2013 – इसी साल हमने अपने चैरिटी स्कूल की पहली मंजिल का निर्माण करवाया – 6 जनवरी 2014

विद्यालय

2013 के अंत के साथ हमारी एक बड़ी परियोजना पूर्ण हुई: आखिर हमारे स्कूल के पास निचली मंज़िल के अतिरिक्त पहली मंज़िल पर भी पाँच कक्षाएँ और पाँच शौचालय हो गए हैं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह कैसे संभव हुआ।

आप जानते ही होंगे कि गुफा से बाहर आने के बाद वृन्दावन में कुछ स्कूल के बच्चों को हम वर्षों पहले से प्रायोजित करते रहे हैं। 2007 में हमने आश्रम के पड़ोस वाली इमारत खरीदकर उसमें किंडरगार्टन शुरू किया था। दो कमरों और बीस बच्चों के साथ उसकी शुरुआत हुई थी धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और उनके साथ कमरों की संख्या भी। जब पहली बार हमारे स्कूल से पाँचवी कक्षा के बच्चे पढ़कर निकले, हमारे पास उसके बाद की कक्षाओं के लिए स्थान उपलब्ध नहीं था और हमें उन बच्चों को दूसरे स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजना पड़ा। हम उन्हें यहीं, अपने स्कूलों में पढ़ाना चाहते थे मगर जगह की कमी समस्या बन गई थी।

हमने अपने विचार अपने मित्रों और दूसरे हितैषियों के साथ साझा किए और उनके साथ इन इच्छाओं को कार्यरूप देने के कार्यक्रम पर विचार करने लगे। आखिर 2013 के शुरू में एक स्नेही, उदार मित्र ने हमारी मदद की और हमारा स्वप्न साकार होने की संभावना नज़र आने लगी। संभव है वह अपना नाम ज़ाहिर न करना चाहते हों इसलिए मैं उनकी पहचान यहाँ नहीं दे रहा हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि वे यह आलेख अवश्य पढ़ेंगे इसलिए मैं एक बार फिर अपने आश्रम-परिवार और बच्चों की ओर से उनका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ!

काम की शुरुआत तुरंत हो गई और छत पर नए कमरों की दीवारें बहुत जल्दी तामीर कर ली गईं। इस निर्माण के साथ ही प्रवेश-द्वार से लगे प्रांगण की नई छत डालना भी आवश्यक था क्योंकि उसके ऊपर भी एक कमरा बनाया जाना था। बहुत से मजदूर इस काम में व्यस्त रहे और बहुत जल्दी दीवारें खड़ी कर ली गईं। इस तरह, निर्माण की शुरुआती तस्वीरें पेश करने में ज़्यादा समय नहीं लगा। अतिरिक्त भार वहन हो सके इस हेतु इमारत के पिलर्स को अतिरिक्त मजबूती प्रदान करने की आवश्यकता थी इसलिए उन्हें भी सीमेंट भर कर और मजबूत किया गया।

मज़ेदार बात यह कि ठेकेदार ने पहले नए कमरे और बाद में सीढ़ियाँ बनाने का निर्णय किया। इसका नतीजा यह हुआ कि मजदूर ईंटें ऊपर नहीं ले जा सकते थे बल्कि वे उन्हें नीचे से फेंकते थे और ऊपर दूसरा मजदूर उन्हें लपक लेता था! जब हमें निर्माण कार्य की तस्वीरें लेनी होती थीं तो लकड़ी की नसेनी लगाकर ऊपर पहुंचना पड़ता था। जैसे-जैसे दिन बीतते गए वह नसेनी कमजोर पड़ती गई और बाद में तो वह इतना हिलती-डुलती थी कि गिरने का डर लगता था! फिर भी जब तक पक्की सीढ़ियाँ नहीं बन गईं, हम जब मर्ज़ी होती, उसी लकड़ी की नसेनी से वहाँ आते-जाते रहे!

गर्मियां आते-आते भवन का ढांचा अच्छी तरह बनकर तैयार हो गया था। और फिर मानसून की बारिश कुछ जल्दी शुरू हो गई। कुछ दिनों के लिए काम रोक देने के सिवा कोई चारा नहीं था क्योंकि लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसके चलते हर चीज़ भीगी हुई थी और काम करने का मौका ही नहीं मिल रहा था। आखिर जब पानी रुका और सूरज के दर्शन हुए, काम फिर शुरू हुआ। दीवारों पर प्लास्टर का काम कराया गया, फर्श पर मार्बल बिछाया गया, बिजली की फिटिंग कराई गई, पानी के लिए नलों की फिटिंग कराई गई, टाइल्स लगवाए गए और खिड़कियाँ फिट करवाई गईं।

दीवाली के आसपास स्कूल की नई इमारत पूरी तरह बन कर तैयार हो गई थी। आखिर में दरवाजे और एयर-कंडीशनर्स लगवाए गए, सभी कमरों में पेंट करवाकर उन्हें आकर्षक रंगों से सजाया गया और सीढ़ियों वाली दीवारों को सजाने के लिए रंगीन प्लास्टिक भी मंगवाया गया, जिससे सीढ़ियों की दीवारें गंदी होने से भी बची रह सकें। लोग सीढ़ियाँ चढ़ते समय अक्सर दीवारों पर गंदे हाथ पोंछते-रगड़ते चलते हैं और दीवारें कुछ समय बाद गंदी दिखाई देने लगती हैं। प्लास्टिक से सजा देना उन्हें मैली होने से बचाने का हमें अच्छा उपाय लगा!

पिछले कुछ हफ्तों में हम लोग अपने ठेकेदारों और उनके मजदूरों से सिर्फ इस बात पर उलझते रहे कि इतना अच्छा काम करने के बाद वे उसका अंत सफाई और तत्परता के साथ क्यों नहीं करते। ब्लॅकबोर्ड मँगवाए गए थे मगर हमारे लगातार ईमेल और फोन करने के बावजूद सप्लायर की तरफ से यह जानकारी नहीं मिल पाई कि वे हमें कब प्राप्त हो सकेंगे! स्कूल की बाहरी दीवार पर स्कूल का नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाना था मगर लिखने वाला उसकी इबारत के बारे में बार-बार हमसे बहस करता रहा। पेंटर ने सिर्फ सफाई करने में लंबा वक़्त लिया और बड़ी मुश्किल से साफ-सुथरा पेंट हो पाया। सारा काम हो जाने के बाद आखिर के इन छुटपुट कामों में काफी वक़्त लग गया।

लेकिन अंत भला तो सब भला! अब स्कूल की इमारत पूरी तरह तैयार है, नए रंगों में चमकती हुई। कक्षाओं में ब्लॅक बोर्ड लग गए हैं और नया फर्नीचर भी आ गया है। पुरानी कक्षाओं में भी नया पेंट करवाया गया है और स्कूल के लिए नई घंटी भी मँगवाई गई है।

अब 180 विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो गया है और अगले साल आने वाले अतिरिक्त विद्यार्थियों के लिए भी काफी जगह बाकी है! हम इस बात पर खुश हैं और कृतज्ञ महसूस कर रहे हैं कि भविष्य में हमें और भी अधिक संख्या में विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्राप्त होगा!

निर्माण कार्य के सम्पूर्ण चित्र आप यहाँ देख सकते हैं

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