अपने हाथ की मदद लें – आपको हस्तमैथुन करते हुए अपराधी क्यों महसूस नहीं करना चाहिए! 3 जून 2015

यौन क्रिया

परसों मैंने आपको काम-वासना की अपनी परिभाषा संक्षेप में बताई थी और यह भी बताया था कि क्यों मैं समझता हूँ कि वह एक सुखद और अच्छी चीज है। उसके बाद कल मैंने बताया कि बढ़ती हुई बलात्कार की घटनाओं का कारण अश्लील फ़िल्में क्यों नहीं हैं-शायद आपमें से कुछ लोगों को इससे आश्चर्य हुआ होगा। वह सब सिर्फ काम-वासना और सेक्स के बारे में मैंने लिखा था-लेकिन आज मैं यौन तुष्टि प्राप्त करने के एक और तरीके के बारे में लिखना चाहता हूँ-हस्तमैथुन।

वास्तव में मेरे विचारों पर मुझे एक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। मैंने ज़िक्र किया था कि अपनी काम-वासना के शमन के लिए सबके पास विकल्प मौजूद होते हैं। एक व्यक्ति ने प्रतिक्रिया व्यक्त की: 'मैं नहीं मानता कि काम भावना बुरी चीज़ है। मैं सहमत हूँ कि यह एक नैसर्गिक अनुभूति है-लेकिन हस्तमैथुन नैसर्गिक नहीं है! वह पूरी तरह अप्राकृतिक है!'

दुर्भाग्य से यह गलत धारणा सर्वत्र व्याप्त है और सिर्फ भारत में ही नहीं कुछ अन्य देशों में भी। जब किशोर-किशोरियों को यौनेच्छा होने लगती है और वे उसे खुद अपने शरीर के ज़रिए जाँचना-परखना चाहते हैं, तभी से उन्हें ये झूठी बातें बता दी जाती हैं।

लड़कों को डराया जाता है कि जब भी उनका वीर्य स्खलित होता है, वे अपने जीवन की ऊर्जा (जीवनी शक्ति) का एक अंश खो बैठते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हर बार जब आप हस्तमैथुन करते हैं, अपने जीवनकाल का कुछ समय कम कर लेते हैं। अर्थात, ज़्यादा हस्तमैथुन करने पर आप लम्बी उम्र तक जी नहीं सकते। कुछ दूसरे अभिभावक अपने लड़कों को बताते हैं कि हस्तमैथुन से अंधत्व आता है। ये बच्चे जब किसी अंधे व्यक्ति को देखते होंगे तो पता नहीं क्या सोचते होंगे! 🙂

हमेशा लड़कियों से कहा जाता है कि अपने शरीर को न छुओ। खुद अपने शरीर के साथ कैसे सम्बन्ध हों, इस बारे में उन्हें अजीबोगरीब बातें सिखाई जाती हैं। जबकि लड़कों के लिए अधिक यौनेच्छा होना पुरुषत्व की निशानी माना जाता है, लड़कियों में उसे शर्मनाक और पाप माना जाता है। अपनी जननेन्द्रियों के बारे में कोई भी बात करना उनके लिए शर्म की बात होती है और ऐसा करना अपराध माना जाता है, यहाँ तक कि अपने मासिक धर्म के बारे में भी-अब आप ही बताइए, ऐसे माहौल में हस्तमैथुन कहाँ से स्वीकार्य होगा? जब माताएँ अपनी बच्चियों को सेक्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बतातीं, सिवा इसके कि 'जो कुछ करना होगा, पति कर लेगा'? जब लड़कियाँ टैंपोन्स का प्रयोग नहीं करतीं या योनि में डालकर ग्रहण की जाने वाली दवाओं का प्रयोग नहीं करतीं क्योंकि वे अपने गुप्तांगों को छूना नहीं चाहतीं कि कहीं उनकी कौमार्य भंग न हो जाए?

तो मैं जानता हूँ कि मेरे लिखने से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन हो सकता है, कुछ लोगों को इसमें सोचने-समझने के लिए थोड़ी-बहुत वैचारिक खुराक मिल जाए: हस्तमैथुन संसार का सबसे अधिक नैसर्गिक काम है! आप खुद आसपास के जानवरों को ध्यान से देखिए-वे हर समय यह सब करते रहते हैं! हमारे बगीचे में कुछ बंदर हैं, जो आपस में हर समय सेक्स करते रहते हैं और आसपास कोई न भी मिले तो भी, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता- वे अपने लिए राहत का उपाय ढूँढ़ ही लेते हैं!

मैं मानता हूँ कि हम बंदरों से कुछ अलग हैं-हालाँकि, जितना दिखाई देते हैं, उतना अलग भी नहीं हैं-लेकिन हस्तमैथुन मनुष्यों के लिए भी पूरी तरह प्राकृतिक है! यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि अगर कभी-कभी आप अपने कामोन्माद की तुष्टि स्वयं कर लेते हैं तो उससे कोई शारीरिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा नहीं होतीं। इससे आप जल्दी नहीं मरने वाले और न ही आप अंधे होंगे। इसके विपरीत, यौनेत्तजना और उसका नैसर्गिक शमन आपके शरीर में बहुत से लाभप्रद हार्मोन्स, एंड्रोर्फ़िन्स आदि, भी पैदा करते हैं और उससे आपको सिर्फ विश्राम ही नहीं मिलता या तनाव ही दूर नहीं होता। उसके बाद आप अपने काम में अधिक एकाग्र हो सकते हैं, आपकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और आप अधिक प्रसन्न महसूस करते हैं, क्योंकि आपने अपनी एक मूलभूत इच्छा और शारीरिक ज़रूरत पूरी की है!

आपकी जानकारी के लिए एक बात और बता दूँ कि आप मुझसे कितना भी कहें कि आप न तो हस्तमैथुन करते हैं और न ही कभी किया है, हम सब असलियत जानते हैं-यह काम सब करते हैं और सबने कभी न कभी यह किया होता है! हाँ, उसके लिए सबको अपराध-बोध अलग-अलग मात्रा में होता है!

स्वाभाविक ही, अगर आप ऐसे ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जो आपको इस बात की सजा देता है कि आप अपने आपको अपने प्रयासों से खुश रख पा रहे हैं, तो यह आपकी मर्ज़ी है। ठीक है, अपने आपको पापी समझिए-लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि अगर आप उस पर विश्वास न करने का निर्णय कर लें तो आपका जीवन अधिक सुखद हो जाएगा!

ऐसा जीवन, जिसकी डोर पूरी तरह आपके हाथों में होगी – अक्षरशः!

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