पिछले सप्ताह मैंने कार्यक्षेत्र में होने वाली प्रतिस्पर्धा के बारे में लिखा था, जिसकी अधिकता लोगों को मानसिक रूप से तोड़ देती है और उनका मानसिक और शारीरिक क्षरण होने लगता है। अंततः वे गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ कार्यक्षेत्र में ही देखने को मिलती हो, ऐसा नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में यह सामान्य रूप से मौजूद होती है और अगर आप लगातार दबाव में जीवन बिताना चाहते हैं तो कहीं भी उससे साबका पड़ सकता है! यह काफी हद तक आप पर निर्भर हैं: आप दूसरों के साथ कितनी स्पर्धा करना चाहते हैं या कितनी हद तक किसी के साथ अपनी तुलना करना चाहते हैं? इसके विपरीत, आप खुद अपने आप पर कितनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा खर्च करना चाहते हैं?
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आज समाज में बड़ी संख्या में लोग तनावग्रस्त पाए जाते हैं क्योंकि समाज में आपसी प्रतिस्पर्धा बहुत सामान्य और आम बात हो गई है। प्रतिस्पर्धा करना है इसलिए दूसरों से अपनी तुलना करना भी सहज-स्वाभाविक है क्योंकि तभी तो आप जान पाएंगे कि कहीं दूसरे आपसे बेहतर तो नहीं कर रहे हैं! अगर आपसे खराब कर रहे हैं तो वह भी अपनी तात्कालिक खुशी के लिए ज़रूरी है। लोग अपने सहकर्मियों के साथ ही प्रतिस्पर्धा नहीं करते, वे अपने बचपन के सहपाठियों के साथ भी यह तुलना करते हैं कि उन्होंने कितनी तरक्की ही है, और उनकी खुद की तरक्की से वे कितना आगे या पीछे हैं! किसी जिम में ट्रेडमिल पर वे कितना तेज़ दौड़ते हैं और उनके मित्र कितना! खुद वे कितना कमा रहे हैं, इसके अलावा वे यह भी देखते हैं कि उनकी पत्नी कितना कमा रही है और फिर उससे अपने पड़ोसी परिवार की कमाई से तुलना करते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी सुंदरता की तुलना किसी अजनबी से भी करने लगते हैं! अपने अवकाश के समय में वे क्या पढ़ रहे हैं, इसकी तुलना वे लोगों द्वारा पूल पर, सी-बीच पर या मेट्रो में पढ़ी जा रही किताबों से करते हैं। क्या मैं अधिक बुद्धिमान हूँ? क्या मैं ज़्यादा सफल हूँ? क्या मैं ज़्यादा सुंदर हूँ? क्या मैं ज़्यादा तेज़, ऊंचा या अच्छा हूँ?
अगर इन सभी सवालों के जवाब ‘हाँ’ में हों, तभी वे संतुष्ट होते हैं। अगर आपमें यह प्रवृत्ति है तो आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ। आप हर वक्त तुलना करते रहते हैं, बार-बार अपनी तरफ देखते हैं और फिर किसी दूसरे की तरफ और अगर आप जीत रहे हैं तो इस तुलना का आप पर सकारात्मक असर होता है अन्यथा आप निराश हो जाते हैं।
समस्या यह है कि ऐसा करके आपका ध्यान पूरी तरह दूसरों पर केन्द्रित हो जाता है और आप इन्हीं तुलनाओं के जरिये अपनी पहचान सुनिश्चित करने लगते हैं। आप कौन हैं? मैं दौड़ में जैक से तेज़ हूँ, मैं काम में जैस्मिन से ज़्यादा सफल हूँ, मैं अपने पड़ोसी, मिलर्स से बेहतर अभिभावक हूँ! सब कुछ बाहर है, दूसरे प्रगति में कितना आगे हैं और आप कहाँ है। आप अपने आंतरिक मूल्य, अपनी आंतरिक शक्तियों, अपनी आंतरिक सुंदरता से सम्बद्ध नहीं रह पाते और अंततः अपना महत्व कम कर लेते हैं। यहाँ तक कि आपके ये गुण आपकी जानकारी में ही नहीं रहते क्योंकि आप तो अपना ध्यान दूसरों पर (बाहरी बातों पर) केन्द्रित किए हुए हैं।
आप हमेशा जीत नहीं सकते और स्वाभाविक ही बार-बार हारना तनाव पैदा करता है! पूर्णतावादी और खुद से बहुत ज़्यादा अपेक्षा रखने वाले, हार को और भी ज़्यादा दिल पर ले लेते हैं, जो उन पर और भी ज़्यादा शारीरिक और मानसिक दबाव पैदा करने का कारण बनता है। वैसे ही आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी द्वारा निर्मित दबाव कोई कम नहीं हैं। इसलिए कम हाई-प्रोफ़ाइल नौकरी वाले लोग या जो लोग नौकरी नहीं करते या कोई काम भी नहीं करते, वे भी शारीरिक और मानसिक क्षय (breakout) से पीड़ित रहते हैं।
आप जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही महत्वपूर्ण हैं, इस बात को आपको समझना होगा। अपनी सीमाओं के कारण अपने आपको कम आंकने की आदत छोड़कर, अपनी कीमत पहचानना सीखना सीखिए। यह आवश्यक नहीं है कि हमेशा आप सर्वोत्तम या नंबर वन ही हों-सच तो यह है कि आप हो ही नहीं सकते! कोई भी नहीं हो सकता! इस बात को स्वीकार कीजिए कि आप अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं और आपकी प्रतिभा हर वक़्त, हर क्षेत्र में सर्वोत्तम नहीं हो सकती।
अगर आप अपनी यह आदत बदलना चाहते हैं तो प्रतिदिन कम से कम थोड़े समय के लिए ध्यान लगाने की कोशिश अवश्य कीजिए या अपने आप को याद दिलाते रहिए कि किसी के साथ अपनी तुलना करने की आपको आवश्यकता नहीं है। जब भी आप निराश या दुखी हों, उसका कारण जानने की कोशिश कीजिए-कहीं यह इसलिए तो नहीं है कि आप किसी से अपने आपको कमतर महसूस कर रहे हैं? फिर इस एहसास से मुक्त होने का प्रयत्न कीजिए, अपने आपको समझाइए कि आप दोनों ही मनुष्य हैं इसलिए दोनों का एक ही महत्व है, सिर्फ इतना ही कि उसके पास दूसरी विशेषताएँ हैं।
दूसरों से अपनी तुलना करना छोड़ें और खुश रहें!
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