अपने ही देश मेँ एक देसी सैलानी को विदेशी समझ लिया जाए तो? 25 दिसंबर 2013

पर्यटन

स्वाभाविक ही, लखनऊ मेँ हम सिर्फ ख़रीदारी ही नहीं करते रहे बल्कि खूब घूमे-फिरे और लखनऊ वाले बहुत से मित्रों से मुलाक़ात भी की।

जब हम थोड़ा घूमने-फिरने होटल से बाहर निकले तो रिक्शा वाले ने, शायद मेरी विदेशी पत्नी को देखकर हमें विदेशी समझ लिया और दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित शहर के मुख्य दर्शनीय स्थलों तक की सवारी के लिए हमसे 1000 रुपए की मांग करने लगा। मैंने मज़ाक में कहा कि हजार नहीं, दो हजार ले लो! तो वह समझ गया और फिर पहले मांगी गई रकम के दसवें हिस्से 100 रुपए मेँ तैयार हो गया। लेकिन मैंने उससे कहा कि फ्री में भी ले जाएगा तो भी अब मैं उसके साथ नहीं जाऊंगा। फिर हमने दूसरे रिक्शे वाले से बात की और वह हमें आधे पैसे में यानी 50 रुपए में ले गया।

हम होटल से निकल रहे थे इसलिए रिक्शा वाले ने हमें टूरिस्ट समझ लिया, शायद भारतीय मगर विदेश में बसा हुआ और विदेशी पत्नी और विदेशी बच्चे वाला। हमें देखकर बहुत से लोगों को यही लगता रहा क्योंकि जब हम लखनऊ के मशहूर पर्यटन स्थल, बड़ा इमामबाड़ा पहुंचे और एक गाइड से कहा कि हमें गाइड की ज़रूरत नहीं है तो उसने आश्चर्य से कहा, “अरे! आप तो बड़ी अच्छी हिन्दी बोलते हैं!” हाँ भाई, मैं इसी देश में पैदा हुआ हूँ और हिन्दी मेरी मातृभाषा है! मैं जवाब देने जा रहा था मगर मेरी पत्नी ने मुझे मात देते हुए हिन्दी में कहा, “क्योंकि हम भारत में ही रहते हैं!” उस व्यक्ति का आश्चर्यचकित चेहरा देखने लायक था!

फिर भी भारतीय नागरिक की हैसियत से मुझे प्रवेश-पत्र के 50 रुपए अदा करने पड़े और रमोना के 500 रुपए लगे क्योंकि वह जर्मन है। गनीमत यह रही कि अपरा अभी 5 साल की नहीं हुई है और उसका कोई टिकिट नहीं लगने वाला था, अन्यथा हमें इस मुद्दे पर कर्मचारियों से बातचीत करनी पड़ती। रिक्शा वाला कुछ भी गलत नहीं कर रहा था; जब सरकार 10 गुनी कीमत वसूल कर सकती है तो रिक्शा वाला क्यों नहीं! 

हम इस बात पर बहुत हँसे और बाद में अपने मित्रों से मिले तो ये घटनाएँ उन्हें सुनाईं। उस दिन मेरे सबसे पुराने स्कूल के जमाने के मित्रों में से एक, मनीष हमें लखनऊ घुमाने साथ आया था। मैं पहले भी कई बार लखनऊ आ चुका हूँ लेकिन एक पर्यटक के रूप में नहीं, इसलिए इस बार हमने वहाँ बहुत रोमांचक और शानदार समय व्यतीत किया। विशेषकर अपरा और मनीष की छोटी बच्ची, अलीशा के साथ होने से हमारा घूमना बड़ा आनंददायक रहा।

पहले दिन हमने होटल में ही खाना खाया लेकिन शनिवार को मेरे एक और मित्र, अवधेश निगम ने हमें आमंत्रित किया था। वे मेरे फेसबुक मित्र हैं और एक बार हमारे आश्रम आ चुके हैं। उनकी पत्नी ने हमारे लिए बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन तैयार किया था। उनके बेटे और बहू ने भी हमारे साथ भोजन किया और यह सोचकर मैं बड़ा खुश हुआ कि इंटरनेट ने मुझे इतने अच्छे मित्रों से नवाजा!

फिर रविवार को हम पूरा दिन मनीष और उसके परिवार के साथ रहे-उसके बच्चों के साथ चिड़ियाघर गए, कुछ ख़रीदारी की और फिर रात का खाना उनके साथ खाया। मनीष कई बार आश्रम आ चुका है और हर बार मुझे बुलाता रहता था कि लखनऊ आओ। आखिर अब जाकर यह अवसर आया था कि हम पति-पत्नी अपनी बेटी अपरा के साथ उनके सान्निध्य और उनकी खातिरदारी का मज़ा ले सके! वाकई हमने यही किया, एक-एक पल का आनंद उठाया।

यह हमारे इस सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी: हमने छुट्टियाँ का आनंद लिया, घूमे-फिरे और साथ ही अपने मित्रों से मिले, उनके साथ, उनके घर में इतना सुखद और प्रेम में सराबोर वक़्त गुज़ारा!

यहाँ आप लखनऊ में बिताए हमारे सप्ताहांत के कुछ फोटो देख सकते हैं

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