कल मैंने आपको बताया था कि कैसे हमें चेचक के चलते अपने दो कर्मचारियों से हाथ धोना पड़ा था। नहीं, वे मरे नहीं, सिर्फ हमें छोड़ कर चले गए क्योंकि वे अपनी दवाइयाँ नहीं खाना चाहते थे-और हम उनके कारण दूसरों को खतरे में नहीं डाल सकते थे। और हाँ, हमने उन्हें बता दिया कि अगर माह भर बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर वे आते भी हैं तो हम उन्हें वापस काम पर नहीं रखेंगे।
जब मैंने यह कथा सोशल मीडिया पर साझा की तो मुझे कई तरह की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, अधिकतर प्रतिक्रियाओं की मुझे आशा भी थी और उनमें से कुछ अज्ञान के चलते की गई थीं और कुछ नितांत अपमानजनक थीं। कुछ प्रतिक्रियाएँ हमारे कार्य के समर्थन में भी आई थीं।
दो बातें मुख्य रूप से सामने आईं, जिन पर लोग हमसे और हमारी कार्रवाई से सहमत नहीं थे। पहली बात तो यह थी कि क्यों हम बच्चों और अपने कर्मचारियों को डॉक्टर के पास ले गए। यह सामान्य बात है-भारत में धार्मिक और अंधविश्वासी लोग विश्वास करते हैं कि चेचक की बीमारी देवी के गुस्से की अभिव्यक्ति है और उसके दंड को आपको भुगतना ही होता है और उसे मनाने के लिए कर्मकांड और पूजा-अर्चना भी की ही जाती है। लोग मुझे सिखाने (पढ़ाने) की कोशिश कर रहे थे कि यह एक ऐसी बीमारी है जो बिना किसी डॉक्टर की मदद के ही ठीक हो जाती है और इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। उनका तर्क था कि हमारा डॉक्टर एक अंधविश्वासी व्यक्ति था, जो ऐसी दवाओं पर विश्वास कर रहा था, जिसका बीमारी पर कोई असर होने वाला नहीं था, इस तरह वह दरअसल हमें ठग रहा था।
जिन्होंने इस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त की, वे लोग शायद यह सोच रहे हैं कि मैं और मेरा परिवार और हमारे साथ पश्चिम में रहने वाले वे सब लोग, जो ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, बेवकूफ है। जी हाँ, डॉक्टर हमें मूर्ख बना रहा है और हम बेवकूफ़ों की तरह विश्वास कर रहे हैं कि वह हमारी सहायता कर सकता है। वे यहाँ तक कहते हैं कि आज के दिन इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। मेरा जवाब है: क्या आपने इस विषय को गहराई से जानने की कोशिश की है!
इसमें कोई शक नहीं कि शरीर को वेरिसेल जोस्टर (varicella-zoster) वाइरस, जिसे चेचक का वाइरस भी कहा जाता है, के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने भीतर रोग-प्रतिरोधकों (antibodies) का निर्माण करना पड़ता है। मैं भी जानता हूँ कि तीन दिन में सीधे चेचक ठीक करने की गोली या इंजेक्शन जैसी कोई चीज़ उपलब्ध नहीं है! लेकिन आप दवाइयों की सहायता से अपनी रोग-प्रतिरोधक शक्तियों (immune system) को मजबूत कर सकते हैं और बीमारी से होने वाली तकलीफ़ों पर राहत पहुंचा सकते हैं! वयस्क विषाणु रोधी (antiviral) दवाइयाँ ले सकते हैं और कई तरह के मरहम और ज़िंक युक्त पाउडर भी उपलब्ध हैं। तेज़ बुखार होने पर आप बुखार उतारने की दवा ले सकते हैं और दवाओं से बीमारी को फैलने से रोक भी सकते हैं। आप इस बारे में बहुत कुछ कर सकते हैं और इन्हीं दवाइयों के चलते हमारे बच्चे सात दिन में पूरी तरह ठीक हो गए जब कि बिना किसी इलाज के मरीज को ठीक होने में कई सप्ताह लग जाते हैं। इसके अलावा, बीमारी के कारण कमजोर हुए शरीर में दूसरी बीमारियों का आक्रमण भी हो सकता है, और आँखों और मस्तिष्क से संबन्धित कई दूसरी पेचीदगियाँ भी हो सकती हैं, जिन्हें रोकने के लिए डॉक्टर से इलाज करवाना ज़रूरी है। क्या आप डॉक्टर के पास न जाकर ऐसे खतरे उठाना पसंद करेंगे?
पर हाँ, लोग ऐसे खतरे उठाना पसंद करते हैं! हमारे दो भूतपूर्व कर्मचारियों का उदाहरण आपके सामने है, वे धोखे से भी दवाइयों पर विश्वास नहीं कर सकते मगर अंधविश्वास पर विश्वास कर सकते हैं। इसके बावजूद कि दवाइयों का सकारात्मक परिणाम उनके सामने है। अगर वे ठीक हो जाते हैं तो यह देवी की मेहरबानी होगी, घुसपैठिए वाइरस पर उनकी रोग-प्रतिरोधी शक्तियों की विजय नहीं! वे पूजा पाठ करेंगे, देवी को प्रसाद समर्पित करेंगे और हफ्तों तकलीफ सहन करेंगे लेकिन अपनी सोच में कोई परिवर्तन नहीं लाएँगे। (अपने मस्तिष्क के कपाट खोलकर उसकी सफाई नहीं करेंगे।) आशा ही की जा सकती है कि किसी दिन, संभव है, अगली पीढ़ी में ही, लोग ऐसा करेंगे।
लोगों के लिए दूसरा आपत्त्तिजनक बिन्दु यह था कि हमने अपने भूतपूर्व कर्मचारियों से कहा कि स्वस्थ हो जाने के बाद भी वे वापस नौकरी पर न आएँ। इस आपत्ति और इस मामले के साथ जुड़े दूसरे प्रश्नों के विषय में मैं कल लिखूंगा।
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