पिछले कई दिनों से मैं अपने मित्र गोविंद के साथ घटी सड़क दुर्घटना और उसके बाद अस्पताल में उसकी सर्जरी को लेकर लोगों के बेहूदा अंधविश्वासों की बात कर रहा हूं। मेरे कई पाठक यह पढ़कर हैरान हैं कि लोग वास्तव में इस बात में विश्वास रखते हैं कि गुरुवार को सर्जरी करवाने से दोबारा सर्जरी करवाने का खतरा बढ़ जाता है। खासकर पाश्चात्य देशों के मेरे पाठक, जहां लोग अपेक्षाकृत कम अंधविश्वासी हैं, प्रश्न करते हैं: "क्या लोग वास्तव में इन बातों में यकीन करते हैं?" तो मैंने सोचा डायरी के आज के पन्ने में इस प्रश्न का विश्लेषण करना उचित रहेगा।
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये लोग यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उनका अंधविश्वास कोरी बक़वास है। संभव है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों के छोटे गांवों में रहने वाले लोग इन अंधविश्वासों को सच मानते हों। लेकिन जो लोग आधुनिक दुनिया में रहते हैं, जो यह जानते हैं कि लाखों लोग इनमें विश्वास नहीं करते, मैं नहीं मानता कि उन्हें इस इस सच्चाई का ज्ञान नहीं है। तो फिर अंदर खाने अंधविश्वास को निराधार मानते हुए भी वे क्यों नहीं उसके अनुरूप व्यवहार करते? क्यों नहीं इस बारे में खुलकर बात करते?
जिस बात को लोग एक ज़माने से मानते आए हों उसमें विश्वास करना एक प्रकार का सामूहिक निर्णय होता है। हर कोई यह मानता है कि यह एक परम्परा है और एक मामूली सी बात है। इस पर कभी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया गया और अग़र किसी ने प्रश्न किया भी तो उसे यह कहकर चुप कर दिया कि 'इसमें शक़ की कोई गुंजाइश नहीं है हम तो इसी बात में विश्वास करते हैं।' लाखों लोग इस बात का प्रमाण दे सकते हैं कि अंधविश्वास में सच्चाई नहीं होती। लेकिन अग़र मात्र एक व्यक्ति यह कहानी सुना दे कि कैसे मंगलवार उसके लिए मंगलकारी रहा अथवा गुरुवार को किया गया काम दोबारा करना पड़ा तो अंधविश्वासियों को इससे बड़े प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।
अंधविश्वास का विरोध करने वाले को एक ही बात कहकर चुप करा दिया जाता है "ठीक है, आप अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन मैं इसमें विश्वास करता हूं।" वे जानते हैं कि आप सही हैं लेकिन इस बात को अपने मन में छुपाकर रखेंगें और बाहर कभी ज़ाहिर नहीं होने देंगें। उनके मन में भीतर कहीं यह आशंका रहती है कि अग़र उन्होंने इसे मानना बंद कर दिया और तत्पश्चात कुछ अनिष्ट हो गया तो! अधिकतर लोगों की नज़र में 'दुर्घटना से सावधानी भली होती है।' बिना सोचे समझे अंधविश्वास को मानते रहना एक आसान काम है। यह बात अवश्य है कि इस तरह के बेहूदा अंधविश्वासों को नकारने के लिए साहस की ज़रूरत होती है।
आप सोच रहे होंगें कि मैं गोविंद को अपना गहरा दोस्त कैसे कह सकता हूं, जबकि वह अंधविश्वासी है और मैं इसका घोर विरोधी। मैं उसके विचार और विश्वासों को जानता हूं और वह भी यह अच्छी तरह जानता है कि मैं किन बातों में विश्वास रखता हूं और किनमें नहीं। हम दोनों के बीच में यह बात बिल्कुल स्पष्ट है, लेकिन फिर भी हमारी दोस्ती बहुत गहरी है।
हम दोनों रेल की दो पटरियों की तरह हैं – हम दोनों साथ साथ चलते हैं और एक दूसरे के बगैर हमारा गुजारा नहीं है लेकिन फिर भी जरूरी नहीं कि हम दोनों के विचार एक जैसे हों। हम अनेकों बार एक दूसरे से अपनी बात नहीं मनवा पाते हैं लेकिन इसके बावजूद हम दोस्त हैं।
हम अपना स्नेह आपस में बांटते हैं, दिल की बात एक दूसरे को बताते हैं। हमने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा साथ साथ गुजारा है। बहुत कुछ बदल गया है लेकिन हमारी सोच और विश्वासों की वजह से आपसी प्रेम में कोई कमी नहीं आई और मुझे यकीन है कि ऐसा कभी होगा भी नहीं। हम दोनों के विचार और आस्थाएं अलग अलग हो सकती हैं परंतु हम हमेशा दोस्त बने रहेंगें।
अब मैं आगरा के लिए निकलने वाला हूं गोविंद को अस्पताल से घर वापिस लाने के लिए।
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