लखनऊ में ख़रीदारी का अनुभव – 24 दिसंबर 2013

पर्यटन

कल मैंने हमारे उत्तर प्रदेश की राजधानी, लखनऊ की रोमांचक यात्रा के बारे में बताया था। अपरा और रमोना के साथ होटल पहुँचकर और नहा-धोकर हमने नाश्ता किया और अपरा के साथ खेलते हुए थोड़ा आराम करते रहे। फिर हमने आसपास के इलाके का जायज़ा लेने का और संभव हो तो कुछ ख़रीदारी करने का मन बनाया।

पानी और जूस जैसी कुछ आवश्यक वस्तुएँ खरीदने के बाद हमें एक जूतों, कपड़ों और बच्चों के खिलौनों की दुकान दिखाई दी। हम सोच ही रहे थे कि अपरा के लिए ठंड के जूते लेने हैं और वे हमें वहाँ मिल गए: गर्म और मजबूत लाल जूते! यह आजकल अपरा का पसंदीदा रंग है और वह उन जूतों पर तुरंत रीझ गई। उसने उन्हें वहीं पहन लिया और फिर उतारा ही नहीं।

स्वाभाविक ही अपने लखनऊ प्रवास के दौरान हमने इसके अलावा भी बहुत कुछ खरीदा। यह एक बहुत बड़ा शहर है और ‘चिकन’ के काम के लिए मशहूर है। यह सूती कपड़े पर हाथ से की जाने वाली कसीदाकारी होती है। दोस्तों ने हमें बढ़िया से बढ़िया दुकानें बताई और रमोना ने अपरा और खुद अपने लिए कुछ बहुत सुंदर चिकन के कपड़े खरीदे।

हम लखनऊ के सबसे लोकप्रिय बाज़ार, अमीनाबाद भी गए। यह वह जगह है, जहां कितना भी ख़रीदारी करते रहो मन नहीं भरता और अगर आप मोल-भाव करने में माहिर हैं तो आपको मज़ा भी बहुत आता है और चीज़ें सस्ती भी मिल जाती हैं। समझ लीजिए, यह बाज़ार छोटी-छोटी बहुत सी दुकानों और फुटपाथियों के सामानों की प्रदर्शनी है और ख़रीदारों से यह बाज़ार हर वक़्त गुलजार रहता है, जो कपड़े, जूते और दूसरी बहुत सी चीजों को देख-देखकर हैरान होते हैं कि क्या खरीदें क्या न खरीदें। हर तरफ से बेचने वालों की आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं: "दो सौ पचास का एक, दो सौ पचास का एक, पाँच सौ के दो!" या "सुंदर पर्स, हैंडबैग, सूटकेस!" वगैरह वगैरह। लोग कीमतें सुनते हैं, मोल-भाव करते हैं और कई दुकानों की कीमतों से तुलना करते हैं। फिर सौदा तय होने पर पैसों का लेनदेन होता है, लोग घर जाते हैं कि बहुत सस्ते में उन्हें मनपसंद चीज़ें मिल गईं और दुकानदार मुसकुराते रहते हैं कि चलो धंधा हो गया, दो पैसे मिल गए। यह भीड़ भरी, शोर-शराबे वाली और चहल-पहल वाली रंगीन जगह है। रमोना को यहाँ बड़ा मज़ा आया। ऐसी जगहें आपको जर्मनी में नहीं मिल सकतीं और उसके लिए ख़रीदारी का यह एक बहुत अलग अनुभव था।

अंत में हमने कुछ गर्म ऊनी कपड़े, अपरा के लिए जूते और उपहार और घर के सब लोगों के लिए भी कुछ उपहार खरीदे। अपरा और इन बच्चों में क्रिसमस के इन उपहारों का आज रात वितरण होगा।

जी हाँ, हम क्रिसमस को भूले नहीं हैं और हमने आज शाम को एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया है। आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि हम क्रिसमस क्यों और कैसे मनाते हैं? उसी तरह जैसे दीवाली मनाते हैं: हम आश्रम को थोड़ा सजाएँगे, कुछ नाच-गाना होगा, बढ़िया खाना बनाया और खाया जाएगा और यह शाम भी दीवाली की तरह बहुत खुशनुमा हो जाएगी। कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं होगा, इस विषय में कोई बात भी नहीं होगी, बच्चे अपने उपहार पाएंगे और हम आश्रम के कर्मचारियों और दूसरे लोगों के साथ प्रेम के साथ यह त्योहार मनाएंगे। सिर्फ यह कि बच्चों के लिए यह दिन एक खास दिन हो जाए, जिसे वे याद रखें।

हम अब उनके मुसकुराते हुए प्रसन्न चेहरे देखने का इंतज़ार कर रहे हैं, जब रात को वे अपने उपहार खोलेंगे और कपड़े, खिलौने आदि पाकर खुशी से भर उठेंगे! हम आपको भी क्रिसमस की शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं और कामना करते हैं कि जो क्रिसमस मनाते हैं उनकी शाम खुशनुमा हो और ये क्रिसमस की छुट्टियाँ वे प्रेम और उल्लास के साथ मनाएँ। अपने परिवार के साथ समय बिताएँ, खाएं-पियें और प्रेम के आदान-प्रदान के साथ इस त्योहार को यादगार बनाएँ।

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