हमारी चैरिटी योजनाओं का ध्येय और उनका इतिहास – गरीब बच्चों को मुफ़्त शिक्षा – 14 मई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

सोमवार के अपने ब्लॉग में मैंने आपको बताया था कि भारत में मौजूद भ्रष्टाचार के चलते हम अपने स्कूल को और आगे विस्तार देने की योजना स्थगित कर रहे हैं। मंगलवार को मैंने पास स्थित एक स्कूल के साथ हुए अपने निराशाजनक अनुभव के बारे में बताया और कल मैंने बताया कि कैसे हम कुछ समय के लिए दूसरे बहुत से परिवारों की तरह किंकर्तव्यविमूढ़ रह गए कि अब बच्चों के दाखिले के बारे में क्या किया जाए। और यह सब तब, जब कि हम वास्तव में सिर्फ गरीब बच्चों की मदद करना चाहते हैं!

इसकी शुरुआत तब हुई जब हमने वृन्दावन में बाहर से पढ़ने आए कुछ गरीब बच्चों को अपने आश्रम में रहने की जगह दी। यह शुरुआत थी, जैसा कि हमारे बचपन में पिताजी पहले भी किया करते थे। उन बच्चों के पास रहने की जगह नहीं हुआ करती थी और वे पढ़ाई समाप्त होने तक कुछ साल हमारे यहाँ रहा करते थे। बाद में किसी समय छोटे बच्चों के कुछ अभिभावक हमसे मिले और बच्चों की फीस अदायगी में थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद की याचना की। इस तरह हम अन्य स्कूलों में पढ़ने वाले कुछ गरीब बच्चों की फीस अदा करने लगे।

समय बीतने के साथ हमें पता चला कि उन स्कूलों में इन बच्चों के साथ सदा कोई न कोई समस्या पेश आती रहती है: जैसे, दूसरे बच्चे उनके साथ धौंसबाजी करते थे क्योंकि वे गरीब बच्चे स्वयं अपनी फीस अदा नहीं करते थे! इसके अलावा हम जानते थे कि उन स्कूलों में शिक्षक बच्चों के साथ मार-पीट करते हैं। वहाँ के प्रबंधन पर हमारा कोई बस नहीं था कि इस बारे में हम विशेष कुछ कर पाते। अंततः हमने इस व्यवस्था में कुछ परिवर्तन करने का निर्णय किया। हमें दूसरे स्कूलों में अपने बच्चों की शिक्षा को प्रायोजित करना व्यर्थ लगने लगा था कि बाद में वहाँ उनके साथ धौंसबाज़ी और मार-पीट होती रहे! हमारा विचार था कि स्कूल में उन्हें मज़ा आना चाहिए, वहाँ जाना उन्हें अच्छा लगना चाहिए!

तो, इस तरह सन् 2007 में हमने सिर्फ 40 बच्चों को लेकर अपना स्कूल खोला, जिसमें सिर्फ दो कक्षाएँ थीं। लक्ष्य था: गरीब बच्चे यहाँ आकर पूरी तरह मुफ़्त शिक्षा प्राप्त कर सकें; अपनी पढ़ाई पर और वर्दियों, किताब-कापियों पर उन्हें एक रुपया भी खर्च न करना पड़े! और सबसे बड़ी बात, उन्हें अच्छी, स्तरीय शिक्षा प्राप्त हो सके!

पूरी शक्ति के साथ हम इस स्कूल को चलाने में लगे हुए हैं। निश्चय ही हमारे कुछ आर्थिक मददगार और प्रायोजक हैं, जो हमारी इस योजना में सहयोग करते हैं और जिनके प्रति हम तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हैं। लेकिन इसके बाद भी, क्योंकि सिर्फ डोनेशन इतने बड़े काम के लिए अपर्याप्त होता है, हम इस स्कूल को सुचारू रूप से चलाने के लिए योग और आयुर्वेद का व्यापार करते हैं! इस तरह हमारी कार्यशालाओं और विश्रांति आयोजनों में शामिल होने वाला हर सहभागी, आश्रम में आकर रहने वाला हर मेहमान किसी न किसी तरह इस परियोजना में हमारा सहयोग कर रहा होता है!

इस तरह कड़ी मेहनत करते हुए-सिर्फ डोनेशन प्राप्त करने हेतु ही नहीं बल्कि स्कूल चलाने हेतु भी-हम इस मौजूदा स्थिति तक पहुँचने में सफल हुए हैं। आज हमारे स्कूल में वृन्दावन के सबसे गरीब घरों से आने वाले 200 से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं। वे सबेरे आते हैं और योग कक्षाओं से अपनी दिनचर्या शुरू करते हैं। कुछ कक्षाओं के बाद उन्हें दोपहर में गर्मागरम भोजन प्राप्त होता है। भोजन बहुत से बच्चों के लिए हमारे स्कूल आने का मुख्य कारण होता है क्योंकि बड़े परिवारों वाले गरीब माता-पिता पर्याप्त भोजन की व्यवस्था खुद नहीं कर पाते। फिर, दोपहर बाद वे अपने घर चले जाते हैं, कुछ हमारी स्कूल बसों में और कुछ पैदल।

हर शुक्रवार मैं अपने ब्लॉग के ज़रिए इन परिवारों में से किसी एक को अपने पाठकों से मिलवाता हूँ, जिसमें न सिर्फ परिवार की हालत का विवरण होता है बल्कि चित्रों और वीडियो की सहायता से पाठकों को संक्षेप में परिवार से रूबरू कराने की कोशिश भी होती है, जिससे वे समझ सकें कि ये बच्चे कौन हैं, कहाँ से आते हैं और उनकी पारिवारिक हालत क्या है। अधिकतर, उनके पिता निर्माण-स्थलों में काम करने वाले मजदूर, रिक्शा चलाने वाले, रोजंदारी पर मजदूरी करने वाले, सफाई कर्मचारी, मन्दिरों के गरीब पुजारी या दर्ज़ी आदि होते हैं।

हमने खुद अपने स्कूल के हर बच्चे के घर का दौरा किया है, हम उन्हें उनके नाम से जानते हैं और उनकी जीवन-यात्रा में हम हर तरह से उनके साथ होते हैं। दुनिया भर के यात्री और पर्यटक न सिर्फ हमारा स्कूल देखते हैं बल्कि बच्चों से मिलने उनके घर भी जाते हैं। कुछ विशेष कठिन परिस्थितियों में हम उनकी मदद के लिए अतिरिक्त योजनाएँ भी तैयार करते हैं, जैसे, 2008 और 2010 की भयंकर बाढ़ के समय या कुछ समय पहले, मोनिका नामक लड़की की मदद के लिए।

और इस बिन्दु पर आकर हम यहाँ बैठे सोच रहे हैं कि यह व्यवस्था हमारे और हमारे गरीब बच्चों के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। लेकिन शिकायत करने का कोई अर्थ नहीं है-हम अपना काम जारी रखेंगे और भविष्य में उसे और भी बेहतर ढंग से अंजाम देंगे। मेरे मन में भविष्य की और भी कई योजनाएँ हैं। अगले हफ्ते मैं उनके बारे में आपको बताऊँगा!