कामुकता – एक आनंदित करने वाली नैसर्गिक अनुभूति – उसे बीमारी समझने वाले स्वयं बीमार हैं – 1 जून 2015

कुछ समय पहले मेरे एक परिचित ने अश्लील फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी नज़र में ये फिल्में लोगों के मन में काम-वासना या कामोत्तेजना पैदा करती हैं और उसी का परिणाम है कि भारत में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं। संक्षेप में, वे सोचते हैं कि जितना ज़्यादा अश्लील फिल्में लोग देखेंगे, उतनी ही अधिक संख्या में महिलाओं पर बलात्कार होगा।

इससे पहले कि मैं और विस्तार में जाऊँ, मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ: कामुकता या कामोत्तेजना बुरी चीज़ कतई नहीं है। यह इंद्रियों में होने वाली एक नैसर्गिक संवेदना, अनुराग और एहसास है और वह सभी में पाई जाती है। पुरुष और स्त्रियाँ, शारीरिक रूप से सक्षम या अक्षम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, यह हर एक व्यक्ति में मौजूद होती है। काम-वासना सब में है-सच यह है कि अगर आपमें नहीं है तो आपके शरीर में कोई न कोई विकृति है! हर एक में अलग-अलग परिमाण में काम-वासना पाई जाती है, जो उनके शरीर में मौजूद हार्मोन्स और निश्चित ही, मानसिक अवस्थाओं से उपजी भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है।

सामान्य परिस्थितियों में भी वह आसानी से उत्पन्न हो जाती है। वास्तव में, एक मामूली विचार भी काम-वासना पैदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके लिए फिल्म या किसी कामोत्तेजक फोटो या तस्वीर की ज़रूरत नहीं है! इसके अलावा, सामान्य बॉलीवुड या हॉलीवुड मूवी भी आपमें कामोत्तेजना या काम-वासना पैदा कर सकती है-या अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी पर बैठे, कोई बिल्कुल अलग काम करते हुए भी महज एक विचार आपमें कामोत्तेजना पैदा कर सकता है! इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक या मानसिक गड़बड़ी है और वह कामोत्तेजना महसूस नहीं कर पाता तो घंटो अश्लील फिल्में देखता रहे, उसे कभी, कोई कामोत्तेजना नहीं होगी!

न सिर्फ कामवासना नैसर्गिक है, वह वास्तव में बहुत खूबसूरत चीज़ भी है! काम-वासना की भावना से और खासकर जब आप उसे संतुष्ट कर देते हैं तो आप भीतर तक स्वतः ही खुशी और आनंद में डूबने-उतराने लगते हैं, परितुष्ट महसूस करते हैं, प्रेम की गहरी अनुभूति में सराबोर हो उठते हैं। काम-वासना आपको असीम प्रसन्नता और मुक्ति प्रदान करती है और मेरी नज़र में, वह बलात्कार जैसे घृणित अपराध का कारण हो ही नहीं सकती! इस उत्कट आनंद के साथ बलात्कार की कोई संगति नहीं बैठती। लेकिन इसके बारे में और अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

काम-वासना हमेशा से इस संसार का हिस्सा रही है। यह सर्वव्यापी है-साहित्य से लेकर कलाओं तक, घरों में मौजूद मूर्तियों से लेकर पूजास्थलों में उकेरी गई चित्रकारी तक। तकनीक के विकास के साथ इनकी प्रतिकृतियाँ सर्वसुलभ हो गई हैं, माउस के एक क्लिक के साथ आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत हाजिर! लेकिन दुर्भाग्य से कामवासना या कामोत्तेजना के बारे में वही पुरानी समझ अब भी बरकरार है, उसमें रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है।

आज भी बहुत से लोग काम-वासना को बुरी चीज़ समझते हैं। जितना अधिक वे कट्टर होते जाते हैं, काम-वासना, सेक्स और उसके आसपास मौजूद हर चीज़ को वे उतना ही अधिक बुरा समझते जाते हैं। कामुक होना बीमार मस्तिष्क होने का प्रमाण माना जाता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क में ऐसे कामोत्तेजक विचार नहीं आ सकते और पाक-साफ़ शरीर में ऐसे एहसासात, ऐसी इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा भी नहीं होनी चाहिए। अगर आप सेक्स का आनंद लेते हैं या उसके बारे में सोचते भी हैं तो अपने आपको अपराधी महसूस करना चाहिए। शारीरिक वासनाओं की अनुभूति का दमन किया जाना चाहिए। अतिधार्मिक लोग ब्रह्मचर्य की इसी धारणा पर विश्वास करते हैं। सन्यास के ज़रिए वे पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

मैं समझता हूँ कि यही वास्तव में रुग्ण सोच है। धर्म ने लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि कामुकता बुरी चीज़ है। यह पूर्वाग्रह ही लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बनाता है! ब्रह्मचर्य पूरी तरह अप्राकृतिक विचार है। संभोग का दमन करके शुद्धि प्राप्त करने का दावा करना पूरी तरह अवैज्ञानिक है लेकिन धर्म इसकी परवाह नहीं करता!

यौनेच्छाओं का यही दमन पुरुषों और महिलाओं को उसकी खोज की ओर, उसकी अधिकाधिक जाँच-परख की ओर उद्यत करता है, भले ही यह वे ढँके-छुपे तरीके से करते हों। और उसके बाद वह कई रुग्ण तरीकों से फूट पड़ता है-यौन अपराध की शक्ल में, जिन्हें होता हुआ हम रोज़ देखते हैं, क्योंकि अपनी नैसर्गिक उत्तेजनाओं को बाहर निकालने का कोई रास्ता उनके पास नहीं होता!

कामुकता: सैकड़ों सालों से उसकी शोहरत एक मनोविकार के रूप, एक गर्हित अनुभूति के रूप में रही है और मेरे विचार में, इस धारणा को बदलने का वक़्त आ गया है!

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