हम बिना किसी तनाव, परेशानी या शिकायत के व्यस्त रहने का मज़ा ले रहे हैं! 19 जनवरी 2015

तनाव

पिछले दिनों हम बहुत काम करते रहे हैं। और पिछले दिनों से मेरा मतलब है पिछले दो महीनों से। बहुत से कार्यक्रम, घटनाएँ और बहुत से लोगों से मिलना-जुलना, हमारे नियमित कामों के अतिरिक्त ये सब व्यस्तताएँ रहीं और आज मैं सोच रहा हूँ कि दरअसल यह कितना अच्छा रहा। मैं थकान महसूस कर सकता था, तनावग्रस्त हो सकता था या शिकायत कर सकता था- मगर क्या वास्तव में यही जीवन नहीं है? हर समय सक्रिय रहना, तरोताज़ा और जीवन से भरपूर!

आश्रम में आयोजित सामान्य विश्रांति-शिविरों के साथ हमारी व्यस्तता की शुरुआत हुई। यह कोई अनहोनी बात नहीं थी। मित्रगण आते रहे और हर पल को उनके सान्निध्य की प्रसन्नचित्त सक्रियता से भरते हुए हम थोड़ा व्यस्त हो गए। फिर कई दिनों बाद मोनिका स्कूल आई।

स्वाभाविक ही, उसके पश्चात हम कुछ ज़्यादा ही व्यस्त हो गए क्योंकि हमें उसके इलाज के सम्बन्ध में कई तरह की जानकारियाँ लेनी थी, हर चीज़ के सम्बन्ध में कागज़ी कायवाहियों को अंजाम देना था, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उसके बारे में बताना था, उसका प्रचार करना था, जिससे जल्द से जल्द हम पूरी क्षमता के साथ उसकी सहायता कर सकें।

इस काम में हमें सफलता प्राप्त हुई और शल्य-चिकित्सा हेतु डॉक्टर के साथ मिलने का समय निश्चित किया गया। इसी बीच हमने एक छोटी सी अमृतसर की यात्रा भी संपन्न की। वास्तव में हम वहाँ छुट्टियाँ मनाने गए थे-लेकिन वह भी तो दैनिक कार्यों के अतिरिक्त काम था।

अमृतसर से लौटते हुए हम मोनिका से मिले, वहाँ हमें अपने कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा और हम दिल्ली में ही रुक गए। फिर तुरंत ही रमोना के पिताजी को विमान-तल लेने गए। एक और शानदार समय की शुरुआत हुई लेकिन रेस्तराँ के काम की तेज़ प्रगति और आश्रम में मेहमानों की उपस्थिति के चलते हम लगातार व्यस्त बने रहे।

उन्हें बिदा करने के बाद और एक दिन और दिल्ली में रहने के बाद हम वापस आए-लेकिन फिर दो दिन बाद पुनः हमें वहाँ जाना पड़ा: पूर्णेन्दु के पेट में दर्द था और बाद में पता चला कि उसका पुच्छ (appendix) बढ़ा हुआ है! तो हमें तुरंत ही यानी गुरुवार की शाम आपात-शल्यक्रिया के लिए वहाँ जाना पड़ा।

और शुक्रवार की रात हम फिर वापस आ गए। हम थके हुए थे और हमारे साथ पूर्णेन्दु था, जो एक अंग खो चुका था और पेट में तीन छेद लिए वापस लौटा था! लेकिन सब कुछ भली प्रकार से हो सम्पन्न हो गया और हमें खुशी है कि तुरत-फुरत शल्यक्रिया का निर्णय लेकर हमने अच्छा किया।

दो दिनों तक पिछले कुछ दिनों के लंबित कामों को निपटाने के बाद अब हम अपने ऑफिस में बैठे हैं। और मुझे कहना चाहिए कि जिस तरह से चीज़ें घटित हो रही हैं, उससे हम खुश हैं। स्वाभाविक ही, एक तरफ तो हम बेतरह व्यस्त हैं, कामों के बोझ तले पिस रहे हैं और कई काम रोज़ ही छूट जाते हैं-लेकिन दूसरी तरफ इस बात की खुशी भी है कि इसी बीच अनगिनत कार्य सम्पन्न हुए, पूरे करवाए गए। ठंड और स्वास्थ्य-लाभ के दौरान होने वाले दर्द के अलावा हम सब स्वस्थ हैं। और अभी भी हमें बहुत से काम निपटाने हैं, हम लगातार सक्रिय हैं, चीज़ें सामने आती हैं और उन्हें पूरा किया जाता है। हर चीज़ आगे बढ़ रही है!

इससे बढ़िया क्या बात हो सकती है!

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