उल्टा – सीधा जवाब देने के बजाए जवाब ही न दें तो बेहतर होगा – 21 मार्च 13

मौन

कल से मैंने एक श्रृंखला शुरु की है जिसमे मैं यह बताने का प्रयत्न करूंगा कि ऐसी स्थिति में आप क्या करें जब कोई आपसे सवाल पूछे और आपको पहले से यह पता हो कि यदि आपने ईमानदारी से उत्तर दिया तो प्रश्नकर्ता नाराज़ हो जाएगा । आज दूसरे विकल्प पर बात करते है।

दूसरा विकल्पः जवाब ही न दें

किसी प्रश्न के उत्तर में झूठ बोलने के विकल्प को मैं सिरे से नकारता हूं। परंतु किन्हीं विशेष परिस्थितियों में जवाब न देने के विकल्प को आजमाने का सुझाव देता हूं। उस स्थिति में इस विकल्प को आजमाएं जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ डिप्लोमैटिक होना चाहते हैं जो भविष्य में कभी भी आपकी ज़िंदगी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला नहीं है। किसी व्यक्ति से आप जीवन में एक ही बार मिलते हैं और उसे अपनी पूरी सोच से अवगत नहीं कराना चाहते हैं क्योंकि आपके अनुसार यह भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा। वह आपकी बात से सहमत नहीं होगा, आपकी बात पर ध्यान भी नहीं देगा। यही एकमात्र ऐसी स्थिति है जहां आप इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं। मग़र ध्यान रहे कि यह इतना आसान नहीं है, काफी सावधानी की आवश्यकता है।

आप मौनव्रत धारण करके बच नहीं सकते। यह तो झूठ बोलने से भी बदतर होगा और एक प्रकार की अशिष्टता होगी। किसी भी असहज स्थिति से बाहर आने का यह तरीका उचित नहीं होगा। बेहतर होगा कि आप कोई और तरक़ीब लगाएं।

मैं आपको अपना एक उदाहरण देता हूं जहां मैंने वास्तव में यह तरीका अपनाया । मैंने न केवल अपनी भावनाओं को आहत होने से बचाया बल्कि प्रश्नकर्ता के दिमाग की शांति को भी सुरक्षित रखा। कुछ महीने पहले यहां आश्रम में कुछ लोग आए जो मुझे उस ज़माने से जानते थे जब मैं एक गुरु हुआ करता था। वह एक वृद्ध महिला थी जो अकसर मेरे कार्यक्रमों में आया करती थी। वह अपने बेटे, बहू और पोते – पोतियों को भी साथ लाई थी। वृद्धा ने उनसे मेरा परिचय अपने गुरु के रूप में कराया। इधर – उधर की बातचीत के बाद उसने पूछा कि मैं उसके शहर में प्रवचन देने के लिए दोबारा कब पधार रहा हूं।

तीन जोड़ी आंखें मेरी ओर उत्सुकता और इस उम्मीद के साथ देख रही थीं कि मैं जल्दी ही उनके शहर में आ रहा हूं। मैंने अपनी सभी संभावनाओं पर विचार किया और वृद्धा की आंखों में झांकते हुए उसके प्रश्न का उत्तर देने का विकल्प चुना। अग़र मैं उस वक़्त उन्हें यह बताता कि मैं अब धर्म में विश्वास नहीं करता और न ही भगवान को मानता हूं, तो इससे वृद्धा बेवजह उलझन में पड़ जाती। "ओह, अब मैं पिता हूं" मैंने हंसकर जवाब देते हुए कहा और पास बैठी अपरा को उठाने के लिए झुका। बच्ची को गोद में लेते हुए मैंने कहा, "अब मेरा सारा ध्यान इस नन्हे सितारे पर लगा रहता है।" अपरा को गुदगुदी करते हुए मैंने बताया, "पिछले हफ्ते ही इसने चलना सीखा है।" अब सबका ध्यान अपरा के विकास पर चला गया। मूल प्रश्न अनुत्तरित रहा और वे लोग उसे भूल भी गए। न तो किसी की भावनाओं को चोट पहुंची और न ही कोई निराश हुआ।

जिस विषय पर प्रश्न किया गया है, उसका जवाब दिए बिना चतुराई से विषयांतर कर देना चाहिए। लेकिन यह दूसरा विषय इतना रोचक होना चाहिए कि प्रश्नकर्ता का ध्यान अपने मूल प्रश्न से हट जाए। आप कोई मजेदार चटकला सुना सकते हैं अथवा कोई विवादास्पद चर्चा छेड़ सकते हैं। आप सामने वाले से उसकी रुचि के किसी खास विषय पर कोई प्रश्न पूछ सकते हैं। आपका मकसद उसका ध्यान बदलना होना चाहिए। यह तकनीक जरा कठिन है और मैं आपको सचेत करना चाहूंगा कि यह हमेशा कारगर होगी इस बात की कोई गारंटी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति ने आपसे एक प्रश्न पूछा है तो वह प्रश्न उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। वह आपको ऐसे नहीं छोड़ेगा। वह अपना प्रश्न दोबारा पूछेगा और यह बड़ा हास्यास्पद लगेगा कि आप दोबारा उसका ध्यान पलटने की कोशिश कर रहे हैं।

मुख्य बात यह है कि सामने वाले की बात का जवाब नहीं देना है। लेकिन यह निर्णय लेने से पहले आपको यह सुनिश्चित कर लेना है कि प्रश्नकर्ता उत्सुकतावश प्रश्न कर रहा है या वाकई प्रश्न को लेकर गंभीर है। यदि वह वास्तव में गंभीर है तो इस विकल्प को भूल जाएं – इससे समस्या नहीं सुलझेगी।

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