बच्चे को किसी निजी विद्यालय में दाखिल कराने की जटिल और तकलीफदेह प्रक्रिया! 24 मार्च 2014

विद्यालय

गर्मियां शुरू हो रही हैं और स्कूल का यह साल समाप्ति की ओर है. लेकिन इससे पहले कि बच्चे मई में अपनी छुट्टियों का आनंद ले सकें, उन्हें वार्षिक परीक्षाओं में बैठना होगा. गरमी की छुट्टियों के बाद पढ़ाई का अगला सत्र शुरू होगा और भारत भर में अभिभावक बच्चों को किस स्कूल में भेजा जाए इस बात पर चर्चा शुरू कर चुके होंगे. या शायद यह कहना उचित होगा कि वे तो सिर्फ बच्चों के आवेदन-पत्र स्कूलों में जमा कराएंगे और स्कूल बच्चों को चुनेंगे. इस नई प्रवृत्ति के बारे में आपको थोड़ा सा बताता चलूँ, जिसे मैं पढ़ाई के मामले में एक खतरनाक नज़रिये के रूप में देखता हूँ.

जब आप अपने बच्चे को किसी स्कूल में भर्ती कराना चाहते हैं तो आम तौर पर आपको भर्ती के लिए खुलने वाले कुछ खास दिनों में ही स्कूल जाना होता है. आप घर के आसपास के किसी अच्छे स्कूल का चुनाव करते हैं तो आपको उनके प्रवेशपत्र और पुस्तिकाएं खरीदनी होंगी, जिनमें उस स्कूल की फीस, छूट-प्रस्ताव और सुविधाओं की जानकारियाँ दी गई होंगी. स्कूल में भर्ती की पूरी प्रक्रिया का विवरण उसमें होता है. अगर आप निर्णय कर भी लें कि अपने बच्चे को अच्छी पढ़ाई मुहैया कराने के उद्देश्य से आप उनकी अनाप-शनाप फीस अदा करेंगे तो भी आपको इस प्रक्रिया से गुज़रना ही पड़ेगा.

यह प्रक्रिया काफी लम्बी होती है और विद्यार्थी के साथ-साथ उसके अभिभावकों का भी इंटरव्यू लिया जाता है. फिर एक तरह का लकी-ड्रा निकाला जाता है क्योंकि उस स्कूल में पढ़ने के आकांक्षी और इंटरव्यू में सफल विद्यार्थी ज़्यादा होते हैं और सीटें कम! लेकिन इतने से ही आपका बच्चा चुन ही लिया जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है, लकी ड्रा में शामिल होने के लिए अभिभावकों के रूप में आपका भी इंटरव्यू में सफल होना आवश्यक होता है. क्या आप उस स्कूल के लायक हैं, यह भी जांचा-परखा जाता है!

जी हाँ, इस तरह स्कूल के साथ आपके चार या उससे छोटे बच्चे का पहला परिचय एक प्रतिस्पर्धा के साथ शुरू होता है, अर्थात, आपने और आपके बच्चे ने दूसरे बच्चों से ज़्यादा और उस स्कूल द्वारा निर्धारित स्तरीय बुद्धिमानी का परिचय दिया है या नहीं! क्या आप और आपका बच्चा पर्याप्त चुस्त और चतुर है?

बच्चों की भर्ती के मामले में वे उनके अभिभावकों में क्या देखना चाहते हैं? क्या वे बच्चे के होमवर्क में मदद कर पाएंगे? क्या उनके पास कोई डिग्री है? अगर स्कूल में शिक्षक की बात बच्चे को समझ में न आए तो क्या वे घर पर बच्चे को पढ़ा पाएंगे? या यह सिर्फ पैसे का मामला है कि वे स्कूल को कितना चन्दा दे पाते हैं? तो फिर यह कैसे होता है कि प्रभावशाली लोगों के बच्चों को लकी ड्रा में शामिल नहीं किया जाता बल्कि अक्सर उनका दाखिला आसानी के साथ, इस मुश्किल प्रक्रिया से गुज़रे बगैर हो जाता है?

यह सब उच्चवर्गीय पक्षपात का मामला लगता है और मैं आपको एक और बात बताता हूँ: ये स्कूल खुले आम यह घोषणा करते हैं कि उनका स्कूल सबसे चुस्त, व्यवहारकुशल, बुद्धिमान और भविष्य के नेताओं का स्कूल है!

सबसे भयावह बात यह है कि यह एक सामान्य नियम बनता जा रहा है. सभी स्कूलों के लिए यह एक मानक तरीका बन चुका है. कल मैं आपको बताऊंगा कि क्यों मैं इसे गलत समझता हूँ, क्यों मैं समझता हूँ कि यह भारत की समस्याएं बढ़ाने वाला सिद्ध होगा और अंत में यह कि इसी कारण मुझे अपने स्कूल में किये जा रहे काम पर अधिक से अधिक विश्वास होने लगता है.

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