महिलाओं की यौन इच्छाओं से पुरुषों की सुरक्षा करना – लैंगिक समानता की दिशा में एक और तर्क – 7 मई 2015

यौन क्रिया

कल वैवाहिक बलात्कारों के संबंध में लिखते हुए मैंने नोटिस किया कि सेक्स पर विचार करते हुए हमेशा महिलाओं की सहमति का सवाल उठता रहा है। मैंने आज तक यह कभी नही पढ़ा कि सेक्स के लिए पुरुषों की सहमति होनी चाहिए या नहीं! मैंने इन चर्चाओं में यह भी कभी नहीं पढ़ा कि महिलाओं को भी सेक्स की आवश्यकता होती है! यह कैसे?

जैसा कि कल मैंने स्पष्ट किया था, हिन्दू धर्म महिलाओं से यह अपेक्षा करता है कि वे हर हाल में अपने पति की आज्ञा का पालन करेंगी। अर्थात, अगर पति सेक्स करना चाहता है तो उसे तुरंत अपने आपको पति के सामने प्रस्तुत कर देना चाहिए। इस्लाम भी, जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, महिलाओं के प्रति इतना ही असभ्य व्यवहार करता है। असल में, मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा कि मुहम्मद ने इस बारे में ब्योरेवार विस्तृत नियम बता रखे हैं कि पत्नी को अपने आपको किस तरह हर वक़्त तैयार रखना चाहिए: चाहे महिला ‘ऊँट पर बैठी’ हुई ही क्यों न हो, उसे पति के साथ संभोग के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए!

वाह! पैगंबर की स्वैर कल्पनाएँ बेहद विषद, गजब और सजीव हैं! क्या नहीं?

तो सारी चर्चा महिला की सहमति के इर्द-गिर्द घूम रही है। उसे पति के साथ सेक्स के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए। लेकिन क्या हो अगर उसका पति सेक्स के लिए उद्यत ही न हो, खुद होकर कभी उससे कहे ही नहीं-या कभी-कभार, क्वचित ही कहे? तब पत्नी की यौनेच्छा का क्या होगा, सेक्स की उसकी आवश्यकता का क्या हो?

पूरी चर्चा इस बात की है कि सिर्फ पुरुष ही हमेशा सेक्स की मांग करे, चाहे जब, दिन में कभी भी! न सिर्फ दिन में कभी भी, बल्कि इस बात की चिंता किए बगैर कि उसकी पत्नी किस अवस्था में है-सिर्फ मासिक धर्म के समय को छोड़कर, क्योंकि तब वह अपवित्र और अस्पृश्य होती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वास्तव में पुरुष की सेक्स करने की इच्छा न हो?

जी हाँ, इसके विपरीत अगर महिला की सेक्स की इच्छा अधिक प्रबल हो? महिलाओं की यौनेच्छा को कम करके न आँकें! जब उनकी इच्छा होती है, बल्कि कहा जाए कि जब उन्हें सेक्स की अत्यंत आवश्यकता होती है तब कई महिलाएँ किसी पुरुष के साथ सोने की इच्छा में बड़ी दूर तक जा सकती हैं, कई खतरे मोल ले सकती हैं! कमजोर सेक्स कई बार असाधारण शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसके तरकश में पुरुषों से कहीं ज़्यादा प्रकार के तीर होते हैं, क्योंकि पुरुषों में, जैसा कि हम जानते हैं, रक्तसंचार जब दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होने लगता है, उनका मस्तिष्क ठीक तरह से काम नहीं करता! और ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का बेहतर उपयोग करते हुए यह सीधी-सादी लगने वाली औरत अपना कम अबोध रूप भी दिखा सकती है!

इसलिए मैं पुरुषों की ओर से यह याचना करता हूँ कि बिना सहमति के किए जाने वाले सेक्स के बारे में चर्चा करते समय उनकी सहमति या असहमति पर भी चर्चा की जानी चाहिए! पुरुषों की अकामुकता के साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में एक अपील और लैंगिक समानता की मांग!

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