जीवन एक संघर्ष है – लेकिन टीवी बहुत ज़रूरी है! 8 अप्रैल 2014

कल मैंने अपने स्कूली बच्चों के परिवारों से मिलने पर पूर्णेन्दु और रमोना को होने वाले अनुभवों के बारे में लिखते हुए अपने ब्लॉग की शुरुवात की थी। यह किसी एक बच्चे के घर का हाल नहीं है बल्कि ज़्यादातर घरों में यही दिखाई देता है। यह बात चौंकने वाली है कि सभी घरों में ये सभी बातें सामान्य रूप से मौजूद हैं। जैसे टेलीविजन भी सर्वव्यापी है!

जी हाँ। हमारे स्कूल के पहले से पढ़ने वाले और जिनकी भर्ती हम इस साल करने वाले हैं, उन सभी बच्चों के घरों में हमने पाया है कि उनके यहाँ टीवी अवश्य होता है। मुझे ‘लगभग’ शब्द भी लगाना चाहिए क्योंकि एक घर में हमें टीवी दिखाई नहीं दिया था लेकिन आप समझ सकते हैं कि यह एक अपवाद ही था!

इन लोगों के पास कुछ नहीं है। वे टीन की छतों वाले ऐसे घरों में रहते हैं, जिनकी ईंटों से बनी दीवारों पर प्लास्टर तक नहीं है। उनके जीवन में ऐसे दिन अक्सर आते रहते हैं, जब उन्हें पता नहीं होता कि आज भोजन बनेगा या नहीं। लेकिन उनके यहाँ टीवी ज़रूर होता है। वे घर के ऊपर प्लास्टिक की पन्नियां बांधकर किसी तरह घर को पानी से बचाते हैं। लेकिन उन पन्नियों के ऊपर आपको सेटेलाइट डिश अवश्य दिखाई देगी, जिससे उनका टीवी बेहतर सिग्नल प्राप्त कर सके और ‘पिक्चर’ साफ, अच्छी दिखे।

यहाँ तक कि उनके यहाँ पूरे समय बिजली भी नहीं होती! वृन्दावन के कुछ इलाकों में सारा दिन बिजली की आँख मिचौली चलती रहती है। भोजन को ज़्यादा देर तक सुरक्षित रखने और दूध को ठंडा रखने के लिए उनके पास फ्रिज नहीं होता। वे कूलर नहीं खरीदेंगे कि जब असहनीय गर्मियों में तापमान 48 डिग्री हो जाए तो घर में थोड़ी ठंडी हवा आ सके। हमने यहाँ तक देखा है कि टीवी खरीदने के बाद वे लोग बिजली के बैकअप के लिए किसी न किसी तरह बैटरी का भी जुगाड़ कर लेते हैं। किसलिए? जब बिजली चली जाए तो टीवी देख सकें!

उनकी हालत पर तरस आता है। यह शर्मनाक है कि गरीबों के लिए भी इसे एक आवश्यक मनोरंजन का साधन मान लिया गया है। इस बुद्धू-बक्से को हर घर में रखने का क्या परिणाम होगा? यह उनके सामाजिक व्यवहार की सहज-स्वाभाविकता को समाप्त कर देगा। जो लोग पहले बाहर निकलते थे, साथ बैठकर गपशप करते थे, अपने दुःख-दर्द साझा करते थे और सबसे बड़ी बात, साथ में मौज-मस्ती करते हुए न सिर्फ अपनी ख़ुशी में इजाफा करते थे बल्कि एक-दूसरे को भावनात्मक रूप से मदद भी करते थे! अब वह सब छोड़कर लोग घरों में बैठे टीवी के पर्दे को ताकते रहते हैं।

मैं यह भी जानता हूँ कि टीवी पर वे अक्सर किस तरह की चीज़ें देखते हैं और मैं आपको बता दूँ कि वे न तो डिस्कवरी चैनल देखते हैं और न ही खबरों के चैनल। वे देखते हैं फूहड़ धारावाहिक और ड्रामे, जो लोगों को आपसी ईर्ष्या और द्वेष पर आनंदित होना सिखाते हैं और इसलिए अपने व्यक्तिगत जीवन में वे एक तरह की उदासीनता महसूस करने लगते हैं और निराशा से घिर जाते हैं। इसके अलावा इन टीवी सीरियलों में और टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्मों में बड़ी मात्रा में हिंसा का प्रदर्शन होता है। बच्चों के संवेदनशील और सरल मन पर इस ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा का बहुत बुरा असर होता है! जो बच्चे हमारे आश्रम में रहते हैं, उन्हें हम इन असरात से बचाने की भरसक कोशिश करते हैं। लेकिन हमारे बच्चों के गरीब घरों में यह सब बहुत ही सामान्य माना जाता है।

दुर्भाग्य से यह ऐसी चीज़ है जिस पर किसी का कोई काबू नहीं हो सकता और इसे बदलना हमारे-आपके बस की बात नहीं है। यह परिघटना घटित हो चुकी है। हम सिर्फ यह आशा कर सकते हैं कि प्रसारण करने वाले चैनल इस विषय में कुछ सोचेंगे और अपने कार्यक्रमों के जरिये वे लोगों को उनके पिछड़ेपन से निजात दिलाने की कोशिश करेंगे न कि उन्हें मूर्खतापूर्ण कार्यक्रमों में अपना समय बरबाद करने को प्रेरित करेंगे।

Related posts

स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है - 10 दिसंबर 2015

स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे लैंगिक भूमिकाओं को स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों ज़िंदा रखे हुए हैं। जैसे, घर ...
जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि किस प्रकार परंपरागत लैंगिक भूमिकाएँ आज भी सिर्फ भारत में ही नहीं, पश्चिम में ...
दो इंच की बिकनी से क्या फर्क पड़ता है? 22 अक्टूबर 2014

दो इंच की बिकनी से क्या फर्क पड़ता है? 22 अक्टूबर 2014

स्वामी बालेंदु गलतफहमियों, गलत नतीजों और कम कपड़ों से पड़ने वाले बड़े अंतर के बारे में लिख रहे हैं। ...
जनतंत्र का अतिरेक - 20 मई 2014

जनतंत्र का अतिरेक – 20 मई 2014

स्वामी बालेन्दु बता रहे हैं कि हालाँकि जनतंत्र निस्संदेह सबसे अच्छी राज्य-व्यवस्था है-मगर कभी-कभी इसका अतिरेक भी हो जाता है! ...
तब तक लड़कियां पैदा करते रहना जब तक एक लड़का नहीं हो जाता - 9 अप्रैल 2014

तब तक लड़कियां पैदा करते रहना जब तक एक लड़का नहीं हो जाता – 9 अप्रैल 2014

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि अपने स्कूली बच्चों के घरों के दौरों के दौरान उन्हें गलियों में लड़कों और ...
महिलाएं प्रेम करती हैं मगर पुरुष सिर्फ कामुक होते हैं! नारीवादी किस तरह लिंगभेद के खिलाफ काम करती हैं-13 फरवरी 2014

महिलाएं प्रेम करती हैं मगर पुरुष सिर्फ कामुक होते हैं! नारीवादी किस तरह लिंगभेद के खिलाफ काम करती हैं-13 फरवरी 2014

स्वामी बालेंदु नारीवादियों के बीच लोकप्रिय एक जुमले का ज़िक्र करते हुए बता रहे हैं कि कैसे यह जुमला लैंगिक-समानता ...
यह आपका जीवन है - ध्यान रहे, समाज आप पर कोई दबाव न बना पाए- 13 अगस्त 2013

यह आपका जीवन है – ध्यान रहे, समाज आप पर कोई दबाव न बना पाए- 13 अगस्त 2013

स्वामी बालेंदु उन लोगों के बारे में लिख रहे हैं, जिन्होंने अपने जीवन की एक ऐसी विशेष रूपरेखा (कार्ययोजना) बनाई ...
देशों और संस्कृतियों की तुलना करनी चाहिए मगर यह काम बहुत मुश्किल है - 15 जुलाई 2013

देशों और संस्कृतियों की तुलना करनी चाहिए मगर यह काम बहुत मुश्किल है – 15 जुलाई 2013

स्वामी बालेंदु देशों और संस्कृतियों की तुलना करते हुए यह प्रश्न कर रहे हैं कि क्या उन देशों के लोगों ...
क्या लैंगिक समानता के लिए पुरुषों को आंदोलन चलाना होगा? - 27 फरवरी 13

क्या लैंगिक समानता के लिए पुरुषों को आंदोलन चलाना होगा? – 27 फरवरी 13

स्वामी बालेंदु उन दोहरे मानदंडों की बात करते हैं जो लोग स्त्री और पुरुष के बारे में रखते हैं| ...
न्यायालयों, धर्माचार्यों, चुनावों और विद्यालयों में जाति प्रथा का प्रभाव - 4 जनवरी 2011

न्यायालयों, धर्माचार्यों, चुनावों और विद्यालयों में जाति प्रथा का प्रभाव – 4 जनवरी 2011

स्वामी बालेन्दु लिखते हैं की कैसे जाति व्यवस्था हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है| ...

Leave a Reply