स्कूलों में बच्चों को ईश्वर और धर्म से क्यों प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए – 25 अगस्त 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

यदि आपने कल का ब्लॉग पढ़ा है तो आपको पता चल गया होगा कि किस तरह हम बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाते हैं और आजकल उनसे मिलकर विभिन्न विषयों पर चर्चा भी कर रहे हैं। स्वाभाविक ही कई विषयों में एक विषय नास्तिकता का भी होता है, या कहें कि हम उनके सामने प्रदर्शित करते हैं कि कैसे धर्म कई प्रकार से गलत बात करता है, यहाँ तक कि कई प्रकार से हमें हानि पहुँचाता है। इससे उन्हें एक नए नजरिए से परिचित होने का मौका मिलता है और जहाँ बहुत से स्कूल कई तरह से बच्चों को धार्मिक और पारंपरिक शिक्षा प्रदान करते हैं, मेरा मानना है कि धर्म का स्कूलों में कतई कोई स्थान नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से बहुत से शिक्षकों का नजरिया इससे बिल्कुल विपरीत होता है और बहुत सी पाठ्य पुस्तकें भी धार्मिक शिक्षा का समर्थन करती प्रतीत होती हैं!

पिछले साल हमने नोटिस किया कि हमारे स्कूल की कई पाठ्य पुस्तकों में कई बार ईश्वर का ज़िक्र आता है। विशेष रूप से 'नैतिक शिक्षा' या मॉरल साइंस नामक विषय की पुस्तकों में तो सब कुछ यही है कि क्या ईश्वर स्वीकार करेगा और क्या नहीं तथा क्या वह चाहता है कि आप करें या न करें। यही कारण रहा कि इस साल हमने अपना प्रकाशक ही बदल दिया है!

अब हमने उन्हीं पुस्तकों को रखा है जिनमें ईश्वर का ज़िक्र कम से कम आता है- और हमने अपने शिक्षकों से भी कह रखा है कि वे उन पाठों को को छोड़ दें। उदाहरण के लिए ‘हिन्दी’ विषय में एक और ‘अंग्रेज़ी’ में भी एक प्रार्थना है। आम तौर पर इन प्रार्थनाओं को विद्यार्थियों को कंठस्थ करने के लिए कहा जाता है और परीक्षाओं में उन्हें मौखिक सुनाने के लिए कहा जाता है। इसी तरह एक पाठ का एक पैरा पूरी तरह हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि हमारे दिन का एक हिस्सा सिर्फ प्रार्थनाओं और पूजा-अर्चना में खर्च किया जाना चाहिए और यह भी कि अच्छे बच्चे रोज़ ईश्वर की प्रार्थना करते हैं।

मैं नहीं जानता कि ऐसी पुस्तकें भारत में उपलब्ध हैं या नहीं, जिनमें इन बातों का ज़िक्र नहीं होता। अगर मुझे शिक्षकों से पाठ्य पुस्तकों के कुछ भागों को न पढ़ाने के लिए न कहना पड़े तो मुझे अच्छा लगेगा! बल्कि अगर उनमें धार्मिक गुरुओं और बाबाओं और उनकी कारगुजारियों के विषय में आलोचनात्मक लेख या पाठ हो तो मुझे और खुशी होगी! यदि मेरा कोई नास्तिक मित्र प्राथमिक कक्षाओं के लिए उपयुक्त ऐसी पाठ्य पुस्तकों के बारे में जानता हो तो मुझे भी उनके बारे में जानकर प्रसन्नता होगी!

अपने बच्चों को मैं वे संभावनाएँ उपलब्ध कराना चाहता हूँ जो उन्हें अन्यथा तथा अन्यत्र उपलब्ध नहीं होतीं: पढ़ते-लिखते हुए और सीखते हुए किसी विषय का आलोचनात्मक दृष्टि से अध्ययन करना, प्रश्न पूछना, दिमाग खुला रखना और चीजों को बिना किसी धार्मिक पूर्वाग्रहों के जानने-समझने की कोशिश करना। दरअसल इन बच्चों के मस्तिष्क को आस्था और परंपरा के बादलों ने आच्छादित कर रखा है और मेरा विश्वास है कि एक न एक दिन ये काले बादल अवश्य छँटेंगे और वे अपने चारों ओर देख सकेंगे और अलग तरह से सोच-विचार कर सकेंगे।

तब वे यह समझ पाने में समर्थ हो सकेंगे कि ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है और आप बिना उसकी दैनिक पूजा-अर्चना किए भी एक अच्छे इंसान हो सकते हैं। वे इस बात को समझेंगे कि नैतिक व्यवहार सिर्फ धार्मिक लोगों की बपौती नहीं है! एक दिन ये बच्चे यह देखने में सक्षम होंगे कि अपनी प्रगति के लिए वे ईश्वर की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं हैं।

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि हमारे रेस्तराँ की शुरुआत और उसके हमारे स्कूल को आर्थिक सहारा देने लायक हो जाने के बाद हम स्कूलों से जुड़े हुए और भी कई रेस्तराँ खोलने की योजना बना रहे हैं। ये स्कूल पूरी तरह मुफ्त होंगे- और वे भी इसी स्कूल की तरह बच्चों में शुरू से ही तर्कवाद को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य सामने रखकर ही खोले जाएंगे।

इस स्वप्न को यथार्थ में परिणत करने के लिए हमें कई तर्कवादी शिक्षकों की भी आवश्यकता होगी। अन्यथा बच्चों को विज्ञान और तर्कशास्त्र समझाना कठिन होगा और यह बताना भी मुश्किल होगा कि धर्म और आस्था में तर्क और विज्ञान का अभाव होता है। क्योंकि धार्मिक शिक्षक स्वयं भी उन्हीं बातों में आस्था रखने वाले होंगे!

फिलहाल हमारे संसाधन सीमित हैं और चाहते हुए भी मैं एक साथ इतने सारे कदम नहीं उठा सकता, लेकिन समय के साथ भविष्य में मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चों को यह शिक्षा देने की दिशा में कि वे ईश्वर, धर्म और परम्पराओं के पीछे न भागें, मैं बहुत दूर तक की यात्रा करने के लिए सन्नद्ध हूँ।