भारत का पैसा कमाने का स्कूली धंधा: शिक्षा की बिक्री – 13 मई 2015

विद्यालय

कल के ब्लॉग में मैंने स्थानीय स्कूलों के साथ हुए अपने अनुभवों का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया था कि कैसे इन स्कूलों ने हमारे बच्चों को भर्ती करने की सहमति दी और फिर हमें अत्यंत निराश करते हुए भर्ती की इतनी बड़ी कीमत बताई कि हमारे लिए उतनी रकम अदा करना असंभव था। बाद में हमने दूसरे कई स्कूलों में भी पता किया और तब हमारी इस जानकारी की पुष्टि हो गई कि भारत में शिक्षा का व्यापार एक बड़े व्यवसाय की तरह उभर चुका है!

भारत में शिक्षा, स्कूल खोलना और चलाना वास्तव में एक बड़े उद्योग की तरह विस्तृत हो गया है क्योंकि एक तरफ आबादी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ पढ़ने के प्रति लोगों में जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है और बच्चे और नौजवान पढ़ने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। पैसे वाले निजी लोगों के लिए और छोटे, मध्यम और बड़े व्यापार समूहों के लिए यह एक सम्पूर्ण व्यावसायिक मॉडल बन गया है!

सभी माता-पिता अपने बच्चों के लिए अच्छे से अच्छा चाहते हैं। बच्चों को बढ़िया से बढ़िया शिक्षा उपलब्ध कराना किसी भी माता या पिता का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि न सिर्फ उन्हें प्रवेश शुल्क और मासिक शुल्क अदा करना होगा बल्कि हर परीक्षा पर परीक्षा-फीस जमा करानी होगी, बच्चों की वर्दियाँ खरीदनी होंगी, किताब-कापियाँ और दूसरी स्टेशनरी खरीदनी होंगी और कई दूसरी स्कूली गतिविधियों के लिए अतिरिक्त शुल्क भी अदा करना होगा।

अब हमारे शहर के स्कूलों का उदाहरण लेते हैं। इन स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं का प्रवेश शुल्क औसतन 4000 रुपए यानी लगभग 60 यू एस डॉलर है। हर स्कूल की मासिक फीस अलग-अलग है लेकिन अक्सर 600 से 1000 रुपयों के बीच यानी लगभग 10 से 15 डॉलर तक होती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा इससे बेहतर स्कूल में पढ़े तो सिर्फ आप इस फीस को दूना कर लें! इसके अलावा दूसरे सभी खर्चे तो आपको भुगतने ही होंगे! अब यह लोगों की आमदनी पर निर्भर करता है कि वे इतना खर्च बर्दाश्त कर सकते हैं या नहीं। क्या वे बेहतर, अधिक ख़र्चीले स्कूल का खर्च बर्दाश्त कर सकते हैं या उसी मामूली स्कूल में बच्चे को रखना चाहते हैं, जहाँ फीस तो कम हो लेकिन इसी कारण वे अपने शिक्षकों को कम वेतन देते हों, अर्थात, जहाँ शिक्षक कम योग्यता प्राप्त, कम कार्यकुशल और कम अनुभवी हों?

मैंने ऐसे प्रतिष्ठित स्कूलों के बारे में भी सुना है, जो न सिर्फ सामान्य प्रवेश शुल्क वसूल करते हैं बल्कि जहाँ आपको दान के रूप में अतिरिक्त रकम भी अदा करनी पड़ती है, जो 1000 डॉलर से 2000 डॉलर यानी 60000 रुपए से लेकर 120000 रूपए तक हो सकती है! और हाँ, यह रकम सामान्य अधिकृत रकम नहीं होती, यह दान तो होता है लेकिन स्वैच्छिक नहीं होता बल्कि अगर आप यह दान नहीं देंगे तो आपके बच्चे को वहाँ पैर तक रखने नहीं दिया जाएगा! आप कल्पना कर सकते हैं कि स्कूल के मालिकान इस व्यवसाय से कितना पैसा बनाते हैं!

ये आंकड़े हमारे शहर के चार मध्यम दर्जे के स्कूलों के औसत आंकड़े हैं। मैंने बड़े शहरों में रहने वाले अपने मित्रों से सुना है कि वहाँ इससे बहुत अधिक फीस वसूल की जाती है! शिक्षा पर जो रकम खर्च की जाती है और जो रुपया इस व्यवसाय से बनाया जाता है, वह आश्चर्यजनक रूप से बहुत अधिक है!

सिर्फ अविश्वसनीय ही नहीं, मेरे लिए यह अनैतिकता की चरम सीमा है। इन कई वर्षों में काफी समय जर्मनी में गुजारने के बाद मैं वास्तव में चाहता हूँ कि यहाँ भी जर्मनी की तरह व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों में भी। निश्चय ही वहाँ ऐसे स्कूल अधिकतर सरकारी स्कूल होते हैं और आपके पास बेहतर निजी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जाने का विकल्प खुला होता है, लेकिन सरकारी स्कूलों में भी वहाँ पढ़ाई का इतना ऊँचा स्तर होता है कि सामान्यतया लोग वहीं अपने बच्चों को पढ़ाते हैं!

हमारे यहाँ भी सरकारी स्कूल हैं-लेकिन वहाँ शिक्षा का स्तर इतना खराब होता है कि लोग अपने बच्चों को वहाँ भेजना नहीं चाहते! और गरीब लोग, जो वैसे भी शिक्षा को उतना महत्व नहीं देते, बच्चों को वहाँ भेजने में कोई लाभ नहीं देखते! वे खुद पढ़े-लिखे नहीं होते-तो फिर वे बच्चों को निजी स्कूलों में भेजकर इतना अधिक खर्च क्यों करेंगे? और अक्सर वे अपने बच्चों को वहाँ भेजने में आर्थिक रूप से अक्षम भी होते हैं।

और फिर, बच्चे अनपढ़ रह जाते हैं, जब कि बड़े-बड़े स्कूल के मालिक अधिक से अधिक पैसा कमाते रहते हैं!

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