गोपनीय, दमित और फटाफट सेक्स: सेक्स को लेकर यही वर्जनाएँ यौन अपराधों के मूल में हैं – 23 जनवरी 2014

यौन क्रिया

सोमवार को मैंने एक संवेदनशील मुद्दे पर लिखना शुरू किया था: भारत में विदेशी महिला पर्यटकों पर होने वाले यौन अपराधों और बलात्कारों की रिपोर्टों के परिप्रेक्ष्य में उनकी सुरक्षा का सवाल! उसके बाद मैंने इसी मुद्दे से जुड़ी भारतीय महिलाओं की समस्याओं का ज़िक्र किया था और कल उस टिप्पणी का उत्तर देने की कोशिश की थी, जिसका आशय यह था कि महिलाओं के वस्त्रों के चलते ही उनके विरुद्ध यौन अपराध होते हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है लेकिन साथ बहुत ही महत्वपूर्ण भी है और इसीलिए आज मैं इस समस्या के मूल कारणों पर ईमानदारी के साथ और खुलकर प्रकाश डालना चाहता हूँ, जिससे लोग अपने गलत विचारों को इन झूठे तर्कों के पीछे छिपा न सकें!

जी हाँ, छिपाते हैं, उसका दमन करते हैं और और उसके साथ दो-चार नहीं होना चाहते और उसका सामना नहीं करना चाहते। सेक्स एक ऐसा विषय है जो खुद ही समस्या बन गया है। कुछ सप्ताह पहले मैंने बातों बातों में अपने एक दोस्त से कहा कि मैं "क्या हम सेक्स संबंध स्थापित कर सकते हैं?" इस शीर्षक से एक ब्लॉग लिख रहा हूँ और मैं यह लिखना चाहता हूँ कि "हम अपनी सेक्स जरूरतों के लिए एक दूसरे की मदद क्यों नहीं ले सकते अथवा सेक्स करने के लिए आमंत्रण क्यों नहीं दे सकते?" उसकी प्रतिक्रिया एक टिपिकल भारतीय के सोच को दर्शाने वाली थी: आप सेक्स पर लिखना ही क्यों चाहते हैं? यह चर्चा का विषय नहीं है! जी हाँ, करते सब हैं मगर छिपकर, खुले आम नहीं! फिर उस पर बात क्यों की जाए?

मैं जानता हूँ कि पश्चिमी देशों में भी आप किसी से यूंही यौन संबंध बनाने का अनुरोध नहीं कर सकते, भले ही वह नाइट क्लबों में घुमा-फिराकर चलता ही रहता है, लेकिन यहाँ, भारत में सेक्स पर बात भी करना एक तरह से वर्जित माना जाता है! आप इस शब्द का उच्चारण आपसी बातचीत में भी नहीं करते, अक्सर दोस्तों के साथ भी नहीं। और पत्नी से बात करते हुए सतर्क रहें, उससे ऐसी कोई बात न करें जिससे यह आभास हो कि आपने किसी और से सेक्स संबंधी बात की है। यहाँ तक कि अंतरंग मित्रों के साथ मज़ाक-मज़ाक में अपनी सेक्स फंतासियों की चर्चा करते हुए भी अक्सर आपकी पत्नी शामिल नहीं होती! पत्नी या पति के साथ सेक्स बिलकुल दूसरी बात है।

लाईट बंद करो, सिर्फ वे कपड़े उतारो, जिन्हें उतारे बगैर इस काम को अंजाम नहीं दिया जा सकता और तुरत-फुरत करके फुरसत पाओ। आवाज़ मत करो, बात करने की ज़रूरत नहीं है, सिसकियाँ मत निकालो, सीत्कार मत करो, और देखो भी नहीं। कोई नई क्रीड़ा, कोई नया प्रयोग आजमाने की कोशिश मत करो, रस मिले न मिले, उपभोग की संतुष्टि मिले न मिले! जब उत्तेजना काबू से बाहर हो जाए उसे शांत भर कर लो या तब करो जब बच्चे चाहते हों। बाकी दिन भर, या पूरे सप्ताह या महीना भर सेक्स का खयाल भी मन में न लाओ, सेक्स संबंधी बात मत करो, और हाँ, यौन-स्पर्श पूरी तरह वर्जित है!

मैं कहता हूँ, इससे समस्याएँ तो पैदा होंगी ही? यह वाकई अद्भुत बात है कि विवाह के बाद भी पुरुष अपनी फंतासियों को पूरा न कर पाएँ! यानी, वे अनजान महिलाओं की तरफ देखें और उनके साथ वह सब करने की कल्पना करें, जो उन्हें अपनी पत्नी के साथ करना चाहिए। ये 25 साल से ज़्यादा आयु के अविवाहित पुरुष स्त्रीविषयक दिवास्वप्न देखते हुए अपने माता-पिता से उनका विवाह करवाने की अपेक्षा में इंतज़ार करते रहते हैं कि कब वे वह अनुभव प्राप्त कर सकेंगे, जिसे वे कचरा फिल्मों में और मोबाइल फोन पर देख-देखकर उत्तेजित होते रहे हैं!

किसी को भी सेक्स पर बात करने की इजाज़त नहीं है, युवा पुरुष और महिलाएं इस विषय पर अपने ख़यालों का इज़हार नहीं कर सकते, कोई नहीं है, जिनसे बात करके वे अपनी शंकाओं का निवारण कर सकें और विवाह के दिन तक वे उसके बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानते! और यह तब है जब आजकल विवाह 25 से 30 वर्ष की उम्र में हो रहे हैं! इस उम्र तक आते आते ये युवा हर तरह की यौनेत्तजनाओं से गुज़र चुके होते हैं लेकिन उसका अनुभव लेने की बात छोड़िए, उन्हें शब्दों में व्यक्त करने का मौका भी उनके पास नहीं होता! विवाह के बाद भी इनमें से ज़्यादातर उत्तेजनाओं का उत्सर्जन नहीं हो पाता!

भारतीय पुरुष और महिलाओं का गर्व और उनकी पवित्रता उनके यौनांगों तक सीमित है। लेकिन इन्हीं पुरुषों की दमित कामुकता जब मौका पाती है और उस पर उनका काबू नहीं रह पाता तो वे बलात्कारी बन जाते हैं। और हाँ, जब वे अनियंत्रित हो जाते हैं तो वे हिंसा और अपराधों की ओर भी प्रवृत्त हो सकते हैं। महिलाओं के प्रति उनकी संकुचित धारणाएँ धर्म द्वारा परिचालित होती हैं, जिसमें महिलाओं के प्रति अक्सर अवमानना का भाव परिलक्षित होता है। और जब वे ऐसा मौका पाते हैं तो फिर महिलाओं को न सिर्फ तुच्छ मानकर उनका अपमान करते हैं बल्कि उन पर बलात्कार (अत्याचार) करने में भी नहीं हिचकिचाते।

यह बड़ी निराशाजनक स्थिति है-और इसे जड़मूल से उखाड़ फेंकना आवश्यक है। भारत को सेक्स के मामले में एक खुली नीति अपनानी चाहिए। और यह काम समस्या के मूल पर प्रहार होगा!

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