धन-केन्द्रित समाज में अपने बच्चों को सभ्य इंसान बनाना – 1 अप्रैल 2014

विद्यालय

कल मैंने संक्षेप में बताया था कि छोटे बच्चों को स्कूल जैसी कक्षाओं में बैठकर समय बरबाद करने की जगह सिर्फ अपने मन-मुआफिक खेलने के लिए ज़्यादा समय मिलना चाहिए। मेरे विचार में अगर हम अपने लड़के-लड़कियों को छोटी उम्र में स्कूल भेजते हैं तो वास्तव में हम उनके बचपन के एक हिस्से को उनसे छीन लेते हैं। यही हम तब कर रहे होते हैं, जब उनके दिन को व्यस्त समय-सारिणी में जकड़ देते है और उन्हें स्वतन्त्रता पूर्वक खेलने का मौका ही नहीं देते। दुर्भाग्य से यह ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण चलन है, जो कम होने की जगह आजकल बढ़ता ही जा रहा है।

भारत में मैं इसे जर्मनी के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा महसूस करता हूँ लेकिन सबसे ज़्यादा यह चलन अमरीका में देखा जाता है। जब हम वहाँ थे हम ऐसी माँओं और बच्चों से मिले जिन्होंने बताया कि बच्चों को पूरे सप्ताह में पल भर का भी मुक्त समय प्राप्त नहीं हुआ। सारा दिन स्कूल होता है, जो सुबह जल्दी शुरू हो जाता है और देर शाम तक चलता रहता है, जब उनके अभिभावक भी काम से लौट रहे होते हैं।

बच्चे अपना नाश्ता और दोपहर का भोजन स्कूल में ही करते हैं, वहीं होमवर्क भी करते हैं और स्वाभाविक ही सारे स्कूल की पढ़ाई भी इसी दौरान होती रहती है। उसके बाद ‘फुर्सत’ की गतिविधियां, जिनमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कि जाती है, भी होती रहती हैं। शिक्षकों और पेशेवर प्रशिक्षकों की निगरानी में बच्चों को खेलों का प्रशिक्षण लेना होता है।

एक या दो दिन, जब स्कूल जल्दी छूट जाता है, अभिभावक सुनिश्चित करते हैं कि बच्चों को बोर होने का मौका ही न मिले: स्पोर्ट्स क्लब, कोई वाद्य-यंत्र सिखाने वाला स्कूल और कुछ नहीं तो अभिभावकों द्वारा आयोजित डेट्स का खेल-वे उन्हें किसी न किसी खेल या अध्यवसाय में लगाए रखते हैं। बच्चे बोर तो नहीं होते मगर उन्हें अपना उन्मुक्त समय भी नहीं मिल पाता। यहाँ तक कि रविवार के दिन भी चर्च स्कूल होता है-एक और सक्रियता से भरा दिन।

उनके पास ऐसा कोई समय नहीं होता जब वे अपने मन की करने की सोच भी सकें। यहाँ तक कि सामाजिक कार्यक्रम भी किसी न किसी के निरीक्षण और निर्देशन में ही होते हैं और बच्चों के पास अपने मन से कुछ करने का बहुत सीमित समय और अवसर होता है। मेरा मानना है कि इस माहौल में दरअसल उनकी स्वतन्त्रता, कल्पनालोक में विचरण करने की उनकी शक्ति और अपना समय अपनी मर्ज़ी के अनुसार व्यतीत करने की क्षमता बाधित होती है।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि इन गतिविधियों को बच्चे पसंद नहीं करते। वे बांसुरी बजाना या बास्केट-बाल खेलना और यहाँ तक कि होमवर्क करना या दूसरी गतिविधियां भी पसंद कर सकते हैं। नाटक शिविर और पुस्तकालयों में समय बिताना भी। लेकिन इन सभी गतिविधियों का आनंद लेने का निर्देश बाहर से, दूसरों द्वारा दिया जा रहा है।

हम बच्चों को इतना अवसर, इतनी आज़ादी क्यों नहीं देते कि वे खुद निर्णय करें कि वे क्या करना चाहते हैं? उनके सामने कोई वाद्य या कोई किताब तभी रखें जब वह खुद चाहे। हम इस बात की ज़िद क्यों करें कि उन्हें खेल भी समय-सारिणी के अनुसार ही खेलना है, जब कि वे उस वक़्त घर में अपने बिस्तर पर लेटे रहना चाहते हैं? क्या हम अपने बच्चों को खेलों और अपनी मर्ज़ी के अनुसार किसी भी दिशा में दुनिया की पड़ताल करने के बारे में जानकारी और उनसे उपजने वाली संभावनाओं से अवगत नहीं करा सकते?

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह मज़ाक लग रहा होगा लेकिन मैं समझता हूँ कि हम अपने बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं। जिम्मेदारियों से मुक्त वह समय, जिसे वे अपनी मर्ज़ी से मनचाहा काम करने में व्यतीत कर सकते थे, उस पर डाका डाल रहे हैं। अगर आप उन्हें इस उन्मुक्त समय के एहसास का आनंद उठाने का मौका नहीं देंगे तो फिर वे अपने जीवन में सुकून के साथ लेटकर यह विचार कैसे कर पाएंगे कि वे आगे भविष्य में क्या करना चाहते हैं?

अपने दिमाग से सोचकर निर्णय लेने की जगह वे आँख मूंदकर समाज के बताए रास्ते पर चलेंगे क्योंकि वे दूसरों द्वारा संचालित और नियंत्रित गतिविधियों के अभ्यस्त होंगे! ऐसे समाज के सुसभ्य सदस्य, जो चाहता है कि लोग कमाएं, खाएं और वही सोचें और करें, जो दूसरे सभी सोचते और करते हैं। वे उन चीजों को खरीदेंगे, जो विज्ञापन उन्हें बताएँगे क्योंकि बचपन से उन्होंने वही किया है, जो दूसरों ने उनसे कहा था। वे अच्छे कर्मचारी बन सकेंगे, जो समय पर दफ्तर आएँगे और समय सारिणी से बंधे घड़ी की सुई के साथ आखिरी मिनट तक काम करते रहेंगे बल्कि उनसे अपेक्षित काम से ज़्यादा ही करने का प्रयास करेंगे। क्योंकि उन्हें इसकी आदत पड़ चुकी है। क्योंकि वे हमेशा से ऐसा ही करते रहे हैं।

तब तक, जब वे पूरी तरह निष्क्रिय न हो जाएँ; थककर, टूटकर बिखर न जाएँ!

जी हाँ, मैं मानता हूँ कि हम स्वयं ही अपने नन्हे बच्चों में अवसाद और अक्रियाशीलता के बीज बोते हैं। इस विषय पर कल मैं और विस्तार से लिखूंगा।

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