क्या सिर्फ अमीर और सुशिक्षित अभिभावकों के बच्चों को ही अच्छे स्कूल में पढ़ने का अधिकार है? 27 मार्च 2014

कल भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त पैसे के खेल और भ्रष्टाचार के बारे में लिखने के बाद आज मैं स्कूलों द्वारा की जाने वाली वहाँ पढ़ सकने योग्य बच्चों की छटनी के बारे कुछ और बातें लिखना चाहता हूँ। भ्रष्टाचार के अलावा भी मेरा पक्का मानना है कि शिक्षा में, अपने पिछले दो दिन के ब्लोगों में वर्णित, भर्ती और पढ़ाई का संभ्रांत तरीका अपनाना पूरी तरह अनुचित है। जहां तक मुझे पता है भारत में या कम से कम भारत के इस इलाके में यह तरीका बहुत आम है। हमारे स्कूल में हम इस बात को कोई महत्व नहीं देते कि शिक्षा प्राप्त करने आया बच्चा किस परिवेश से आया है। हमारे यहाँ यह भी आवश्यक नहीं है कि बच्चे को पढ़ाई में अच्छा ही होना चाहिए। हमारे स्कूल में इसके ठीक विपरीत स्थिति देखने को मिलती है।

हमारे यहाँ शिक्षा पाने वाले बच्चों की आर्थिक स्थिति की बात छोड़ें क्योंकि स्वाभाविक ही वे ऐसे परिवारों से आते हैं, जिनकी मासिक आमदनी ही, ज़्यादातर मामलों में, निजी स्कूलों की मासिक फीस के बराबर होती है और वे अपने बच्चों को इन स्कूलों में दाखिल कराने के बारे में सोच भी नहीं सकते। लेकिन चलिए, इन बच्चों के घरों में मौजूद वातावरण की चर्चा करें।

हमारे स्कूल में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चों के अभिभावक पढ़ना-लिखना नहीं जानते। संभव है, कुछ अभिभावक अपना नाम लिखना सीख गए हों, जिससे अंगूठा न लगाना पड़े, लेकिन ज़्यादातर उतना भी नहीं कर पाते। उन्हें इसकी ज़रूरत ही कभी महसूस नहीं हुई, वे कभी स्कूल नहीं गए या एकाध साल गए होंगे। वे इस स्थिति में नहीं हैं कि अपने बच्चों को स्कूल भेजने का खर्च उठा सकें। वे घर पर बच्चों के होमवर्क में कोई मदद नहीं कर सकते, इतना भी नहीं कर सकते कि अगर उनका बच्चा वर्णमाला का कोई अक्षर भूल रहा हो, या कोई गलत अक्षर बता रहा हो तो उसे सुधार सकें। वे जानते ही नहीं हैं।

क्या इसका मतलब यह है कि हम इन बच्चों को पढ़ा ही नहीं सकते? क्या इसका मतलब यह है कि ये बच्चे सीख ही नहीं सकते? नहीं! हर बच्चा पढ़ सकता है अगर आप, एक अच्छे शिक्षक के रूप में उसका ध्यान पढ़ाई की ओर खींच सकें। अगर आपको लगता है कि आपके सामने बैठा कोई भी बच्चा आपकी बात नहीं समझ रहा है तो बच्चों या उनके अभिभावकों पर इसका दोष मढ़ने की जगह आपको अपना पढ़ाने का तरीका बदलना चाहिए।

स्वाभाविक ही अगर बच्चे घर में भी पढ़ें तो यह अच्छी बात होगी। स्वाभाविक ही यह भी अच्छा होगा यदि बच्चों के प्रश्नों के उत्तर देने के लिए माता-पिता मौजूद हों- पर वास्तविकता यह है कि आजकल बच्चे स्कूल में ही इतना समय गुज़ारते हैं कि उतना समय उन्हें सब कुछ पढ़ाने के लिए पर्याप्त होता है। आजकल शिक्षाविदों के बीच यह सोच पुख्ता हुआ है कि बच्चों को होमवर्क दिया ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि स्कूल में बच्चों को पर्याप्त समय तक पढ़ाई में व्यस्त रखा जाता है और इस तरह औपचारिक पढ़ाई वे काफी हद तक स्कूल में ही कर चुके होते हैं और घर जाकर उन्हें होमवर्क करने की आवश्यकता ही नहीं होती!

क्या आप जानते हैं कि हमारे स्कूल में ऐसे बच्चे भी पढ़ते हैं, जिनके अभिभावक एक शब्द भी पढ़-लिख नहीं पाते मगर वे खुद पढ़ाई में बहुत अच्छे हैं। घर में उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है मगर वे यहाँ, हमारे स्कूल में ही काफी पढ़ाई कर लेते हैं। जी हाँ! वे कर सकते हैं और वे वास्तव में करते ही हैं- बिना किसी संभ्रांत, धनाढ्य सहपाठियों, शिक्षकों और अभिभावकों की सहायता के।

मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि परिवार में पढ़ाई का एक खास वातावरण बच्चे को पढ़ाई के प्रति गंभीर बनाता है और वह स्कूल में पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान लगाने की ओर प्रवृत्त होता है। लेकिन मैं इसे गलत मानता हूँ कि सिर्फ अच्छे विद्यार्थियों को ही अपने स्कूल में दाखिला प्रदान करूँ, सिर्फ उनका चुनाव करूँ और सिर्फ उन्हें पढ़ाऊँ, जिनके घर में पढ़ाई का बेहतर वातावरण मौजूद है और बाकी बच्चों को उपेक्षा कर दूँ। हम सब इसी धरती के बाशिंदे हैं और हमें उन लोगों की ओर सहायता का हाथ बढ़ाना चाहिए, जिनके पास पढ़ाई के वैसे अवसर उपलब्ध नहीं हैं, जैसे हमें उपलब्ध हैं!

और यही हमारे स्कूल का ध्येय है: भले ही हम अलग-अलग व्यक्ति हैं, हम सब समान हैं! हमारे बीच मौजूद भिन्नता का हम आदर करते हैं लेकिन अंततः हम सभी इंसान हैं।

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