बच्चों को स्कूल भेजने की सही उम्र क्या है? – 31 मार्च 2014

विद्यालय

पिछले हफ्ते मैंने अपने ब्लॉग का समापन यह कहते हुए किया था कि: ‘हम सब इंसान हैं’। लेकिन जब मैं सिर्फ भारत के ही नहीं, दुनिया भर के स्कूलों की ताज़ा स्थिति पर गौर करता हूँ तो मुझे एहसास होता है यह बात हम पूरी तरह भूल चुके हैं। बच्चों को शिक्षित करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि वे भी हाड़-मांस से निर्मित इंसान हैं। हम उन्हें छोटे-छोटे रोबोट समझते हैं, जिनके भीतर हम कुछ ‘इनपुट’ ‘सेव’ कर लेते हैं और चाहते हैं कि जब हम ‘कमांड’ दें तो वह उसे ‘रिपीट’ कर दे! और यह बहुत छोटे बच्चों के साथ ही शुरू हो जाता है।

निश्चय ही, दुनिया के कई देशों के बच्चों को देखने और वे क्या पढ़ रहे हैं, अपने स्कूल के बारे में वे क्या कहते हैं, यह जानने के बाद मेरे मन में यही विचार आता रहा है। अपने बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने की उम्र धीरे-धीरे घटती चली जा रही है जबकि नन्हे-नन्हे बच्चों पर स्कूल जाने का और पढ़ाई का दबाव बढ़ता जा रहा है।

चलिए, हम नजदीक से देखें कि आजकल बच्चे किस उम्र में स्कूल जाना शुरू करते हैं। भारत में अपने बच्चों को नर्सरी में भेजने की उम्र है तीन साल। यह वह जगह होती है, जिससे अपेक्षा की जाती है कि वहाँ बच्चों को खेल-खेल में थोड़ा-बहुत लिखना-पढ़ना सिखाया जाएगा। सामान्यतः यह बड़ी अच्छी बात लगती है और ‘खेल-खेल में लिखना-पढ़ना’ बड़ा आदर्श विचार प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है कि चीज़ें हमेशा वैसी नहीं होती जैसा उन्हें प्रस्तुत किया जाता है।

इन बच्चों की देखभाल करने के लिए कम पढे-लिखे और अक्षम कर्मचारी रखे जाते हैं, जिन्होंने बच्चों को ‘खेल-खेल में लिखना-पढ़ना’ सिखाने का कोई विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया होता। वे नहीं जानते कि इस उम्र का बच्चा क्या सीख सकता है और उन्हें वह कैसे सिखाया जाता है। वे इस बात से भी अनभिज्ञ होते हैं कि कुछ चीज़ें इस उम्र के बच्चे नहीं सीख सकते।

तो ये नन्हें बच्चे वहाँ बैठे रहते हैं और उनसे कहा जाता है कि लिखो-और कुछ बच्चे लिख पाते हैं और दूसरे सभी बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं। ये चंचल बच्चे यूं ही बैठे-बैठे बोर होते रहते हैं क्योंकि कुछ और करने के लिए होता ही नहीं। इस वातावरण में उन्हें नई बातें सीखने का कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता और निश्चय ही यह वातावरण सीखने में सहायक तो होता ही नहीं है। समय का अपव्यय होता है और बच्चे वहाँ ऊब जाते हैं और दुखी रहते हैं।

लेकिन जहां पढ़े-लिखे, बेहतर शिक्षक मौजूद हैं और वातावरण भी पढ़ाई-लिखाई के लिए उपयुक्त है वहाँ भी मैं नहीं समझता कि तीन साल की कच्ची उम्र में अपने बच्चे को पढ़ाई के लिए भेजना उचित है। यह बहुत जल्दी होगा-यह उम्र पढ़ने-लिखने के लिहाज से बहुत कम है।

हम अपने नन्हे बच्चों पर इतना बोझ क्यों रखना चाहते हैं, हमें इतनी कम उम्र में अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की उतावली क्यों है! क्या रंगों, आकारों के बारे में और मामूली जोड़ना-घटाना हम उन्हें घर पर ही नहीं सिखा सकते? या क्या हम सिखाने की सारी ज़िम्मेदारी स्कूलों और शिक्षण संस्थाओं पर थोप देना चाहते हैं? क्या वास्तव में हम अपने काम से मुंह नहीं मोड़ रहे हैं और उसे दूसरों पर नहीं डाल रहे हैं?

बच्चे के साथ ज़्यादा समय गुज़ारना थकाने वाला हो सकता है। उनके साथ खेलते हुए उन्हें सिखाते जाना और लगातार पूछे जाने वाले उनके प्रश्नों के जवाब देना, छोटी-छोटी बातों के कारणों या नतीजों के बारे में उन्हें समझाना वाकई आपकी सारी शक्ति सोख सकता है। लेकिन इसका प्रतिफल बहुत बहुमूल्य होता है, बेहद आकर्षक और शानदार!

मुझे इस बात का दुख है कि आजकल के बच्चों को खेलने का वक़्त बहुत कम मिल पाता है। उनके पास वे अबोध स्वतन्त्रता वाले साल अब नहीं हैं, जब उन्हें किसी समय-सारिणी का पालन नहीं करना पड़ता था। और यह इन ‘खेल-खेल में पढ़ाई’ वाले सालों के बाद भी जारी रहता है-लेकिन उसके बारे में कल बात करेंगे।

आज के लिए आखिर में बस इतना ही कि हमें अपने बच्चों को इतनी छोटी उम्र में शैक्षणिक संस्थानों में धकेल देने की आवश्यकता नहीं है। अगर संभव है तो अपने बच्चों को अपने पास घर में ही रखिए-यह आपके और उनके लिए एक कीमती समय साबित होगा!

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