भारत! सिर्फ कुँवारों पर नहीं! यौन क्रियाओं पर ही पूर्ण प्रतिबंध लगा दो – 26 मार्च 13

यौन क्रिया

पिछले दिनों भारत में एक बड़ा महत्वपूर्ण और दिलचस्प सवाल जेरेबहस था: किस उम्र के बाद संभोग कानून-सम्मत हो? ‘सहमति की उम्र’, जो कि इसके लिए एक प्रचलित उक्ति है, को कम करके 16 साल किए जाने के प्रयास चल रहे थे। यह उम्र दुनिया के कई देशों में भी इस हेतु मान्य है। लेकिन, आखिर में भारत की दकियानूस जमातों को विजय प्राप्त हुई जब सरकार ने निर्णय लिया कि अभी भी 18 साल से ऊपर की उम्र प्राप्त व्यक्तियों को ही यौन संबंध स्थापित करने की कानूनी मंजूरी होगी। सोशल नेटवर्क पर हुई ओजस्वी चर्चा में कुछ वक्त सक्रिय रहने के बाद अपनी डायरी में भी इस संबंध में कुछ दर्ज करना समीचीन होगा।

भारत में इससे संबंधित कानून के बारे में सबसे बड़ा विवाद यह है कि वह औरत को 18 साल की और पुरुष को 21 साल की उम्र से पहले विवाह की अनुमति नहीं देता। इस तरह यह सवाल खड़ा हो जाता है कि कहीं नए कानून-संशोधन विवाह-पूर्व यौन संबंधों को, जिन्हें धर्म, परंपरा, संस्कृति और समाज वर्जित मानता है, बढ़ावा तो नहीं देंगे?

जो लोग मेरे संपर्क में हैं और जो डायरियों में दर्ज मेरे विचारों को जानते हैं आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि मौका मिलने पर मैं किस प्रस्ताव के समर्थन में अपना वोट दूँगा-‘सहमति की उम्र’ को घटा कर 16 साल किए जाने वाले प्रस्ताव पर। क्यों? क्योंकि हम एक नए वक्त में रह रहे हैं, क्योंकि मैं आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) की परंपरा में विश्वास नहीं करता और सबसे ऊपर इस कारण कि यह पहले से ही सारे भारत में हो रहा है। जी हाँ, यह हो रहा है। कोई इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि यह समाज अभी भी इसे अनैतिक मानता है मगर युवा, अविवाहित जोड़े यौन संबंध स्थापित करते हैं-और अक्सर वे बहुत सारा यौन अनुभव प्राप्त करने के बाद काफी बड़ी उम्र में विवाह करते हैं।

एक सामान्य भारतीय आपसे यही कहेगा कि विवाह से पहले यौन संबंध गलत है और इसका कारण यह है कि वह समझता है कि यौन-क्रिया एक घिनौना कार्य है। धर्म ने उसे अपनी कामेच्छाओं पर शर्म करने की शिक्षा दी है, भले ही वह विवाहित क्यों न हों। और विवाह पूर्व तो यह पाप है ही। इसलिए एक ऐसा व्यक्ति जो कौलेज के अपने उन्मत्त दिनों में दोस्तों के साथ पार्टियों में आनंद लाभ करते हुए, अपने माता-पिता से दूर रहते हुए, या पहली बार सम्पूर्ण स्वतंत्रता का मज़ा लेते हुए अविवाहित होने के बाद भी यौन अनुभव प्राप्त कर चुका है, वह भी यही कहेगा कि ऐसा करना पाप है। उसके मन में इस कार्य के लिए अपराधबोध भी होगा मगर वह यह किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगा कि वह भी ऐसा कर चुका है। अगर आप फेरे लेते हुए जोड़ों से इसके बारे में जानकारी लेना शुरू करें तो पाएंगे कि हर भारतीय विवाह से पूर्व कुंवारा ही होता है!

और यह सब तब जबकि हमारी संस्कृति में आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) की प्रथा है। या कहीं इसी कारण तो नहीं? आखिर अगर पता चल जाए कि आपने बिना विवाह किए यौन संबंध स्थापित किए हैं तो आपकी शादी-बाज़ार में कीमत ही क्या रह जाएगी! एक छोकरीबाज़ को कौन अपनी लड़की देगा और एक बदचलन लड़की से कौन अपने बेटे का विवाह करना चाहेगा! आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) वाकई पाखंड के खुले प्रदर्शन के सिवा कुछ नहीं!

मेरे विचार में यौन भावना का विवाह से कोई संबंध नहीं है और नैतिकता का पैमाना मानते हुए उसे विवाह से जोड़ना व्यर्थ है। देश में ऐसे अनगिनत प्रकरण सामने आते रहते हैं जहां लोगों को उचित जोड़ा न मिल पाने के कारण विवाह नहीं हो पाते। इनके पीछे त्वचा का रंग, आर्थिक स्थिति, जाति या धर्म या और भी कई कारण होते हैं जिनके चलते माँ-बाप अपने बच्चों के विवाह हेतु उपयुक्त वर या वधू नहीं ढूंढ पाते। क्या यह सोचना उचित होगा कि ऐसे लोगों को जिनका किसी कारण विवाह नहीं हो पाया, यौन सुख से वंचित किया जा सकता है?

एक और बात: उनका क्या होगा जो विवाह करना ही नहीं चाहते? जो विवाह के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं? या जो सिर्फ उसी से विवाह करना चाहते हैं जिससे उन्हें प्रेम हुआ हो, ढ़ोर बकरियों की तरह बाज़ार में जो बिकने के लिए तैयार नहीं हैं, जैसा कि आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में अक्सर होता है? भारत एक स्वतंत्र देश है। विवाह की कानूनी उम्र 18 साल (या उससे ऊपर)है इसलिए आप ‘सहमति की उम्र’ को घटाकर 16 साल नहीं करते क्योंकि ऐसा करना आपको अनैतिक लगता है। इसलिए आप इसे जीवन में और आगे ले जाकर यह कानून भी बना देंगे कि जो अविवाहित है उसका किसी भी प्रकार का यौन संबंध वर्जित है। फिर तो आपको यही कानून बना देना चाहिए कि सिर्फ उसी व्यक्ति को यौन संबंध रखने की अनुमति होगी जो विवाहित है। लेकिन आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि भारत एक स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है! तो फिर युवा वयस्कों कि लिए भी इस नैतिक मूल्यों को लागू मत कीजिए!

भारतीय माता-पिता ऐसी नैतिक शिक्षा अपने बच्चों को देते हैं, यह सोचकर कि यह परंपरा से चली आ रही उचित और वैज्ञानिक समझ है। वे यह नहीं सोचते कि अपने जीवन में उन्होंने अपने माता-पिता की इन्हीं नैतिक और नियमबद्ध शिक्षाओं का कितना पालन किया।

व्यक्तिगत रूप से मैं ऐसी किसी विचारधारा को मंजूर नहीं कर सकता जो कहे कि आप तभी यौन संबंध बनाएँ जब आप विवाह कर लें। और इसलिए अपने बच्चों पर भी मैं उसे लागू नहीं होने दुंगा। मैं अपने बच्चों को स्वतंत्रता और समादर की शिक्षा दुंगा। मैं उन्हें किसी के साथ हमबिस्तर होने के नतीजों के बारे में समझाऊँगा और यह भी कि ऐसा करने पर आप पर क्या ज़िम्मेदारियाँ आयद होंगी और उनसे बचने के लिए कौन सी सावधानियाँ उन्हें रखनी चाहिए। लेकिन यह सिर्फ और सिर्फ उनका निर्णय होगा कि वे किसके साथ हमबिस्तर होना चाहते हैं और किसके साथ विवाह करना चाहते हैं।

हर माँ-बाप का दिल अपने बच्चों के लिए सिर्फ अच्छा ही सोचता है। लेकिन यह एक बिल्कुल व्यक्तिगत समझ होती है कि किसी के लिए ‘सबसे अच्छा’ क्या है। निश्चित रूप से मैं चाहूँगा कि काम प्रवृत्ति के बारे में मेरे बच्चों की एक नैसर्गिक समझ हो, स्वाभाविक रूप से उसके साथ चल सकने वाला एक जानकार और शिक्षित दृष्टिकोण हो और फिर सबसे बढ़कर अपने किए की ज़िम्मेदारी उठाने का साहस और स्वनिर्णय का आत्मविश्वास हो।

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