भारत के निजी स्कूल किस तरह शिक्षा को भ्रष्ट व्यापार में तब्दील किए दे रहे हैं! – 26 मार्च 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

भारत के निजी स्कूलों के बारे में अपने खयालात के इज़हार के साथ मैंने निजी स्कूलों पर जारी इस श्रृंखला की शुरुआत की थी, जिसमें मैं आपको वहाँ अपनाई जाने वाली लम्बी, उबाऊ और श्रमसाध्य प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में बता चुका हूँ लेकिन जिस विषय पर मैंने अभी सिर्फ संक्षिप्त टिप्पणी की है वह दरअसल सबसे बड़ी समस्या है और हमेशा की तरह वह है पैसा! दरअसल, शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है! एक विशाल, भ्रष्ट व्यापार!

हमें कई बार उन पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है, जो भारत में माता-पिता द्वारा बच्चों की शिक्षा पर किये जाने वाले व्यय के बारे में सुनकर हैरान रह जाते हैं. जब हम उनसे कहते हैं कि हमारा स्कूल सिर्फ उन्हीं बच्चों के लिए है, जिनके माता-पिता उन्हें उन स्कूलों में भर्ती कराने में असमर्थ रहते हैं, जहाँ फीस ली जाती है तो वे आश्चर्य से पूछते हैं: ‘क्या? आपके देश में बच्चों की पढाई के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है?’

कई पश्चिमी देशों में शिक्षा पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता है। हो सकता है कुछ जगह किताबें-कापियां खुद खरीदनी पड़ती हों मगर स्कूलों में फीस या चंदे के रूप में प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि वसूल नहीं किया जाता। भारत में स्थिति कुछ अलग है।

जी हाँ! यहाँ सरकारी स्कूल हैं, जो मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं- कम से कम यह उन्हें ऐसा करना चाहिए! वहाँ स्कूल फीस नहीं लगती और सरकारें लम्बे-चौड़े इश्तहार प्रकाशित करती हैं कि वहाँ बच्चों को शिक्षा के अलावा मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता है- लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा वहाँ प्रदान की जाती है वह अक्सर बिलकुल निरुपयोगी और घटिया होती है! वहाँ अक्सर शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते और जब आते भी हैं तो आपस में बैठकर गपशप करते रहते हैं। कई जगह स्कूलों का इस्तेमाल कबाड़ख़ाने की तरह किया जाता है और यहाँ तक कि जानवर बाँधने के लिए भी उनका इस्तेमाल होता देखा गया है! कहीं कहीं शिक्षक अपने किसी स्थानापन्न को स्कूल भेज देते हैं, जो कम पढ़ा-लिखा और अयोग्य होता है और जिसे वे अपनी पक्की, सरकारी तनख्वाह में से कुछ रुपया दे देते हैं। इस दौरान शिक्षक अपने किसी निजी व्यापार में लगे होते हैं और इस तरह एक साथ दो स्रोतों से पैसा कमाते हैं। यह है सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का हाल! किसी को कोई परवाह ही नहीं है!

स्वाभाविक ही अपढ़ माता-पिता भी, जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं, इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं होते। उन्होंने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा मगर वे भी देखते-समझते हैं कि उनके लड़के-लड़कियां एक के बाद एक परीक्षाएं पास करते हुए अगली कक्षाओं में पहुँचते जा रहे हैं मगर अपने नाम तक लिख नहीं पाते। हिंदी में लिखा छोटा-मोटा वाक्य भी ठीक से पढ़ नहीं पाते!

इन अभिभावकों में से कुछ शिक्षा के महत्व को समझते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे अधिक पढ़-लिख सकें- मगर उनके पास अपने बच्चों को किसी अच्छे निजी स्कूल में भेजने के लिए पर्याप्त रुपया नहीं होता। एक ऐसा स्कूल, जहाँ उन्हें वास्तव में पढ़ाया जाए! स्कूलों की वर्दियां और किताबें महँगी होती हैं, मासिक फीस बहुत अधिक होती है- 30 से 50 यू एस डॉलर यानी लगभग 2000 से 3000 रूपए तक! यह वह रकम है जो हमारे स्कूल के कई बच्चों के अभिभावक माह भर में कमा पाते हैं। वे किस तरह अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेज सकते हैं!

और सबसे मुख्य बात तो औपचारिक रूप से वितरित परिचय-पुस्तिकाओं में लिखा ही नहीं होता: अनौपचारिक प्रवेश-शुल्क, स्कूल को अनिवार्य रूप से दिया जाने वाला चन्दा, बच्चे को प्रवेश-प्रक्रिया में उत्तीर्ण कराने और उसका प्रवेश सुनिश्चित कराने के लिए दी जाने वाली रिश्वत! सामान्यतः यह रकम कुल मिलाकर 700 से 850 यू एस डॉलर यानी करीब 40 से 50 हजार रुपयों तक होती है। और अगर आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं और आपके लिए इतनी रकम खर्च करना सम्भव है तो आप यह सौदा मंज़ूर कर लेते हैं।

चंदे की शक्ल में इतनी बड़ी रकम अदा किये बगैर आप अपने बच्चे को किसी भी अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करवा सकते। हर व्यक्ति को इन स्कूलों में अपने बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए यह रकम अदा करनी ही होगी। और इन स्कूलों का भ्रष्ट प्रशासन-तंत्र यह सुनिश्चित करेगा कि रकम सही हाथों में पहुँच जाए।

आपको बच्चों की किताबें और कापियां स्कूल से ही खरीदनी पड़ती हैं और हर किताब-कापी पर स्कूल को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है। इसी तरह स्कूल से ही वर्दियां भी खरीदनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत बाज़ार में उपलब्ध उन्हीं वर्दियों की कीमत से बहुत ज़्यादा होती है।

भ्रष्टाचार! पैसा! व्यापार! भारत में बच्चों की शिक्षा के साथ यही खिलवाड़ हो रहा है।

और निश्चय ही यह देश को और आने वाली पीढ़ियों को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने वाला रास्ता कतई नहीं है!