तब तक लड़कियां पैदा करते रहना जब तक एक लड़का नहीं हो जाता – 9 अप्रैल 2014

समाज

कुछ दिनों से मैंने अपने स्कूल के बच्चों के घरों में होने वाले अनुभवों के बारे में बताना शुरू किया है। सोमवार को मैंने आपको बताया था कि कितने ही लोग मंदिरों और आश्रमों में भजन-कीर्तन और दूसरे कर्मकांड करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं। कल मैंने बताया था कि कैसे टीवी आजकल ग़रीबों के घरों में भी एक आवश्यकता बन गया है। आज मैं एक ऐसी बात लिखना चाहता हूँ, जिसे हमारे साथ बच्चों के घर गई एक विदेशी महिला ने भी नोटिस किया था: हमारे बच्चों के घरों में लड़कियों की संख्या बहुत अधिक है!

जब आप उन इलाकों में जाते हैं, जहाँ हमारे स्कूल के गरीब बच्चे रहते हैं तो वहां आपको बड़ी संख्या में महिलाएं देखने को मिलेंगी: बाहरी दरवाज़ों पर बैठीं, गलियों में इधर-उधर आती-जातीं और छतों से आपको एक नज़र देखती हुईं। अधेड़ महिलाएं, गोद में बच्चे को लिए माँएं, अपने हाथों में कढ़ाई-बुनाई का सामान लिए स्वेटर वगैरह बुनतीं किशोरवय लड़कियां, और छोटी-छोटी बच्चियां इधर-उधर दौड़ती-भागतीं। और इस भीड़-भाड़ में एकाध लड़का। निश्चित ही अल्पसंख्यक! क्यों और कैसे?

इसके कई कारण हैं। सबसे पहला और स्वतःस्पष्ट कारण यह कि पुरुष काम पर बाहर गए होते हैं और महिलाएं साफ़-सफाई, बरतन और कपड़े धोना और बच्चों की देखभाल जैसे घर के काम निपटाती हैं। लेकिन दूसरा कारण इतना सहज और स्पष्ट नहीं है।

लड़कों की तुलना में लड़कियां बहुत कम संख्या में स्कूल जाती हैं। यह एक सचाई है। बहुत से गरीब परिवार लड़कियों की पढ़ाई को उतना ज़रूरी नहीं समझते। वास्तव में, उनके लिए जो काम सीखना ज़रूरी माना जाता है वह है घर चलाना और बच्चे पालना। और ये दोनों काम वे स्कूल में नहीं सीख सकतीं। यह सब सीखने के लिए उनका घर पर रहना ज़रूरी है। ये काम वे खुद करते-करते सीखती हैं। इस तरह जब ज़्यादातर लड़के स्कूलों में पढ़ रहे होते हैं, उनकी बड़ी या छोटी बहनें घर के कामों में अपनी माँओं की मदद कर रही होती हैं। माँ को एक सहयोगी मिल जाता है और खेल-खेल में लड़कियां काम सीखती रहती हैं। माँ-बाप, दोनों, इसे लड़कियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक मानते हैं।

लेकिन फिर भी, जब आप किसी घर में जाकर पूछते हैं कि उनके परिवार में कितने लड़के और लड़कियां हैं तो अक्सर वे आपको बताएँगे कि उनके यहाँ चार लड़कियां और दो लड़के या तीन लड़कियां और एक लड़का है। यहाँ तक कि पाँच तो लड़कियां हैं और लड़का एक भी नहीं।

परिवार आज भी एक लड़के की आशा में एक के बाद एक लड़कियां पैदा करते चले जाते हैं। लड़का इसलिए कि पारिवारिक व्यवसाय को कोई वारिस मिल सके, परिवार के नाम को आगे बढ़ाने वाला कोई मौजूद हो। कम से कम एक बेटा, जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करे। कम से कम एक लड़का, जो अपनी बहनों की तरह शादी के बाद दूसरों का घर बसाने के लिए अपना घर छोड़कर न चला जाए।

वे इतने पढे-लिखे नहीं हैं कि समझ सकें कि छः या आठ बच्चे होने पर उनकी आर्थिक मुसीबतें और बढ़ जाएंगी। कि पहले ही उनके पास अपनी चार लड़कियों का लालन-पालन करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं। कि अपनी चार लड़कियों के विवाह का खर्च उठाना भी उनके लिए बहुत मुश्किल होगा और हो सकता है कि सिर्फ थोडा-बहुत दहेज़ देने और शादियों पर होने वाले दूसरे खर्चों के लिए उन्हें अपना सब कुछ बेचना पड़े।

अगर पहले दो बच्चे लड़के हैं तो इस बात की संभावना हो सकती है कि वे इतने बच्चों से संतुष्ट हो जाएं। उनका सारा ध्यान एक लड़का पैदा करने पर केन्द्रित रहता है।

यह ऐसा रवैया है, जो उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए गरीबी के चंगुल में जकड़े रखेगा। उन्हें भी और उनके बच्चों को भी।

इस स्थिति को बदलने की दिशा में हम उनकी मदद करना चाहते हैं। उनके लड़कों और लड़कियों को शिक्षा प्रदान करके हम उनकी सहायता करने की कोशिश करते हैं। शायद अगली पीढ़ी इस बात को समझ सके।

%d bloggers like this:
Skip to toolbar