उच्चवर्गीय स्कूल भारत में सामाजिक दरार को और चौड़ा कर रहे हैं! – 25 मार्च 2014

विद्यालय

कल मैंने बताया था कि आजकल कैसे बहुत से भारतीय स्कूल बच्चों को प्रवेश देने से पहले एक लम्बी और परिश्रम-साध्य प्रक्रिया के अंतर्गत बच्चों और उनके अभिभावकों के साक्षात्कार लेते हैं और फिर बड़ी संख्या में इंटरव्यू में सफल प्रवेशार्थियों में से कुछ बच्चों का चुनाव लकी-ड्रा के ज़रिये करते हैं. आज मैं आपको यह बताऊंगा कि मेरे विचार से बच्चों के चुनाव की इस प्रक्रिया का लोकप्रिय होना क्यों उचित नहीं है.

कल मैंने एक संकेत तो दिया ही था: ये स्कूल उच्चवर्गीय हैं. ये स्कूल उत्कृष्ट है, कम से कम वे दावा तो यही करते हैं, और बच्चों के प्रवेश से पूर्व ही कमज़ोर बच्चों को छांटकर अलग करने की इस प्रक्रिया के ज़रिए वे अपनी इस उत्कृष्टता को सुरक्षित तथा सुनिश्चित करना चाहते हैं.

लेकिन बच्चों की छँटाई की यह प्रक्रिया इस महँगी पढाई का खर्च उठा सकने वाले संपन्न लोगों और न उठा सकने वाले विपन्न लोगों के बीच पहले से मौजूद सामाजिक दरार को और चौड़ा कर देती है. पढ़े-लिखे और बे-पढ़े-लिखे अभिभावकों के बीच! समाज के ऊँचे और निचले तबके के बीच!

कम साधनों वाले अभिभावकों के सामने स्वाभाविक ही पैसे की कमी सबसे पहला रोड़ा होता है. ऐसे महंगे स्कूलों के शिक्षक अपनी ऊंची योग्यता और बेहतर अनुभव के चलते ऊंची तनख्वाह प्राप्त करते हैं और इसलिए इन स्कूलों की फीस भी काफी ज्यादा होती है.

आप उन स्कूलों का खर्च वहन नहीं कर सकते इसलिए आप इन स्कूलों में दाखिले के आवेदन के विषय में सोचेंगे भी नहीं.

भर्ती का अगला कदम होता है अभिभावकों का साक्षात्कार! स्कूल का प्रशासन जहाँ अपने स्कूल के मानदंडों से अभिभावकों को अवगत कराता है वहीँ वह अभिभावकों के बारे में भी जानना चाहता है. इस संक्षिप्त साक्षात्कार के ज़रिये वे उनके घर के वातावरण का ज़ायज़ा लेने की कोशिश करते हैं. क्या घर का वातावरण तेज़ गति से सीखने में बच्चे की मदद करता है? क्या अभिभावक घर पर बच्चों को पढ़ा सकने में सक्षम हैं? क्या वे गृह-कार्य में बच्चों की मदद कर सकते हैं? और क्या वे बच्चों पर दबाव बनाकर उन्हें घर पर भी पढ़ने के लिए बिठा सकते हैं?

आपके पास इतना रूपया तो है कि आप अपने बच्चों को इन महंगे स्कूलों में भेज सकें मगर आप खुद पढ़े-लिखे नहीं हैं तो आप इस साक्षात्कार में असफल रहेंगे.

तो इस प्रवेश प्रक्रिया में वे बच्चे ही सफल होंगे जो अमीर और पढ़े-लिखे परिवारों से आते हैं. सिर्फ वही वास्तविक रूप से अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे. केवल यही बच्चे इन महंगे स्कूलों में पढ़ेंगे और बाद में सिर्फ उन्हें ही कालेजों और विश्विविद्यालयों में ऊंची शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होगा.

ऐसी शिक्षा जारी रखकर सम्भव है ये स्कूल अच्छे विद्यार्थी तैयार कर लें मगर साथ ही साथ वे अमीर और गरीब, सुशिक्षित और अशिक्षित तथा पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोगों के बीच की खाई को और अधिक चौड़ा कर रहे होंगे. देश की उन्नति और प्रगति में अपना योगदान करने के स्थान पर वे पहले से बंटे हुए मुल्क में और भी ज्यादा भेदभाव पैदा करेंगे. यह शिक्षा उच्च वर्ग का एक समूह खड़ा कर देगी और देश की अधिकांश जनता अशिक्षित ही रह जाएगी या सरकारी स्कूलों में खराब, कम गुणवत्ता वाली पढ़ाई ही प्राप्त कर पाएगी.

नहीं, मेरा पक्का विचार है कि यह उचित नहीं है और सिर्फ उन्हीं बच्चों को पढ़ाना जो सीख सकें, यह सिद्धांत ही मूलतः गलत है. लेकिन इस विषय पर कल कुछ विस्तार से लिखूंगा.

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