क्या लैंगिक समानता के लिए पुरुषों को आंदोलन चलाना होगा? – 27 फरवरी 13

जब कोई अपेक्षाओं, प्रेमसंबंधों, सेक्स और इन सबसे बढ़कर नैतिक मानदंडों की बात करता है तो एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है कि लोग इस मामले में दोहरे मानदंड रखते हैं – पुरुषों के लिए अलग और और स्त्रियों के लिए अलग। इन वाक्यों को पढ़ते ही आप क़यास लगाने लगे होंगें कि मैं आगे क्या कहने वाला हूं। जी नहीं, मैं यहां महिला – अधिकारों की वकालत नहीं करने जा रहा हूं बल्कि आज मैं पुरुषों के अधिकारों की बात करूंगा। मुझे ऐसा लगता है कि पुरुषों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला भी कोई होना चाहिए क्योंकि लिंगभेद के पारंपरिक पूर्वाग्रह अब खत्म चुके हैं और अब इस पर नए सिरे से विचार करने की ज़रूरत है।

मैं मानता हूं कि महिलाओं की एक आम शिकायत होती है और कई लोकप्रिय गीतों में भी इसका इज़हार किया गया हैः यदि एक पुरुष की एक समय में कई महिलामित्र होती हैं या फिर एकसाथ कई महिलाओं से उसके यौन संबंध हैं, तो उसे असली मायने में पुरुष माना जाता है। अन्य पुरुष उसकी तारीफ करते हैं, उसकी इज्ज़त करते हैं और उसके दरवाजे पर स्त्रियों की कतार लगी रहती है। उसके जैसा बनने की तरक़ीबें बताने वाली किताबे छपती हैं। उसके मित्र उससे इस बारे में सलाह लेते हैं और यहां तक कि जिन लोगों से उसका परिचय भी नहीं है, वे भी इन मामलों में उसे अपना आदर्श मानते हैं और वह पुरुष भी इस बात में एक अजीब सा फ़ख्र महसूस करता है कि वह हजारों औरतों के साथ यौन संबंध रखता है और जब चाहे तब किसी भी मनचाही लड़की के साथ हमबिस्तर हो सकता है। वह असली मर्द है।

और अग़र एक औरत यही सब करे तो? यदि वह कई पुरुषों के साथ सेक्स संबंध रखती है, चाहे वह उनमें से किसी को भी धोखा नहीं दे रही हो क्योंकि उसने सबको साफ – साफ बता दिया है कि वह उनमें से किसी से भी प्रेम नहीं करती है, तो भी उसे चरित्रहीन माना जाएगा। कई पुरुषों से यौन संबंध रखने वाली औरत पर वेश्या या इससे मिलता – जुलता कोई भी लेबल चस्पां करने में जरा भी देरी नहीं लगती। बाजार में ऐसी किताबें मिलती हैं कि अग़र आप पर ऐसा लेबल लगा हुआ है तो इससे पीछा कैसे छुड़ाएं या क्या करें कि आप ‘इन औरतों‘ जैसी दिखाई न दें। दूसरी औरतें मन ही मन में चाहती होगीं कि काश, उनकी ज़िंदगी में भी कई पुरुष होते लेकिन वे इस ख्वाहिश को कभी ज़ाहिर नहीं होने देंगीं और यह दिखाएंगी कि वे उस औरत से घृणा करती हैं। पुरुष भी उस महिला की तरफ आकर्षित होते हैं लेकिन वे उसे गंभीरता से नहीं लेते। उनके मन उस महिला के लिए कोई इज्ज़त नहीं होती और न ही वे उसके साथ किसी तरह कोई रिश्ता बनाना चाहते हैं।

जैसाकि मैं पहले भी कह चुका हूं कि यह कोई नई बात नहीं है। लोग इस बारे में चर्चा करने लगे हैं, कुछेक पुरुषों का रवैया अपने बीच में मौज़ूद ‘कामपुरुषों’ के प्रति बदला है और महिलाओं की सोच भी अब पहले की तुलना में खुली है और वे अपनी यौन इच्छाओं की तरफ तवज्जो देने लगी हैं। बहुत सारी महिलाएं हैं जो समाज की परवाह नहीं करती और शायद अब समाज ने भी अब इन्हें नाम धरना बंद कर दिया है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि पासा पलट गया है। अब पुरुषों पर भी लांछन लगने लगे हैं जबकि पहले महिलाओं के मामले में ही ऐसा होता था।

हां, मैं यह साफ तौर पर कह रहा हूं कि न केवल महिलाओं के मामले में दोहरे मानदंड रखना ग़लत है बल्कि पुरुषों के बारे में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। समानता का अर्थ यह नहीं है कि आप महिलाओं को तो पूरी छूट दें और पुरुषों पर बंदिशें लगाएं, आरोप लगाएं और उनकी आलोचना करें।

विशेषकर पाश्चात्य देशों में महिलाओं को उनकी पारंपरिक भूमिका से बाहर निकालने के लिए बड़े – बड़े कदम उठाए गए हैं। महिलाएं राजनीति और अर्थव्यवस्था में बड़े ओहदों पर काम कर रही हैं। अब यह एक आम बात हो गई है कि वे मां बनने से पहले पढ़ाई करती हैं और काम पर जाती हैं और बच्चे को जन्म देने के कुछ साल बाद पुनः काम पर लौट आती हैं। बच्चों की देखभाल करने के लिए पिता भी ऑफिस से छुट्टी लेने लगे हैं और पति घरेलू कामों में पत्नी का हाथ बंटाते हैं। महिलाएं आत्मनिर्भर व सशक्त हो गई हैं और वे इस बात को बखूबी जानती हैं। भारत जैसे देशों में इस दिशा में अभी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है। पश्चिम में भी अभी सुधार की बहुत गुंजाइश है। महिलाओं को अब भी पुरुषों के बराबर वेतन नहीं मिलता है। बच्चे छोटे होने पर उनके काम पर जाने की बात को अभी मजबूती से समर्थन नहीं मिला है।

लेकिन – हां, यह बहुत बड़ा लेकिन है कि समानता की बात करते वक़्त यह नहीं भूलना चाहिए कि समानता का अर्थ दोहरे मानदंड कदापि नहीं है। यदि आपने अब महिलाओं की आलोचना करना बंद कर दिया है तो पुरुषों की आलोचना करना भी बंद करना होगा। तभी आप लैंगिक समानता के लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं।

क्या लैंगिक समानता के लिए पुरुषों को आंदोलन चलाना होगा?

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