जनतंत्र का अतिरेक – 20 मई 2014

मुझे विश्वास है कि हम सब इस बात पर सहमत होंगे कि वर्तमान समय में जनतंत्र सबसे अच्छी राज्य-व्यवस्था है। लोगों के पास अपनी बात कहने का अधिकार होता है और जिस बात को लोग बहुमत से स्वीकार कर लेते हैं, उसे सब मान लेते हैं। दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र, भारत के चुनावों पर मैं बाद में कभी लिखना चाहूंगा मगर आज मैं जनतंत्र के एक दूसरे पहलू पर अपने विचार आपके सामने रखूँगा: इस एहसास पर कि कभी-कभी जनतंत्र का अतिरेक हो जाना भी संभव है!

जी हाँ, यह मैं पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ-हालाँकि, मुझे हँसी आती है खुद अपने जनतंत्र पर, मेरी प्रिय पत्नी के जनतंत्र पर, जब सारे उपस्थित लोगों के नज़रिए जानने के चक्कर में बहुत मज़ेदार स्थितियां पैदा हो जाती हैं, चाहे मामला बहुत मामूली सा ही क्यों न हो। हम इस रेस्तराँ में जाएँ या उसमें? मैं उसमें जाना चाहूंगी, और आप? चलो, इससे भी पूछ लेते हैं, और उससे भी, और हाँ, उन बीस लोगों से भी, जो साथ आने का कार्यक्रम बना रहे हैं! आप कल्पना कर सकते हैं कि निर्णय लेने की यह प्रक्रिया कितनी लम्बी चल सकती है!

हमारे मित्र, थॉमस को अपने स्कूल में अक्सर ऐसी ही स्थितियों का अनुभव होता रहा है और उन्होंने एक बार मुझसे कहा कि अपने जीवन में मैं इतना ज़्यादा जनतंत्र कतई नहीं चाहता। एक उदाहरण देता हूँ: एक कमरे में 16 लोग बैठे हैं और उनका मुख्य काम यह तय करना है कि ऑफिस में आईं नमूने की कुछ कुर्सियों में से उनके लिए कौन सी नई कुर्सी ठीक रहेगी।

थॉमस के स्कूल में कुछ मीटिंग्स होती हैं, जिसमें उन्हें शामिल होना होता है और यह भी ऐसी ही एक मीटिंग थी। उन्हें इस मीटिंग में शामिल होना आवश्यक है, जिससे बहुमत किसी एक कुर्सी के लिए हाँ या नहीं कह सके, चाहे वे उस मामले को महत्वपूर्ण मानते हों या न मानते हों। अपने जीवन का कम से कम एक घंटे का समय बरबाद करना, जिसमें दूसरे लोग कुर्सी की ऊँचाई, उसकी मजबूती और कुर्सी की चारों तरफ मुड़ने की क्षमता (rollability) पर विचार करते रहेंगे।

अधिकतर यह इस तरह होगा दिखाई देगा: नंबर एक व्यक्ति, प्राचार्य या कोई शिक्षक, जिसे यह काम सौंपा गया है, विभिन्न कुर्सियों के बारे में और उनकी खूबियों और कमियों के बारे में सबको बताएगा। अंत में वह कहेगा: "मेरे विचार में यह कुर्सी ठीक रहेगी।" वही सबकी स्वाभाविक पसंद होगी और सब उस पर सहमत भी हो जाएंगे। लेकिन रुकिए, नहीं, इस तरह सबका सहमत होना पर्याप्त नहीं है! अभी वहाँ बैठे उन सबको अलग अलग कहना होगा: "हाँ, मैं उसकी इस बात से सहमत हूँ" बल्कि बेहतर होगा, अगर यह भी बताएं कि आप क्यों सहमत हैं।

जब थॉमस को इस मीटिंग का न्योता मिला तो उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने प्राचार्य से कहा: "आप मेरे प्राचार्य हैं, मुझे भरोसा है कि आप इस विषय में उचित निर्णय कर करेंगे कि हमारे लिए कौन सी कुर्सी ठीक रहेगी!" फिर उन्होंने हमसे कहा कि इन मीटिंगों में व्यर्थ समय बरबाद करने की जगह मैं आँगन में झाडू लगाऊंगा या कोई दूसरा उपयोगी काम करूंगा।

लेकिन यह भी सच है बाद में कोई यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे कुर्सियों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई!

आप क्या चाहेंगे-आपको बिना बताए लिया गया निर्णय या जनतंत्र का अतिरेक?

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