हमारे स्कूल में गुरुओं की लोकप्रिय जादुई हाथ की सफाई का नरेंद्र नायक के प्रदर्शन द्वारा पर्दाफाश – 13 अगस्त 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज हमने अपने स्कूल में एक कार्यक्रम आयोजित किया। हालांकि वह तुलनात्मक रूप से कम समय में अचानक तय कर लिया गया था, उससे हमें बड़ी प्रत्याशाएँ थीं। नरेंद्र नायक, जो शायद भारत के सबसे जाने-माने तर्कवादी हैं, हमारे यहाँ आए और बच्चों के सामने अपनी प्रस्तुति दी!

सन 2009 में, जब हम न्यूयॉर्क में थे, अचानक एक दिन हमें नेट पर उनका एक शुरुआती वीडियो देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वीडियो में वे अपने विद्यार्थियों के साथ मिलकर झूठे गुरुओं द्वारा दिखाए जाने वाले करतब करके दिखा रहे थे और उनका भांडा फोड़ रहे थे कि कैसे वे तथाकथित चमत्कार गुरुओं की दैवी शक्तियों के कारण नहीं होते बल्कि वे महज जादू के खेल हैं। मैंने उनसे संपर्क किया और पिछले कुछ सालों से हम दोनों एक-दूसरे के कामों पर नज़र रखते आ रहे थे। कुछ हफ्ते पहले संपन्न नास्तिकों की मीटिंग के पश्चात हम पुनः उनके संपर्क में आए। उनका दिल्ली आने का कार्यक्रम था और उन्होंने हमारे स्कूल आने का प्रस्ताव रखा। मुझे लगा, यहाँ उनका स्वागत करना हमारे लिए बड़ी ख़ुशी की बात होगी!

तो, इस तरह वे आज सबेरे हमारे स्कूल के बच्चों के सामने लगातार तीन घंटे खड़े होकर विस्तार से बताते रहे कि क्यों उन्हें किसी बात पर विश्वास करने से पहले कई बार सोचना चाहिए, कोई बात समझ नहीं आ रही हो तो प्रश्न पूछना चाहिए और क्यों किसी सामान्य मनुष्य की कथित दैवी शक्ति पर विश्वास करके उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए, न ही उसके चरणों में लोटना चाहिए क्योंकि ऐसी दैवी शक्तियों का कोई अस्तित्व नहीं है और सारे मनुष्य बराबर और एक जैसे हैं।

उन्हें बच्चों के साथ देखना अद्भुत अनुभव था! बच्चे देखकर अचंभित रह गए जब नरेंद्र नायक ने एक मृत जादूगर और तथाकथित गुरु, सत्य सांई बाबा की तरह दिखावटी सोने का हार निकालकर सबके सामने रख दिया। सबके मुँह आश्चर्य से खुले के खुले रह गए जब पानी से भरे दिए को एक बच्चे ने जलाकर दिखाया। दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गए जब उन्होंने एक नुकीले त्रिशूल को अपनी जीभ से पीछे धकेला। उनके प्रदर्शनों के वीडियो देखकर वे रोमांच से भर उठे जब नंगे हाथों से एक व्यक्ति पर शल्यक्रिया करने वाला वीडियो उन्होंने दिखाया और तब भी जब खौलते तेल में नंगे हाथ डालकर वे पूड़ियाँ तल रहे थे!

कई बच्चों को और कुछ शिक्षिकाओं को भी उन्होंने सामने बुलाया और वे भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बने: उन्होंने बीच से कटी एक रस्सी पकड़ी और उसे इस तरह जोड़कर दिखा दिया जैसे वह कटी हुई न रही हो। उन्होंने ताश के पत्तों में से एक पत्ता चुना, जिसे नरेंद्र भाई ने सही-सही बता दिया, जैसे वे मस्तिष्क में चल रही बातों को पढ़ना जानते हों। बच्चों की बाँह पर उन्होंने जलती हुई सलाई रख दी और उनकी जीभ पर जलता हुआ कपूर रख दिया और उन्हें कुछ नहीं हुआ!

कहने की आवश्यकता नहीं कि सभी ने इस प्रदर्शन का आनंद लिया। लेकिन वह महज जादू का खेल नहीं था! हर हाथ की सफाई के बाद नरेंद्र नायक हमारे बच्चों को बताते थे कि यह कोई चमत्कार नहीं है, बताते थे कि यह कैसे होता है। इससे बहुतेरे ‘दैवी चमत्कार’ अचानक सामान्य हाथ की सफाई बनकर रह गए, जिन्हें तेज़ गति, सही सामग्रियों के चुनाव या भौतिकी के मूल सिद्धांतों के सहारे प्रदर्शित किया गया!

इस प्रदर्शन को देखकर हमारे बच्चों को न सिर्फ इन हाथ की सफाईयों से चमत्कृत होने का मौका मिला बल्कि वे यह सोचने के लिए मजबूर भी हुए कि धार्मिकों द्वारा बताई जाने वाली बहुत सी चमत्कारपूर्ण बातें क्या वास्तव में सच हैं। इससे उन्हें सच और झूठ का फर्क करने का तर्कपूर्ण रास्ता भी समझ में आया।

मेरा विश्वास है कि यह बच्चों को अपने दिमाग से सोचने की शिक्षा देने का हमारा एक और तरीका है, इस प्रदर्शन के बाद इस दिशा में हम एक कदम अवश्य आगे बढ़े हैं। कि वे आँख मूँद कर किसी पर न तो विश्वास करें और न ही उसका अनुसरण करें। कि उन्हें प्रश्न पूछने से नहीं झिझकना चाहिए और संतोषजनक उत्तर मिलने तक पूछते रहना चाहिए।

नरेंद्र नायक के प्रदर्शन के चित्र यहाँ देखें।