं देखा जिसके धर्मग्रंथों में अंधविश्वास के तत्व नहीं हों। अगर आप किसी ऐसे धर्म को जानते हैं तो आप कृपया मुझे उसकी जानकारी दें। तब तक मैं आपसे यही कहूँगा कि धर्म सैकड़ों सालों से समाज में अंधविश्वास फैलाता रहा है और आप धर्म को अंधविश्वास से अलग करके देख ही नहीं सकते। फिर भी जब मैं यह प्रतिवाद सुनता हूँ कि "मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ मगर धर्म में विश्वास रखता हूँ!" तो मैं सोचता हूँ कि कम से कम इस व्यक्ति ने यह समझना शुरू कर दिया है कि अंधविश्वास एक बुरी चीज़ है। यह पहला कदम है। अगर किसी व्यक्ति के भीतर यह एहसास पैदा हो रहा है कि उसे अंधविश्वासी कहलाना पसंद नहीं है तो स्वाभाविक ही उसके भीतर यह भय पैदा हो गया है कि कहीं लोग यह तो नहीं समझते कि वह काली बिल्ली से डरता है या ऐसी ही किसी बेहूदी बात पर भरोसा करता है। वह ऐसे अंधविश्वासों के साथ अपने आपको सम्बद्ध नहीं करना चाहता मगर अभी धर्म के साथ बने रहने में उसे कोई दिक्कत नहीं है।
अधिकतर मामलों मुझे लगता है कि ऐसे लोग अभी धर्म को नकारने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। कभी-कभी इनमें अंदरूनी संघर्ष भी दिखाई पड़ता है जैसे वे सोचते हैं कि इतने साल जो चीज़ें उन्होंने सीखी और जानी क्या वे सही नहीं थीं। किसी ऐसे विचार को स्वीकार करना, जो बचपन से जाने, सीखे और आपकी रगों में बसे विचारों से इतना भिन्न हो, बहुत मुश्किल होता है और इसमें समय लगता है। लेकिन एक समय आएगा जब आप यह बात समझ जाएंगे कि सौभाग्य हेतु लकड़ी ठकठकाना या इसी काम के लिए धार्मिक कर्मकांड करते हुए नदियों में दूध विसर्जित करना सिवा मूर्खता के कुछ भी नहीं है।
लेकिन ऐसी हिचकिचाहट के पीछे अक्सर बाहरी दबाव भी काम करते हैं। मैं अगर धर्म-कर्म न मानूँ तो मेरा परिवार क्या कहेगा? मेरे बारे में लोग क्या बातें बनाएँगे? ये और ऐसे ही बहुत से सवाल लोगों के मन में पैदा हो जाते हैं और इसके बावजूद कि वे धार्मिक विचारों से सहमत नहीं होते फिर भी उनमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि उसके खिलाफ कुछ कह सकें। लेकिन अंधविश्वास इतने बेतुके और हास्यास्पद होते हैं कि उससे वे अब किसी तरह सम्बद्ध नहीं हो सकते।
मेरा विश्वास है कि भले ही किसी व्यक्ति के लिए अपने जीवन काल में पूर्ण रूप से धर्म छोडना संभव नहीं है मगर वह शुरुआत कर सकता है और अगली पीढ़ी उसे और आगे बढ़ा सकती है। यह हो सकता है और दरअसल यह हो भी रहा है। धर्म ने हजारों साल लोगों के दिमागों पर हुकूमत की है और उसके प्रभाव से मुक्ति किसी के लिए भी इतनी आसान नहीं है जब कि उसके चारों ओर का समाज आज भी धार्मिक ही है। लेकिन हम जानते हैं कि परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है और हम सकारात्मक और आशावान हो सकते हैं कि यह और तेज़ होगा और एक समय आएगा जब लोग यह कहने में झिझकेंगे नहीं कि "मैं न तो अंधविश्वासी हूँ न ही धार्मिक!"
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