मैंने कल कहा था कि बुर्के में ढँकी-छिपी महिलाओं के साथ भी बलात्कार होता है। कोई नहीं कह सकता कि वे अंगप्रदर्शक कपड़े पहनती हैं। जबकि यह सिद्ध करता है कि कपड़े बलात्कार का कारण नहीं हैं, वहीं यह उस तथ्य को भी उजागर कर देता है, जिसे मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ: शरीर का वह अंग, जिसे आप हमेशा छिपाकर रखते हैं, आसपास के लोगों के लिए सेक्सी बन जाता है क्योंकि उसे वे अक्सर देख नहीं पाते। शायद यही बात थी जिसने एक व्यक्ति को यह कहने पर उद्यत कर दिया कि यौन उत्पीड़न पर काबू पाने के लिए भारत में नग्न कॉलोनियों की स्थापना कर देनी चाहिए!
भले ही इस राष्ट्रीय समस्या को सुलझाने के लिए यह कोई गंभीर सुझाव नहीं है, खासकर भारत जैसी यौन-कुंठित संस्कृति में। लेकिन उनकी यह बात एक सत्य की ओर इंगित अवश्य करती है और आज मैं इसी बात का विस्तार के साथ विश्लेषण करना चाहता हूँ।
किसी प्रासंगिक उदाहरण की खोज में मुझे विभिन्न पश्चिमी देशों के नग्न समुद्री बीचों की अपनी यात्राओं की याद आ गई, जहां नंग-धड़ंग पुरुष और महिलाएं घंटों धूपस्नान लेते रहते हैं। कुछ लोगों को यह हास्यप्रद लग रहा होगा कि अपनी यात्राओं में मैं ऐसे नग्न समुद्री बीचों पर भी जाया करता था, लेकिन मैं नहीं समझता कि यह कोई आश्चर्य की बात है। मैं सदा से ऐसे लोगों के साथ रहा हूँ, जो प्राकृतिक ढंग से जीने के हामी रहे हैं तथा अपने नंगे शरीर से अधिक प्राकृतिक और क्या होगा? और अब उस प्रश्न का मुख्य हिस्सा कि आप यह क्यों समझते हैं कि ऐसे बीचों पर जाना, जहां हर कोई नंगा है, एक अजीबोगरीब बात है? क्योंकि आप सोचते हैं कि वहाँ सभी पुरुष अपने उत्थित लिंगों के साथ आसपास लेटी नंगी औरतों की तरफ नज़रें गड़ाए घूर रहे होंगे!
अगर आप कभी ऎसी जगहों में गए हैं तो जानते होंगे कि इस बात में कोई सचाई नहीं है। मैं कई बार भीड़ भरे नग्न समुद्री बीचों पर गया हूँ, जहां पुरुष, महिलाएं, किशोर और बच्चे निस्संकोच घूमते दिखाई देते हैं। मैंने आज तक एक भी पुरुष नहीं देखा, जिसका शिश्न उन्नत दिखाई दे रहा हो।
क्यों? क्योंकि नग्नता एक बहुत स्वाभाविक बात है और जब सभी नग्न हैं तो फिर उसमें कोई विशेषता नहीं रह जाती, सारी कामुकता समाप्त हो जाती है कि शिश्नोत्थान हो जाए। इसीलिए ऐसे माहौल में किसी को यौन रूप से प्रताड़ित करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।
समाज ने इन जननांगो के साथ शर्म को इस तरह से संयुक्त कर दिया है कि कई देशों के लोग नग्न बीचों, आरामगाहों और कॉलोनियों के बारे में सुनकर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। उनके मुंह खुले के खुले रह जाते हैं, जब वे सुनते हैं कि दुनिया में ऐसी जगहें भी हैं जहां लोग शरीर पर बिना कुछ ओढ़े, आदमजाद नंगे घूमते-फिरते दिखाई देते हैं। जितना ही आप अपने शरीर को ढँकते हैं, जितना आप उसे छिपाते हैं उतना ही सेक्सी वह बन जाता है। कल को अगर आप अपने पैरों के नाखूनों को छिपाने लगें तो वह भी ज़्यादातर लोगों को उतना ही सेक्सी लगने लगेगा, जितना उन्हें ये जननांग आज लग रहे हैं।
जब आप किसी चीज़ को ढँक देते हैं तो लोग देख नहीं पाते कि उसमें कुछ भी विशेष नहीं है, उसमें कोई असाधारणता नहीं है, कि करोड़ों-अरबों पुरुषों और महिलाओं के पास वही है जो उनके पास है, वही शारीरिक अंग हैं, वही उत्तेजनाएँ, भावनाएँ और शारीरिक आवश्यकताएँ हैं। छिपाने पर उनकी यह उत्सुकता शांत नहीं होती।
अब यह मत समझिए कि अपनी बात को सही साबित करने के लिए मैं अपने आश्रम में नग्न लोगों का समाज स्थापित करने जा रहा हूँ। लेकिन संभव है भविष्य में किसी समय उस टिप्पणीकार की सलाह पर सरकारें खुद नग्न कालोनियों की स्थापना करें, जिससे यौन अपराधों पर रोक लगाई जा सके। जब तक यह नहीं होता तब तक भारतीयों को अपने भीतर बहुत से बदलाव लाने की जुगत करनी होगी!
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