आप ईश्वर और धर्मग्रंथों पर किस हद तक विश्वास कर सकते हैं, इसका एक उदाहरण – 3 जुलाई 2013

अन्धविश्वास

कुछ दिन पहले मैंने धार्मिक अंधविश्वास के चलते होने वाले भयंकरतम परिणाम के बारे में एक खबर पढ़ी: एक परिवार के पाँच सदस्यों की मृत्यु के बारे में। अगर उनकी मृत्यु इतनी दुखद नहीं होती तो उन्हें मूर्खतापूर्ण कहा जा सकता था। लेकिन मैं पूरी गंभीरता के साथ कह सकता हूँ कि ये लोग धर्म द्वारा कत्ल किए गए हैं। इसके अलावा धर्म के कारण ही उस परिवार के तीन और लोग मरणासन्न पड़े हुए हैं।

राजस्थान का एक धार्मिक व्यक्ति, कंचन सिंह राजपूत, ईश्वर के प्रेम में बहुत आगे बढ़ गया। वह ईश्वर को देखना और उसका अनुभव करना चाहता था और उसे विश्वास था कि वह जहर भी खा ले तो ईश्वर उसे बचा लेगा। उसका यहाँ तक विचार था कि जहर खाने पर ईश्वर उसके पास आने पर मजबूर हो जाएगा और उसने अपनी माँ, भाई और पत्नी तक को इस बात पर विश्वास करने पर राज़ी कर लिया। और इस तरह वे चारों और उसके और उसके भाई के चार बच्चे उस घरेलू समारोह में शरीक हुए। समारोह के पश्चात उन सबने प्रसाद खाया। इस प्रसाद में ही घर के मुखिया ने जहर मिलाकर रखा था।

यह व्यक्ति खुद कैमेरामैन था और प्रसाद खाने तक के उत्सव-समारोह की और बाद में अपनी और परिवार के सभी सदस्यों की मृत्यु की भी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहा था। वे सभी, कुछ देर बाद बेहोश हो गए और उनमें से पाँच तो मृत्यु को प्राप्त हुए। उस व्यक्ति की भतीजी को सबेरे होश आया तो उसने इमरजेंसी कॉल करके डॉक्टरों आदि को बुलाया। उसे और परिवार के दो और सदस्यों को नाज़ुक हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया।

दुर्भाग्यवश मैं यह पता नहीं कर पाया कि आखिर वे तीनों बच पाए या नहीं। जब मैंने इस छोटे से समाचार को फेसबुक पर पोस्ट किया था, मेरे विदेशी मित्र भौंचक्के रह गए थे: कोई भी जहर क्यों खाएगा? कोई यह कैसे समझ सकता है कि जहर खाने से आप ईश्वर को देख सकते हैं? क्या यह किसी मतिभ्रम के चलते होता है? नहीं, तो फिर क्या कारण है? और फिर जहर खाना ही है तो खुद खा लो, पूरे परिवार को क्यों खिलाते हो?

इस व्यक्ति के इस जघन्य कर्म का कारण धर्म और धर्म के परिणामस्वरूप मन में बैठे अंधविश्वास में निहित है। हिन्दू धर्मग्रंथों में शिव के विषपान और उस पर विष का कोई असर न होने का ज़िक्र आता है। इसके अलावा कई कथाएँ हैं जिनमें लोगों को, उनकी पवित्रता और उनकी ईशभक्ति के कारण किसी न किसी भगवान द्वारा मृत्यु के मुख से छुड़ा लिया गया।

इसलिए इस समाचार को पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। गाहे बगाहे ऐसी घटनाएँ भारत में, जहां धार्मिक विश्वास और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं, होती ही रहती हैं। यहाँ लोगों का धर्मग्रन्थों में और ईश्वर में अगाध विश्वास है। उन्हें भरोसा होता है कि जब वे संकट में होंगे तब शिव आएंगे और उन्हें बचा लेंगे, जैसा कि धर्मग्रंथों में उन्हें बहुत से लोगों की सहायता करते हुए दर्शाया गया है।

उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास होता है और धर्म उन्हें यही सिखाता है: अगर आपका ईश्वर पर अटूट, पागलपन की हद तक भरोसा है तो वह आपकी रक्षा करता है। अगर आप चाहें तो इसे इस बात का प्रमाण भी मान सकते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है। धार्मिक लोग तर्क करेंगे कि उन अभागों का ईश्वर पर पर्याप्त अटूट भरोसा नहीं था अन्यथा शिव, कृपा करके, उन्हें बचा लेते। उन्होंने इतना भरोसा किया था कि ईश्वर से मिलने की आशा में अपनी और अपने परिवार की जान तक दांव पर लगा ली थी। इससे ज़्यादा आखिर कितना विश्वास कोई कर सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें सारे घटनाक्रम की वीडियो फिल्म नहीं बनानी चाहिए थी क्योंकि ईश्वर नहीं चाहता कि उसकी कोई फिल्म बने?

मैं तो सिर्फ एक सच्चाई जानता हूँ: धर्म ने उस परिवार की जान ली थी। यह बहुत दर्दनाक है और मेरे लिए तो यह एक और इशारा या प्रमाण है कि लोगों को कम से कम धार्मिक और अंधविश्वासी होना चाहिए!

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