भारत – जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और पैसे वालों की शिकार हो गई है – 19 मई 2015

विद्यालय

कल मैंने हमारे स्कूल में होने वाली बच्चों की भर्तियों की चर्चा करते हुए आपको बताया था कि कभी-कभी हमें कुछ बच्चों को इस बिना पर ‘नहीं’ कहना पड़ता है कि उनके माता-पिता ‘पर्याप्त गरीब नहीं हैं’, हालांकि हम जानते हैं कि उनके परिवार भी किसी भी दृष्टिकोण से धनवान नहीं हैं। मैंने ज़िक्र किया था कि मैं ‘गरीब’ और ‘ज़्यादा गरीब नहीं’ के बीच अंतर करने की आवश्यकता से निजात पाना चाहता हूँ। लेकिन मेरी कामना एक कदम और आगे बढ़ चुकी है: मैं आर्थिक परिस्थिति के अंतर के अनुसार निर्णय करने की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त करना चाहता हूँ! मैं शिक्षा में सबके बीच पूरी समानता चाहता हूँ, चाहे किसी के लिए भी हो!

दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा सबके लिए समान रूप से सुलभ नहीं है। बहुत से पश्चिमी देशों में, खास कर जर्मनी में, मैंने कई स्कूल देखे, जिन्हें सरकार चलाती है और जहाँ हर सामाजिक हैसियत वाले बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। वहाँ भी निजी स्कूल हो सकते हैं, जहाँ काफी महंगे बोर्डिंग स्कूलों में उनकी अच्छी देखभाल होती होगी और जहाँ बहुत धनवान लोग अपने बच्चों को भेजते होंगे-लेकिन अगर आपके पास पर्याप्त पैसे न भी हों, तो भी न सिर्फ आपके बच्चे को विद्यार्जन का अधिकार होगा बल्कि कानूनी नियमों के अनुसार उसे स्कूल जाना अनिवार्य होगा! और माता-पिता चाहे जितना कमाते हों, हर लड़का या लड़की ऐसे स्कूल में पढ़ाई करेंगे, जहाँ पढ़ाई का स्तर अच्छा होगा। वे सब बराबर होंगे और एक ही कतार में, एक साथ बैठकर, एक समान ही शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करेंगे!

भारत में यह एक दूर का सपना है। यहाँ सिर्फ वही बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके माता-पिता काफी पैसा कमाते हैं। अगर किसी बच्चे के अभिभावक अपढ़ हैं तो वे वैसे भी शिक्षा को अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि उन्हें स्वयं अपने जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। दूसरी तरफ, अगर वे वास्तव में बच्चे को स्कूल भेजना ही चाहते हैं, तो वे उन्हें सरकारी स्कूलों में या फिर किसी सस्ते निजी स्कूल में ही भेज पाने की क्षमता रखते हैं। नतीजा: वहाँ उन्हें निचले स्तर की शिक्षा से ही संतोष करना पड़ता है और कहीं-कहीं तो बिल्कुल पढ़ाई नहीं होती!

गावों में सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बुरी है कि सिर्फ कागजों पर ही इन स्कूलों का अस्तित्व मौजूद है और शिक्षक साल में सिर्फ दो बार स्कूल आते हैं-अपनी तनख़्वाहें लेने! मैंने एक बार आपको एक ग्रामीण स्कूल के बारे में बताया था, जहाँ स्कूल की इमारत तबेले के रूप में इस्तेमाल हो रही थी! यह सबकी खुली आँखों के सामने होता रहता है और सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ही इस बुराई की जड़ है। तो ऐसी स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में क्यों भेजें?

भारत में उन्हीं अभिभावकों के बच्चे दूर तक आगे बढ़ सकते हैं, जिनके पास काफी पैसा है। हमारे देश में भ्रष्टाचार और फिर बड़े व्यावसायिक घरानों ने शिक्षा से सबसे अधिक लाभ उठाया है। भ्रष्टाचार के चलते सरकारी स्कूल किसी काम के नहीं हैं और बड़े लोगों ने इस क्षेत्र में व्यापार करने और पैसा बनाने की अपर संभावना देख ली: उन्होंने उसे एक उद्योग की तरह शुरू कर दिया, पैसा निवेश किया और शिक्षा की दुकाने खोल लीं। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आप विभिन्न स्तरों की शिक्षाओं में से किसी एक को चुन सकते हैं। शिक्षा के एक ब्रांड के अंतर्गत भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आप खरीदी जाने वाली सुविधा और शिक्षा का चयन कर सकते हैं!

मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भले ही बच्चा बहुत बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हो, अगर उसके माता-पिता बेटे की स्तरीय शिक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर सकते तो उसे अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती! और अगर आपके पास औसत मात्रा में ही धन उपलब्ध है तो? तो आपका बच्चा औसत स्तर की शिक्षा ही प्राप्त कर पाएगा!

ऐसे अभिभावकों के दुख का अंदाज़ा मैं लगा सकता हूँ। वे मध्यम वर्ग के माता-पिता होते हैं, जो जानते हैं कि उनका बच्चा बहुत बुद्धिमान है, होनहार है और वे मेहनत करके पर्याप्त रकम का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं और यहाँ तक कि बेटे या बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण तक लेते हैं- लेकिन वे अपने बच्चे को अपनी अपेक्षा के अनुसार शिक्षा नहीं दिलवा पाते, शिक्षा के स्तर के साथ कोई न कोई समझौता करना ही पड़ता है। दरअसल अच्छी शिक्षा बहुत महंगी और उनकी कूवत से बाहर होती है!

एक बार मैंने आपको बताया था कि कैसे एक बार एक दंपति कार से हमारे स्कूल आए। वे अपने बच्चों को हमारे स्कूल में भर्ती करवाना चाहते थे। हमने उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर दिया क्योंकि स्पष्ट ही वे किसी भी निजी स्कूल की फीस अदा करने में समर्थ थे। लेकिन अभिभावकों के चेहरे पर छाई निराशा देखकर हम उनका दर्द समझ गए: हमारे स्कूल जैसे अच्छे निजी स्कूल की फीस अदा करना उनकी सामर्थ्य के बाहर था। इस तरह उनका यही दोष था कि वे इतना अधिक कमाते थे कि हमारे स्कूल में उनके बच्चों के लिए कोई जगह संभव नहीं थी!

इस देश में, जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और बड़े उद्योगपतियों की दबंगई का शिकार है, सारे बच्चे एक बराबर नहीं हैं। मैं गैर बराबरी की इस व्यवस्था में बदलाव देखना चाहता हूँ! और मैं इस दिशा में काम करता रहूँगा! कैसे? यह आप कल के ब्लॉग में पढ़ेंगे!

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