अमीर होना और सेक्स की इच्छा – इतना आसान भी नहीं है – 25 अगस्त 2014

यौन क्रिया

आज मैं पुनः एक बार उन दो विषयों पर लिखना चाहता हूँ, जिनकी अधिकांश आध्यात्मिक लोग सांसारिक सुख कहकर निंदा करते हैं: अर्थात, पैसा और सेक्स। मैं दोनों को ही बुरा नहीं मानता-लेकिन दोनों के बीच तालमेल रखने की दिक्कतों के बारे में लिखना ज़रूरी समझता हूँ।

साल के अधिकांश समय हम आश्रम में ही विभिन्न कार्यशालाएं चलाते हैं। योग कक्षाएँ होती हैं, ध्यान, आयुर्वेदिक मालिश और आयुर्वेदिक उपचार होता है और इसके अलावा आयुर्वेद का अभ्यास-सत्र भी हम चलाते हैं। एक बार एक महिला हमारी कार्यशाला में आई और एक या दो सप्ताह के बाद यशेंदु को, जो उस कार्यशाला को चला रहा था, एक अजीबोगरीब एहसास हुआ। यह महिला योग-कक्षाओं के अलावा उससे कुछ अतिरिक्त भी चाहती थी!

आपको एहसास होगा कि ऐसे मामलों में शुरू में आपको लगता है कि आप ही कुछ बेकार की कल्पनाएँ कर रहे हैं लेकिन सामने वाला क्रमशः अपनी चेष्टाओं में कुछ ज़्यादा ही स्पष्ट होता जाता है। खैर, यशेंदु समझ तो गया लेकिन इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करना चाहता था। महिला की इच्छा थी मगर यशेंदु की रुचि नहीं थी। अंत में वह इतना खुल गई कि उसकी विदाई तक यशेंदु आंतरिक द्वंद्व में फँस गया था: महिला ने लगभग स्पष्ट रूप से कह दिया कि अगर वह उसके साथ जीवन और शरीर का 'वास्तविक' आनंद प्राप्त कर सके तो वह आश्रम को और भी अधिक दान दे सकती है और आश्रम के दूसरे उपक्रमों के लिए भी आर्थिक मदद कर सकती है।

वह समझ गया कि उसे 'वास्तविक' आनंद प्रदान करने का क्या तरीका हो सकता है। वह अकेली थी, वह भी 'अकेला' था-लेकिन उस महिला में उसकी कोई रुचि नहीं थी!

अपने उपक्रमों के लिए आखिर हमें उस महिला की दुआएँ और शुभकामनाएँ ही मिल पाईं। स्वाभाविक ही उन्हें भी हमने पूरी खुशी और सद्भावना के साथ ग्रहण किया-हालाँकि दान की बड़ी राशि भी हमें दुखी तो नहीं ही करती!

अरे हाँ, लेकिन अब मुझे फिर से गलत मत समझ बैठिए: मैं इस महिला को किसी भी बात के लिए कोई दोष या उलाहना नहीं दे रहा हूँ।

इस बात को सोचते हुए यही कहना चाहता हूँ कि अगर वह महिला थोड़ा-बहुत शारीरिक सुख चाह रही थी तो इसमें कुछ भी गलत नहीं था। यह बहुत स्वाभाविक बात है; आखिर, हम सभी की शारीरिक आवश्यकताएँ होती ही हैं। वह महिला भले ही किसी बड़े 'रोमांचकारी प्रेम' तक न भी पहुँचती तो भी, मेरे खयाल से, छुट्टियों में थोड़ा-बहुत इश्क फरमाना कोई गुनाह तो नहीं है।

एक पैसे वाली महिला होने के नाते उसने उस तरह से कोशिश की, जिसमें उसे सफलता की संभावना नज़र आई-लेकिन हाय! काम नहीं बना! भले ही अब हम उस बीती हुई बात पर सोचें-विचारें और यशेंदु को उलाहना दें कि उसे चैरिटी के लिए इतना त्याग तो करना ही चाहिए था! 😉

%d bloggers like this:
Skip to toolbar