कठिन निर्णय: कब कोई बच्चा हमारे स्कूल में भर्ती होने के लिहाज से ‘पर्याप्त गरीब नहीं’ होता? 18 मई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

पिछले हफ्ते मैंने भ्रष्टाचार के चलते हमारे सामने पेश आने वाली स्कूल संबंधी दिक्कतों के बारे में बताया था। मैंने बताया था कि भारत में शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन चुकी है। अंत में मैंने संक्षेप में स्कूल खोलने के पीछे मौजूद सोच को स्पष्ट करते हुए बताया था कि हम किसके लिए और क्या कर रहे हैं: अपने आसपास के गरीब बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा और उनके परिवारों की मदद! मैं पहले ही घोषणा कर चुका हूँ कि अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में अपने सोच-विचार को आपके सामने लगातार रखता रहूँगा और मुझे लगता है कि इस काम में पूरा अगला हफ्ता लग जाएगा! आज इसकी शुरुआत करते हुए मैं हमारे सामने आने वाले सबसे पहले प्रश्न पर चर्चा करूँगा: कौन हमारे स्कूल के लिए 'पर्याप्त गरीब' है और कौन आर्थिक रूप से पर्याप्त समर्थ है?

जब भी हमारे यहाँ नई भर्तियाँ शुरू होती हैं, हम व्यक्तिगत रूप से हर बच्चे के घर जाते हैं और देखते हैं कि वे कहाँ रहते हैं। इससे हमारे सामने कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं- पहली बात तो यह कि हम हर बच्चे और उसकी परिस्थिति को व्यक्तिगत रूप से जानने लगते हैं और इससे बच्चा स्वतः ही हमसे नज़दीकी महसूस करने लगता है। और स्वाभाविक ही हम यह जानने में समर्थ हो जाते हैं कि वास्तव में उस परिवार के बच्चे को हमारे स्कूल में स्थान की ज़रूरत है या नहीं।

वास्तव में यह काम आसान नहीं होता और अक्सर हमें अपने स्कूल के बच्चों के परिवारों के बीच काफी अंतर नज़र आता है। कुछ लोगों के पास रहने के लिए अपना खुद का मकान होता है-अपने बाप-दादाओं से प्राप्त या कहीं से ऋण लेकर बनवाया हुआ। कुछ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवार होते हैं, किसी में सिर्फ तीन तरफ ईंट की दीवारें होती हैं, टीन की छत होती है, जिसमें अभी से छेद नज़र आ रहे होते हैं। कुछ लोगों को रोज़ काम की खोज में निकलना पड़ता है या कुछ ऐसे होते हैं, जो बीमारी के चलते कोई काम ही नहीं कर पाते, जब कि कुछ लोगों के पास काफी हद तक काम तो होता है मगर उससे पर्याप्त आमदनी नहीं होती। कुछ लोग चार बच्चों को पालने लायक कमा लेते हैं लेकिन उनके पास पालने-पोसने के लिए सात बच्चे होते हैं! कुछ और होते हैं, जहाँ परिवार में बच्चा तो एक ही होता है मगर कमाने वाला भी एक ही होता है-दूसरा या तो मर चुका होता है या फिर वे अलग हो चुके होते हैं!

आप अभी से देख सकते हैं कि अंतर बहुत है और ज़्यादातर प्रकरणों में जब हम उनके घर जाते हैं तो तुरंत ही उस परिवार की कठिन परिस्थिति के बारे में जान जाते हैं। ऐसे प्रकरण कम ही होते हैं, जहाँ हम बच्चों के माता-पिता से कहते हैं कि हम उनके बच्चों को भर्ती नहीं कर पाएँगे। लेकिन ऐसे प्रकरण भी होते ही हैं।

हम अक्सर पाते हैं कि बच्चों के माता या पिता की आय औसतन 4000 रुपए प्रतिमाह होती है और जब हम किसी ऐसे घर में पहुँचते हैं, जहाँ परिवार की आय लगभग 10000 रुपए है और खिलाने, लालन-पालन करने और पढ़ाने-लिखाने के लिए सिर्फ एक ही बच्चा है तो हम नम्रतापूर्वक अभिभावकों से कोई दूसरा स्कूल देखने के लिए कह देते हैं। हमारे स्कूल में, जिस जगह यह बच्चा पढ़ता, वह अब किसी अधिक गरीब बच्चे के उपयोग में आ सकती है, जिसके माता-पिता वास्तव में किसी दूसरे स्कूल में उसकी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते! ऐसा परिवार, जिसे तुलनात्मक रूप से मदद की अधिक आवश्यकता है।

लेकिन साथ ही हम यह भी जानते हैं कि यह पिता भी अधिक धनवान नहीं है! हम जानते हैं कि वह कई स्कूल ढूँढ़ लेगा लेकिन उसके लिए ऐसा स्कूल ढूँढ़ना मुश्किल होगा, जहाँ बच्चे को अच्छी शिक्षा भी मिल सके और जिसका खर्च वहन करने में उसे कठिनाई भी न हो। निश्चित ही, हमारे स्कूल की पढ़ाई का स्तर उसे किसी दूसरे स्कूल में नहीं मिलेगा! आखिर हम क्या कर सकते हैं-हमारी अपनी सीमाएँ भी हैं! अधिक से अधिक संख्या में गरीब बच्चों को पढ़ाने की परिकल्पना तो है लेकिन एक बिन्दु के बाद हमें ‘नहीं’ कहना ही पड़ता है।

मैं नहीं चाहता कि आगे ऐसी परिस्थिति निर्मित हो कि हमें यह तय करने की समस्या से दो-चार होना पड़े कि कौन पर्याप्त गरीब है और किसके पास काफी पैसा है कि बच्चे को हमारे स्कूल में भेजना उनके लिए आवश्यक न हो। फिलहाल तो हम ऐसा कर रहे हैं लेकिन भविष्य में हमारे पास एक कार्य-योजना है, जिससे हम यह काम कुछ अलग तरह से कर सकेंगे। उसके बारे में मैं आपको अगले कुछ दिनों तक बताता रहूँगा।