दोस्त के साथ अनौपचारिक सेक्स के बाद कैसे लग़ाम लगाएं अपनी उम्मीदों पर? – 26 फरवरी 13

यौन क्रिया

कल मैंने अपेक्षाओं और निराशाओं के विषय में लिखा था। अपेक्षाएं जीवन का एक ऐसा पहलू हैं जहां समस्याएं स्वयमेव पैदा हो जाती हैं। और हों भी क्यों न जब बात एक इंसान के दूसरे के साथ यौन संबंध जैसे नितांत निजी विषय की हो रही हो। यौन संबंध अपने विभिन्न चरणों में, इन संबंधों तक पहुंचाने वाले कारक एवं इनसे जुड़ी हुई हर बात अपेक्षाओं और निराशाओं को चुंबक की तरह अपनी तरफ आकृष्ट करती है। आज मैं एक खास तरह की अपेक्षा के बारे में लिख रहा हूं: उन सभी अकेले स्त्री और पुरुषों की बात जो किसी के भी साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद उसे प्रेमसंबंध में तब्दील करने की उम्मीद रखते हैं। इस समस्या के बारे में मैंने इतनी बार और इतनी कहानियां सुनी हैं कि मुझे यकीन हो चला है कि अधिकांश लोगों के साथ यह समस्या पेश आती है।

स्थिति कुछ इस प्रकार हैः ज़िंदगी के किसी मुक़ाम पर दो अकेले स्त्री – पुरुष मिलते हैं। असल में वे दोनों एक साथी की तलाश में हैं, जो उनका हमराज़ हो, प्रेमी हो, जिसके साथ वे अपनी बाकी बची सारी ज़िंदगी गुजार देना चाहते हैं। हर कोई यह चाहता है और यह स्वाभाविक भी है। ये दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं लेकिन वे दोनों ये भी जानते हैं कि शायद यह ‘वो’ नहीं है जिसके उन्हें तलाश है। बात कुछ बन नहीं रही है। न जाने क्यूं एक दूसरे के लिए वो ‘कशिश’ नहीं है दिलों में ! अलबत्ता कुछ हद तक देह का आकर्षण जरूर है। इसमें भी अचरज की कोई बात नहीं है – आखिरकार सेक्स मनुष्य की एक स्वाभाविक ज़रूरत है।

लिहाजा वे दोनों एक समझौता कर लेते हैं कि दोनों परस्पर शारीरिक संबंध बनाए रखेंगें लेकिन पति – पत्नी नहीं होंगें। किसी तरह की कोई शर्त नही, कोई बंदिश नही। वे दोनों एक दूसरे को चूमते हैं, आलिंगन करते हैं और सेक्स का भरपूर आनंद उठाते हैं। उन्हें इसमें आनंद मिलता है इसलिए गाहे – बगाहे देह की दूरियां खत्म हो जाती हैं। दोनों में से किसी एक को भी जब ज़रूरत होती है या यह संभव होता है, वे दोनों दैहिक समागम के लिए मिलते रहते हैं।

यहां तक तो सब कुछ ठीकठाक चलता है। असली समस्या इसके बाद शुरु होती है – जब कोई तीसरा शख्स बीच में आता है। यानी दोनों में एक व्यक्ति केवल एक नहीं, अन्य अनेकों के साथ ऐसे संबंध रखता है। या फिर दोनों में से किसी एक को अपना सच्चा साथी मिला जाता है। यही वो स्थिति है जब दूसरे को यकायक यह महसूस होने लगता है कि बात शारिरिक संबंध से आगे बढ़ जाती तो कितना अच्छा होता! अचानक ईर्ष्या, आक्रोश और निराशा पैर फैलाने लगते हैं।

अब अग़र यह व्यक्ति अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार है तो उसे यह अहसास अवश्य होगा कि चाहे अनजाने में ही सही, उसने एक नाजायज़ उम्मीद पाल ली थी। वह कुछ ज्यादा ही चाहता था। लेकिन अग़र वह इस तरह नहीं सोचता तो उसका निराश होना लाज़मी है। मैं तो कहूंगा कि अधिकतर मामलों में व्यक्ति को यह पता नही लगता कि कब ये भावनाएं और उम्मीदें उसके भीतर पलना शुरु हो गईं थीं। कब इस भावना ने आशा की किरण जगा थी कि उसे उसका हमदम मिल गया है।

दुर्भाग्य से कई मित्रताएं इसी मोड़ पर आकर खत्म हो जाती हैं क्योंकि दोनों पक्षों में से जिसे निराशा हुई है वह अपनी इस भावना और दोस्ती को एकसाथ एक ही पलड़े में नहीं रख पाता। सच तो यह है कि ऐसी भावना पैदा ही नहीं होनी चाहिए थी और अग़र वह अपने दिल की बात सामने वाले को बताता भी है तो उसका उत्तर यही होगाः ‘हमने यह तय किया था कि हम एक दूसरे के प्रेम में नहीं हैं। आपस में दोनों के अलावा कोई तीसरा भी हमारी ज़िंदगी में हो सकता है और हम दोनों ही अपने – अपने प्रेमी की तलाश जारी रखेंगें‘ यह बात समझ में आती है कि जिस व्यक्ति ने इतनी उम्मीदें बांध ली थीं और एक जुड़ाव सा महसूस करने लगा था, उसे इस सच्चाई से आघात लगना स्वाभाविक है। दुर्भाग्य से अकसर यही चोट और निराशा दोस्ती टूटने का कारण बनती है।

अतः यदि कभी आप स्वयं को इस स्थिति में पाते हैं या किसी के साथ शारीरिक संबंध रखते हैं और मन में कुछ अपेक्षाएं रखते हैं तो मेरी गुज़ारिश है कि यह समझने की कोशिश करें कि बात मात्र सेक्स संबंध तक तय हुई थी और अब क्योंकि आपकी भावनाएं बदल गईं हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि सामने वाला भी आपकी तरह सोचने लगे। अपने और दूसरे के लिए परेशानी खड़ी ना करें बल्कि ऐसी स्थिति में दोस्ती को बचाए रखने की कोशिश करें। मौजमस्ती के लिए सेक्स संबंधों की खातिर कोई और दूसरा आपको मिल जाएगा – लेकिन दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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