न्यायालयों, धर्माचार्यों, चुनावों और विद्यालयों में जाति प्रथा का प्रभाव – 4 जनवरी 2011

समाज

गुजरात भारत का एक प्रांत है और वहाँ के एक न्यायालय में कुछ समय पहले एक रोचक घटना सामने आई। न्यायालय में दो व्यक्ति आमने-सामने थे। लेकिन जब जज की घोषणा हुई तो उनमें से एक ने उस पर ऐतराज किया। उसने कहा की जज उससे ऊंची जाति का है। उसका कहना था कि जज निष्पक्ष न्याय नहीं कर पाएंगे क्योंकि वह नीची जाति का है और एक ऊंची जाति वाले जज से उसे सिर्फ नकारात्मक फैसले की आशंका है। उसने आवेदन-पत्र दाखिल कर किया कि जज को बदला जाए या उसके प्रकरण को किसी दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया जाए।

इस उदाहरण से आप देख सकते हैं कि देश में क्या चल रहा है। यहाँ जाति आधारित संसदीय चुनाव होते हैं, जाति आधारित ग्राम-पंचायतों के और नगर-पालिकाओं के और राज्यों के सदन के चुनाव होते हैं। कुछ जातियों के लिए नौकरियों में आरक्षण होता है। जनता चाहती है कि उनकी जाति के राजनीतिक नेता हों, विद्यालयों में शिक्षक एक विशेष जाति के हों और दूसरे अधिकारी भी किसी और विशेष जाति के हों। हम आजकल अपनी मत-गणना भी जाति के आधार पर करवाते हैं। मैंने पहले भी बताया था कि यहाँ, उत्तरप्रदेश में कुछ अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय में दिये जाने वाले खाने का बायकाट करने का आदेश देते हैं क्योंकि वहाँ का खाना किसी नीची जाति के कर्मचारियों द्वारा पकाया जाता है। अब लोग जज भी अपनी ही जाति का चाहते हैं!

हमने गोवा में हुआ एक किस्सा सुना है। मंदिरों के पुजारी हमेशा से ब्राह्मण जाति के, यानि सबसे ऊंची जाति के लोग होते हैं। ऐसे ही एक पुजारी को, उसके बाल बच्चों और पत्नी सहित गाँव से बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उसने एक नीची जाति वाले अछूत को आशीर्वाद दिया था, या उसके घर पूजा-अर्चना की थी। गाँव वालों ने उसे बाहर कर दिया और बहुत लानतें भेजी कि अब तुम भी अपने परिवार सहित अछूत हो गए हो।

ये सारी घटनाएँ दर्शाती हैं कि जब तक समाज में ऐसा सोच मौजूद है बराबरी की बात भी करना व्यर्थ है। यह बात मानवता के विरुद्ध है। किसी दिन कोई यह भी कह सकता है कि ऊंची और नीची जातियों के लिए अलग-अलग कचहरियाँ हों, कार्यालय हों! शायद उन्हें बसों और रेलगाड़ियों में अलग-अलग सीटें भी लगवाना पड़ेंगी, जैसा कि जातीय पृथक्करण (रेशियल सेग्रेगेशन) के समय अमरीका में हुआ करता था!

पहले उन्होंने धार्मिक आधार पर भारत और पाकिस्तान का बंटवारा कर दिया। एक देश हिंदुओं के लिए और एक मुसलमानों के लिए। 80 के दशक में पंजाब के कुछ सिख भाई अपने लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ बनाना चाहते थे। कश्मीर में आज भी अलगाववादी अपने लिए एक अलग देश की मांग कर ही रहे हैं। तो भविष्य में हो सकता है कि कुछ जातीय सक्रियतावादी जातियों के आधार पर देश के बंटवारे की मांग कर सकते हैं।

मुझे बार-बार यह दोहराना पड़ता है कि हमारे राजनेताओं को और सरकारों को मिलकर ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए कि वे जो कहते हैं वह करें भी। वे कहते हैं कि वे जाति आधारित भेदभाव समाप्त करना चाहते हैं लेकिन अपने उपरोक्त व्यवहार से वे लोगों के दिलों में अलगाववाद के बीज बोते रहते हैं। वे आरक्षण के लिए सहमत हो जाते हैं, जाति आधारित चुनाव लड़ते हैं और अब जनगणना भी जातियों के आधार पर कारवाई जा रही है। वे ठीक-ठीक जातिगत आंकड़े जानना चाहते हैं। क्या वे इतना भी नहीं समझ पाते कि जातियों के विचार को विस्मृत कर देने के बाद ही हम गांधी जी के समानता के सपने को साकार कर सकते हैं। कोई किसी भी जाति का हो सबको एक बराबरी का संदेश दिया जाना ज़रूरी है। तब कोई भी अपनी जाति के जज की मांग नहीं कर सकेगा क्योंकि सबको भरोसा होगा कि उसके अपराध का फैसला सच्चाई और न्याय के आधार पर होगा।

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