‘आइए, सेक्स के बारे में बातें करें’ का अर्थ ‘आइए, अश्लील चित्र देखें’ नहीं है! 7 अगस्त 2014

यौन क्रिया

कल मैंने इस विषय पर चर्चा की थी कि सिर्फ यौन सम्बन्ध स्थापित करने पर, सेक्स का आनंद लेने पर, सेक्स के बारे में सोचने पर या सेक्स सम्बन्धी किसी भी बात पर चर्चा करने या सोचने-विचारने पर धर्म कैसे लोगों में अपराधबोध भर देता है। वास्तव में कई लोगों के लिए सेक्स इतना बड़ा मामला बन गया है कि वे इस विषय में किसी भी तार्किक चर्चा के काबिल नहीं रह गए हैं। उनके लिए सेक्स सम्बन्धी हर बात विकाराल रूप ले चुकी है।

मेरे एक ब्लॉग पर एक भारतीय मित्र से चर्चा हो रही थी। उस ब्लॉग में मैंने लिखा था कि सेक्स के बारे में हमें बच्चों से भी, उनकी आयु के लिहाज से उपयुक्त तरीके से, खुलकर बात करनी चाहिए। मैंने उससे कहा कि मैं अपनी बेटी से भी सेक्स सम्बन्धी बात करूँगा। मैं चाहूँगा कि मेरी बेटी को अपना साथी चुनने की पूरी आज़ादी मिले और वह किसके साथ सोना चाहती है, इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करे। यह सिर्फ और सिर्फ उसका चुनाव होगा कि कौन उसके बिस्तर पर सोएगा- इसमें मेरा कोई दखल नहीं होगा!

उसके जवाब से मैं स्तब्ध रह गया। उसने कहा, "लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ पोर्न (अश्लील) विडिओ नहीं देख सकता!"

दरअसल मैं मानता हूँ कि आप में से ज़्यादातर लोग चकरा गए होंगे और ताज्जुब कर रहे होंगे कि वास्तविक मुद्दे से इस बात का क्या ताल्लुक हो सकता है। लेकिन उसकी इस बात पर आगे सोचते हुए मैं कह सकता हूँ कि इसके परिणामों को लेकर, उसके वक्तव्य के पीछे मौजूद विचारधारा को समझकर मैं भौंचक रह गया। मुझे समझ में आ रहा था कि सेक्स के बारे में चर्चा करते हुए वास्तव में इन लोगों का दिमाग इस ओर मुड़ जाता है।

वास्तव में, ऐसा कौन करेगा? कौन अपनी बेटी के साथ सोफे पर बैठकर अश्लील विडिओ देखेगालेकिन इसके बारे में बात ही कौन कर रहा है? जैसे "सेक्स के बारे में बातचीत करना" और "अश्लील विडिओ देखना" एक ही बात हो! भाई मेरे, दोनों में ज़मीन और आसमान का अंतर है!

मुझे लगता है कि लोग, खासकर धार्मिक लोग, सेक्स को लेकर बुरी तरह बंधनों में जकड़े होते हैं और सेक्स शब्द का भूले-भटके भी इस्तेमाल करते हैं तो खुद ही कामोत्तेजित हो उठते हैं! जैसे ही वे किसी नंगे शरीर को देखते हैं, उनकी सारी दमित कामुकता बाहर फूट निकलती है। नंगापन, सेक्स, सेक्स सम्बन्धी बातचीत, यह सभी बातें उन्हें बेकाबू कर देने के लिए पर्याप्त होते हैं! सेक्स के बारे में वे सामान्य रूप से बात ही नहीं कर पाते- और इसलिए सोचते हैं, कोई दूसरा भी ऐसा नहीं कर सकता!

लेकिन- आश्चर्य! जब मैं कहता हूँ कि मैं बेटी के साथ सेक्स के बारे में बात करूँगा तो कोई मैं उसे काम-मुद्राओं की जानकारी देने नहीं जा रहा हूँ, शरीर के कामोद्दीपक हिस्सों की तरफ उसका ध्यान नहीं खींचने वाला हूँ या कामोत्तेजक साहित्य की ओर संकेत नहीं करने वाला हूँ- उसके साथ बैठकर अश्लील फ़िल्में देखने की बात तो छोड़ ही दें! वह पिता और बेटी के बीच का एक सामान्य वार्तालाप होगा। मन की सामान्य इच्छाओं, कामनाओं के बारे में, शारीरिक प्रतिक्रियाओं के बारे में कि किस तरह ये बातें हमारे नैसर्गिक शारीरिक गुण है और इस संबंध में उसकी जिम्मेदारियों के बारे में भी।

सच तो यह है कि मुझे आशा है कि हम अपनी बेटी का लालन-पालन इस तरह करेंगे कि बाद में उसके साथ सेक्स के बारे में बात करते हुए हमें शर्मिंदा न होना पड़े। लेकिन हम अपनी बेटी के साथ अश्लील बातें करेंगे, यह सोच ही हमारे समाज की बीमारी का मूल कारण है, इसी ने उसे बीमार कर रखा है।

संकीर्ण मानसिकता के चलते नैसर्गिक इच्छाओं का दमन। सेक्स विषयक किसी शब्द के उच्चारण में भी गजब की हिचक! छोटा-मोटा विचार आने पर ही कामोत्तेजित हो जाना और फिर उसका अपराधबोध, इस विषय में भयंकर शर्म-इन्हीं सब बातों पर यह बीमार मानसिकता निर्भर होती है और इसे हम भारत में बहुतायत से देखते हैं। स्वयं का यौनिक दमन ही अंततः महिलाओं के विरुद्ध यौन दुराचार में तब्दील हो जाता है।

क्योंकि आप हर वक़्त यह सुनते हैं कि "अश्लील वीडियो देखें" जबकि मैं कह रहा हूँ कि "सेक्स के बारे में बात करें"।

अब गंदा दिमाग किसका है, आपका या मेरा?

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