जो भी यहाँ एक बार भी आया है, हमारे स्कूल के बारे में जानने का उसे मौका अवश्य मिलता है। इन आगंतुकों में से अधिकांश लोग हममें से किसी एक के साथ चलकर स्कूल परिसर का दौरा अवश्य करते हैं और हमारे स्कूल के सिद्धांतों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं: अहिंसा और समानता।
जी हाँ, हमारा स्कूल बराबरी की नींव पर खड़ा है और यह इस विचार से उद्भूत है कि सभी बच्चों को एक समान होना चाहिए, चाहे वे कितने भी गरीब क्यों न हों। लेकिन यह विचार और आगे निकल गया: हमारे यहाँ जाति को लेकर कतई कोई भेदभाव नहीं किया जाता, जिसका चलन भारत भर के अधिकांश स्कूलों में आज भी मौजूद है! और यही बात धर्म को लेकर भी सही है कि हम किसी प्रकार का धार्मिक भेदभाव भी नहीं करते।
बिल्कुल, हमारे स्कूल में उच्च जाति के ब्राह्मणों, पुरोहितों-पंडितों के बच्चे भी पढ़ते हैं और बहुत से तथाकथित ‘अछूत जातियों’ के बच्चे भी। और हमारे यहाँ हिन्दू बच्चे भी पढ़ते हैं और मुसलमान बच्चे भी।
गरीबी धर्म और जातियों में कोई भेद नहीं करती! हम धार्मिक परिवारों के बच्चों को, सिर्फ इसलिए कि हम उनके विचारों और नज़रिए से सहमत नहीं हैं, भर्ती करने से इंकार नहीं करते! हम ऐसे बच्चों को भी शिक्षा प्रदान करते हैं, जो पूरी तरह धार्मिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। वे धार्मिक पाखंड में रचे-बसे माहौल में बड़े होकर यहाँ आते हैं और स्वाभाविक ही, वही विचार अपने साथ लेकर स्कूल आते हैं। घर में उनकी आस्थाएँ जो भी हों, अभिभावक उन्हें स्कूल भेजने में आर्थिक कठिनाई महसूस करते हैं और यही हमारे लिए भर्ती का एकमात्र मानदंड होता है।
और वे यहाँ सबसे प्रमुख बात यह सीखते हैं कि वे सब बराबर हैं। वे सब एक साथ अगल-बगल बैठते हैं, चाहे उनका परिवार किसी भी जाति या धर्म से संबंध रखता हो, एक साथ कतार में बैठकर भोजन करते हैं। वे सब हिल-मिलकर एक-दूसरे के साथ खेलते हैं और छुट्टी के बाद सब एक साथ अपने घर जाते हैं। अगर उनके अंदर बराबरी के विचार का यह बीज स्कूल में ही रोप दिया जाए तो भविष्य में कभी न कभी उनका मन घर में बचपन से सीखी गई बातों से अलग तरह से सोचने को तैयार होगा।
हमने आजकल एक नया काम शुरू किया है। हर शनिवार हमारे यहाँ कुछ बड़ी कक्षाओं के बच्चों आते हैं और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं- निश्चित ही, नास्तिकता पर भी और जाति-प्रथा, अंधविश्वास, लैंगिक भूमिकाओं पर, सुंदरता के कथित आदर्श और दूसरे बहुत से विषयों पर।
पिछले सप्ताह हमने जाति-प्रथा पर चर्चा की थी और बच्चों ने बताया कि कैसे उनके घरों में उनके अभिभावक निचली जातियों के बच्चों के साथ खेलने से मना करते हैं। और कैसे वे उनसे छिपकर उनके साथ खेलने निकल जाते हैं- क्योंकि उन्हें ऐसे किसी अंतर का पता ही नहीं होता।
जाति-प्रथा को लेकर बच्चों की समझ बहुत सीमित होती है क्योंकि वैसे भी यह प्रथा पूरी तरह अतार्किक भेदभाव पर आधारित है और अगल-अलग समूहों में इस तरह लोगों को बाँटना पूरी तरह अर्थहीन है। लेकिन बचपन से उनके मन में लगातार यही विचार भरा जाता है जिससे वे भी अपने अभिभावकों जैसा व्यवहार करने लगते हैं और स्वाभाविक ही आपस में भी एक-दूसरे के साथ भेदभाव करते हैं। हम आशा करते हैं कि हम उनके भविष्य में बदलाव ला सकेंगे।
नहीं! हम सिर्फ आशा नहीं करते बल्कि हमें पूरा विश्वास है कि अवश्य ला सकेंगे। एक न एक दिन ये बच्चे आपस में मिलेंगे और अपने स्कूली दिनों की याद करेंगे। वे पुनः एक टेबल पर बैठकर हँसते-गाते, खुशी और संतोष के साथ याद करेंगे कि बचपन में भी वे इसी तरह साथ बैठकर भोजन किया करते थे!
हो सकता है कि वे एक दिन इस अन्याय के खिलाफ उठ खड़े हों। संभव है वे अपने बच्चों के साथ अलग तरह का व्यवहार करें। कुछ भी हो, वे इस समय यहाँ बराबरी का व्यवहार पा रहे हैं और निश्चित ही यह उनके जीवन में बदलाव लेकर आएगा।
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