महिलाएं प्रेम करती हैं मगर पुरुष सिर्फ कामुक होते हैं! नारीवादी किस तरह लिंगभेद के खिलाफ काम करती हैं-13 फरवरी 2014

समाज

हिन्दू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं आठ गुना ज़्यादा कामुक होती है। स्वाभाविक ही मैं इस कथन को धर्म द्वारा महिलाओं को काबू में रखने और पुरुषों को उनसे पवित्र साबित करने और सेक्स को एक बुरी चीज़ के रूप में पेश करने की अनुचित चेष्टा करार देते हुए निरस्त कर दुंगा। इसके विपरीत हाल ही में मैंने नारीवादियों के बीच लोकप्रिय एक जुमला पढ़ा: पुरुष सिर्फ सेक्स के लिए महिलाओं से प्रेम करते हैं जबकि महिलाएं प्रेम के चलते पुरुष के साथ सेक्स के लिए तैयार होती हैं। मुझे लगता है कि यह कथन भी उपरोक्त धार्मिक कथन जितना ही अनुचित है! क्यों? यही बताने के लिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

आखिर नारीवादी क्या चाहते हैं? जहाँ तक मैंने समझा है वे न सिर्फ पितृसत्ता से और इस तरह पुरुषसत्ता से और पुरुषों द्वारा महिलाओं के दमन से मुक्ति चाहती हैं बल्कि वे अंततः “लैंगिक समानता” चाहती हैं। लक्ष्य मातृसत्ता की स्थापना नहीं है और न ही महिलाओं द्वारा पुरुषों का दमन ही लक्ष्य है। लक्ष्य है दोनों की, यानी पुरुषों और महिलाओं की बराबरी। अगर आप यह लक्ष्य पाना चाहती हैं तो आपको पुरुषों को नीचा दिखाने की ज़रूरत नहीं है, जैसा कि उक्त कथन से ज़ाहिर हो रहा है।

पुरुष सिर्फ सेक्स के लिए ही महिलाओं से प्रेम करते हैं, यह मान लेने पर स्पष्ट ही आप यह भी मान लेती हैं कि पुरुषों में सिर्फ यौन लिप्सा पाई जाती है, प्रेम नहीं, जब कि महिलाएं प्रेमपूर्ण होती हैं और सिर्फ प्रेम के नैसर्गिक इज़हार के लिए सेक्स के लिए तैयार होती हैं। अगर पुरुषों के साथ हुए अपने नकारात्मक अनुभवों के चलते आप सभी पुरुषों को इस तरह वर्गीकृत कर देंगी तो आप सभी पुरुषों को पूरी तरह नकार देंगी। इससे यह होगा कि सारे पुरुषों पर से आपका विश्वास उठ जाएगा क्योंकि कौन होगा जो ऐसे पुरुष को पसंद करे जिसमें सिर्फ लिप्सा हो, प्रेम न हो। आप किसी पुरुष को चुन तो लेंगी मगर उस पर विश्वास नहीं कर पाएँगी क्योंकि आप उपरोक्त कथन से पूर्णतः प्रभावित हैं।

पुरुषों के पास सिर्फ शरीर ही नहीं, भावनाएँ भी होती हैं! आप पुरुषों के साथ वैसा ही व्यवहार कर रही हैं, जिसका आरोप आप उन पर लगा रही हैं यानी अपने से विपरीत-लिंगी व्यक्ति को सिर्फ शरीर की हद तक सीमित कर देना। लेकिन ऐसा पक्षपात क्यों?

मैंने ऐसी महिलाएं भी देखी हैं जिन्हें सिर्फ सेक्स में रुचि होती है। उसी तरह मैंने ऐसे पुरुष भी देखे हैं जो उससे उकता गए हैं और सिर्फ प्रेम के भूखे हैं। पुरुष और महिलाएं, दोनों ही मनुष्य हैं, उनमें लिंगभेद हो सकता है लेकिन हर एक का व्यक्तित्व अलग है, हर एक मनुष्य के चरित्र, विचार और व्यवहार में बहुत अंतर पाया जाता है!

पुरुष और महिलाओं के बीच जैविक भेद बहुत ही कम है और उनके डीएनए में बहुत, बहुत ही कम अंतर पाया जाता है। उस मामूली अंतर की तुलना में समाज द्वारा लादे गए नियमों के चलते उनके बीच कई गुना भेद पैदा हो गया है। ऐसे कथनों और नियम-कायदों के कारण ही पुरुष और महिलाओं के मन में एक दूसरे के खिलाफ ऐसी धारणाएँ घर कर लेती हैं। पुरुषों को सख्त होना चाहिए, महिलाओं को सौम्य और मृदुल; पुरुष कहीं भी आ-जा सकते हैं लेकिन महिलाएं नहीं जा सकतीं-महिलाओं को पुरुषों से अलग मानते हुए समाज ने ही ऐसी सीमाएं खड़ी कर दी हैं और उनके अलग-अलग स्तर नियत कर दिये हैं।

लेकिन मैं ऐसी कई महिलाओं से मिला हूँ जो इस ढांचे को तोड़ती नज़र आती हैं और अपनी संवेदनाओं, विचारों और अपने तौर-तरीकों में पूरी तरह अलग हैं। यही बात पुरुषों पर भी लागू होती है। जब तक आप इस तरह सोचेंगे आप कभी भी लैंगिक समानता का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। पुरुष मानव समाज का आधा हिस्सा हैं और उन्हें नीचा दिखाकर, उनके विषय में अनर्गल प्रचार करके आप उनसे अपने प्रति सम्मानजनक रवैये की उम्मीद नहीं कर सकते। आपको हर एक व्यक्ति का अलग-अलग मूल्यांकन करना होगा और लिंग संबंधी घिसी-पिटी धारणाओं से बचना होगा। आपको यह समझना होगा कि हर व्यक्ति की एक अलग इयत्ता है, चाहे वह पुरुष हो या महिला, और हर एक अपनी अपूर्वता में महत्वपूर्ण और सुंदर है और इसलिए आपके आसपास के सभी लोग एक समान और एक जैसे महत्वपूर्ण हैं।

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