कल मैंने अपने स्कूली बच्चों के परिवारों से मिलने पर पूर्णेन्दु और रमोना को होने वाले अनुभवों के बारे में लिखते हुए अपने ब्लॉग की शुरुवात की थी। यह किसी एक बच्चे के घर का हाल नहीं है बल्कि ज़्यादातर घरों में यही दिखाई देता है। यह बात चौंकने वाली है कि सभी घरों में ये सभी बातें सामान्य रूप से मौजूद हैं। जैसे टेलीविजन भी सर्वव्यापी है!
जी हाँ। हमारे स्कूल के पहले से पढ़ने वाले और जिनकी भर्ती हम इस साल करने वाले हैं, उन सभी बच्चों के घरों में हमने पाया है कि उनके यहाँ टीवी अवश्य होता है। मुझे ‘लगभग’ शब्द भी लगाना चाहिए क्योंकि एक घर में हमें टीवी दिखाई नहीं दिया था लेकिन आप समझ सकते हैं कि यह एक अपवाद ही था!
इन लोगों के पास कुछ नहीं है। वे टीन की छतों वाले ऐसे घरों में रहते हैं, जिनकी ईंटों से बनी दीवारों पर प्लास्टर तक नहीं है। उनके जीवन में ऐसे दिन अक्सर आते रहते हैं, जब उन्हें पता नहीं होता कि आज भोजन बनेगा या नहीं। लेकिन उनके यहाँ टीवी ज़रूर होता है। वे घर के ऊपर प्लास्टिक की पन्नियां बांधकर किसी तरह घर को पानी से बचाते हैं। लेकिन उन पन्नियों के ऊपर आपको सेटेलाइट डिश अवश्य दिखाई देगी, जिससे उनका टीवी बेहतर सिग्नल प्राप्त कर सके और ‘पिक्चर’ साफ, अच्छी दिखे।
यहाँ तक कि उनके यहाँ पूरे समय बिजली भी नहीं होती! वृन्दावन के कुछ इलाकों में सारा दिन बिजली की आँख मिचौली चलती रहती है। भोजन को ज़्यादा देर तक सुरक्षित रखने और दूध को ठंडा रखने के लिए उनके पास फ्रिज नहीं होता। वे कूलर नहीं खरीदेंगे कि जब असहनीय गर्मियों में तापमान 48 डिग्री हो जाए तो घर में थोड़ी ठंडी हवा आ सके। हमने यहाँ तक देखा है कि टीवी खरीदने के बाद वे लोग बिजली के बैकअप के लिए किसी न किसी तरह बैटरी का भी जुगाड़ कर लेते हैं। किसलिए? जब बिजली चली जाए तो टीवी देख सकें!
उनकी हालत पर तरस आता है। यह शर्मनाक है कि गरीबों के लिए भी इसे एक आवश्यक मनोरंजन का साधन मान लिया गया है। इस बुद्धू-बक्से को हर घर में रखने का क्या परिणाम होगा? यह उनके सामाजिक व्यवहार की सहज-स्वाभाविकता को समाप्त कर देगा। जो लोग पहले बाहर निकलते थे, साथ बैठकर गपशप करते थे, अपने दुःख-दर्द साझा करते थे और सबसे बड़ी बात, साथ में मौज-मस्ती करते हुए न सिर्फ अपनी ख़ुशी में इजाफा करते थे बल्कि एक-दूसरे को भावनात्मक रूप से मदद भी करते थे! अब वह सब छोड़कर लोग घरों में बैठे टीवी के पर्दे को ताकते रहते हैं।
मैं यह भी जानता हूँ कि टीवी पर वे अक्सर किस तरह की चीज़ें देखते हैं और मैं आपको बता दूँ कि वे न तो डिस्कवरी चैनल देखते हैं और न ही खबरों के चैनल। वे देखते हैं फूहड़ धारावाहिक और ड्रामे, जो लोगों को आपसी ईर्ष्या और द्वेष पर आनंदित होना सिखाते हैं और इसलिए अपने व्यक्तिगत जीवन में वे एक तरह की उदासीनता महसूस करने लगते हैं और निराशा से घिर जाते हैं। इसके अलावा इन टीवी सीरियलों में और टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्मों में बड़ी मात्रा में हिंसा का प्रदर्शन होता है। बच्चों के संवेदनशील और सरल मन पर इस ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा का बहुत बुरा असर होता है! जो बच्चे हमारे आश्रम में रहते हैं, उन्हें हम इन असरात से बचाने की भरसक कोशिश करते हैं। लेकिन हमारे बच्चों के गरीब घरों में यह सब बहुत ही सामान्य माना जाता है।
दुर्भाग्य से यह ऐसी चीज़ है जिस पर किसी का कोई काबू नहीं हो सकता और इसे बदलना हमारे-आपके बस की बात नहीं है। यह परिघटना घटित हो चुकी है। हम सिर्फ यह आशा कर सकते हैं कि प्रसारण करने वाले चैनल इस विषय में कुछ सोचेंगे और अपने कार्यक्रमों के जरिये वे लोगों को उनके पिछड़ेपन से निजात दिलाने की कोशिश करेंगे न कि उन्हें मूर्खतापूर्ण कार्यक्रमों में अपना समय बरबाद करने को प्रेरित करेंगे।
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